Naxalism मिसिर बेसरा गिरफ्तारी के बाद… लाल आतंक के खुलेंगे राज ?

सुरक्षा नीति की सफलता केवल बड़े नेताओं को गिरफ्तार करने से नहीं मापी जाती. सफलता तब मानी जायेगी जब उनके साथ जुड़ा पूरा नेटवर्क बिखर जाये. अब मिसिर बेसरा के रूप में सिर्फ एक चेहरा पकड़ में आया है या इससे पूरा नक्सली नेटवर्क भी नष्ट होता है, देखना दिलचस्प होगा.
मिसिर बेसरा कोई सामान्य नक्सली कमांडर नहीं
नक्सलवाद का अंत मान लेना रणनीतिक भूल
‘अंतिम अध्याय’ नहीं, निर्णायक मोड़
सफलता तब जब पूरा नेटवर्क बिखर जाये
तापमान लाइव ब्यूरो
03 अगस्त 2026
Ranchi : मिसिर बेसरा (Misir Besra) की गिरफ्तारी एक इनामी दुर्नाम नक्सली (Naxalite) की गिरफ्तारी नहीं, बिहार-झारखंड (Bihar-Jharkhand) में करीब चार दशक से फैले नक्सली नेटवर्क के एक बेहद खतरनाक अध्याय का अंत है. भाकपा (माओवादी) पोलित ब्यूरो (Politburo) के एकमात्र बचे सक्रिय सदस्य मिसिर बेसरा को 29 जुलाई 2026 को झारखंड में धनबाद (Dhanbad) जिले के मनियाडीह जंगल (Maniadih Forest) में गिरफ्तार किया गया था. उसके साथ दो अन्य माओवादी (Maoist) भी पकड़ में आये थे. मिसिर बेसरा अभी धनबाद जेल में है. झारखंड की पुलिस महानिदेशक तदाशा मिश्रा (Tadasha Mishra) के मुताबिक मिसिर बेसरा के खिलाफ 175 आपराधिक मामले दर्ज हैं और उस पर 2.2 करोड़ रुपये से अधिक के इनाम घोषित थे.
कौन है मिसिर बेसरा?
मिसिर बेसरा कोई सामान्य नक्सली कमांडर नहीं था. पोलित ब्यूरो के इकलौते बचे सक्रिय सदस्य के तौर पर अघोषित रूप से वह प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) की कमान संभाल रहा था. यानी महासचिव (Secretary General) की भूमिका में था. इसके अलावा लंबे समय तक झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल (West Bengal) के माओवादी नेटवर्क में शीर्ष स्तर की भूमिका में भी रहा. वह मूलतः झारखंड के गिरिडीह (Giridih) जिले के मदनाडीह गांव (Madnadih village) का रहने वाला है. नक्सली संगठन से उसका जुड़ाव 1985 के आसपास हुआ था और फिर सामान्य कैडर से निकलकर संगठन के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच गया.
सुरक्षा बलों की बड़ी कामयाबी
लखीसराय (Lakhisarai) के कोर्ट परिसर से फरारी से लेकर झारखंड के जंगल में गिरफ्तारी तक, मिसिर बेसरा की कहानी सिर्फ एक नक्सली कमांडर की कहानी नहीं, बल्कि बिहार-झारखंड में माओवादी आंदोलन के उभार, हिंसा और लगातार सिमटते प्रभाव का दस्तावेज है. उसकी गिरफ्तारी को झारखंड में माओवादी गतिविधियों के खिलाफ सुरक्षा बलों (Security forces) की बड़ी कामयाबी माना जा रहा है. लेकिन इस गिरफ्तारी का मुख्य महत्व सिर्फ इतना नहीं है कि एक वांछित बड़ा नक्सली पकड़ा गया. महत्वपूर्ण बात यह है कि मिसिर बेसरा के पास पिछले चार दशकों के उस भूमिगत नेटवर्क के वैसे तमाम राज हैं, जिसने बिहार-झारखंड के जंगलों को लंबे समय तक हिंसा का मैदान बनाये रखा.
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2026 में तस्वीर बदल गयी
सुरक्षा बलों का भी मानना था कि मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी आसान नहीं है. पर, 2026 में हालात एकदम से बदल गये. माओवादी संगठन का प्रभाव टूटने लगा. शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारी, मुठभेड़ों में मौत और आम नक्सलियों के लगातार आत्मसमर्पण के कारण संगठन काफी कमजोर हो गया. इसी बदलते परिदृश्य के बीच मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी हुई. सवाल अब यह है कि क्या इससे नक्सलवाद का अंत हो जायेगा? इस सवाल के संदर्भ में अतिशयोक्ति से बचने की जरूरत है. मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी नक्सलवाद के लिए बड़ा झटका जरूर है, लेकिन इसे नक्सलवाद का पूर्ण अंत मान लेना रणनीतिक भूल होगी.
सिकुड़ गया आधार झारखंड में
किसी भी उग्रवादी संगठन का प्रभाव सिर्फ उसके शीर्ष नेता से तय नहीं होता. उसके पीछे संगठनात्मक नेटवर्क, स्थानीय संपर्क, आर्थिक संसाधन, हथियारों की उपलब्धता, समर्थक तंत्र और नये कैडरों की भर्ती जैसी कई परतें होती हैं. हालांकि, झारखंड में माओवादी संगठन की स्थिति पिछले वर्षों में कमजोर हुई है और बड़ी संख्या में कैडरों के आत्मसमर्पण से उसका आधार काफी सिकुड़ गया है. इसके मद्देनजर मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी को नक्सलवाद का ‘अंतिम अध्याय’ न मान ‘निर्णायक मोड़’ कहना ज्यादा उपयुक्त होगा.
अब परीक्षा जांच एजेंसियों की
मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी के बाद पूछताछ और नेटवर्क की जांच के रूप में सबसे महत्वपूर्ण चरण अब शुरू होगा. चार दशक तक भूमिगत रहे इस नेता से जांच एजेंसियों को कई महत्वपूर्ण सवालों के जवाब तलाशने होंगे. मसलन 2009 में लखीसराय कोर्ट परिसर से उसे छुड़ाने वाले नक्सलियों में कौन-कौन था? बिहार और झारखंड में उसके संगठनात्मक संपर्क कौन थे? हथियार और विस्फोटक कहां से आते थे?माओवादी संगठन को आर्थिक मदद कौन देता था? कौन लोग वर्षों तक उसे आश्रय और सूचनाएं उपलब्ध कराते रहे इन सवालों के जवाब सिर्फ मिसिर बेसरा के अतीत को नहीं खोलेंगे, बल्कि यह भी बतायेंगे कि माओवादी संगठन इतने लंबे समय तक सुरक्षा तंत्र को चुनौती देने में कैसे सफल रहा.
सबसे कमजोर कड़ी सामने है
मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी का सबसे बड़ा संदेश यह है कि जंगल का वह दौर, जिसमें एक कुख्यात नक्सली दशकों तक सुरक्षा एजेंसियों (Security agencies) से बचता रहा, अब समाप्ति की ओर है. लेकिन, सुरक्षा नीति की सफलता केवल बड़े नेताओं को गिरफ्तार करने से नहीं मापी जाती. सफलता तब मानी जायेगी जब उनके साथ जुड़ा पूरा नेटवर्क बिखर जाये. अब मिसिर बेसरा के रूप में सिर्फ एक चेहरा पकड़ में आया है या इससे पूरा नक्सली नेटवर्क भी नष्ट होता है, देखना दिलचस्प होगा.
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