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Nepal Politics नेपाल फिर अशांत : सुनसरी में सुलगी चिंगारी… चपेट में आ गया पूरा देश !

प्रदीप कुमार नायक
29 जुलाई 2026
Jayanagar (Madhubani) : सीमापार से मिल रही खबरों के मुताबिक ‘जेन-जी शासित’ नेपाल (Nepal) फिर उसी अराजक मोड़ पर आ खड़ा हुआ है जहां से खून, आग और सवाल निकलते हैं. कोशी (Koshi) प्रदेश के सुनसरी (Sunsari) जिले के देवानगंज (Devanganj) और कप्तानगंज (Kaptanganj) की छोटी-सी झड़प ने पूरे देश को हिला कर रख दिया है. हिंसा की जो चिंगारी स्थानीय स्तर पर सुलगी थी उसकी आग तराई से निकल कर काठमांडू (Kathmandu) , पोखरा (Pokhara) और पहाड़ (Mountain) तक पहुंच गयी है. सड़कों पर भगवा झंडे हैं, नारे हैं, बंद हैं और बीच-बीच में धुएं का गुबार. बड़ी बात यह कि इस बार की आग सिर्फ कानून -व्यवस्था की नहीं है, इस बार सवाल पहचान का है, आस्था का है और उस नेपाल का है जो कभी दुनिया का एकमात्र हिंदू राष्ट्र (Hindu Nation) कहलाता था.

घटना की शुरुआत सुनसरी के सीमावर्ती इलाकों से हुई. सोशल मीडिया (Social Media) पर वायरल वीडियो और मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार देवानगंज और कप्तानगंज में दो समुदायों के लोगों के बीच किसी धार्मिक या सामाजिक मुद्दे को लेकर तू-तू मैं-मैं हुई. बात बढ़ी तो प्रदर्शन शुरू हो गये. प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरे, सरकारी कार्यालयों के सामने नारेबाजी हुई और फिर स्थिति बेकाबू हो गयी. आरोप है कि भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस (Police) को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े. हवाई फायरिंग भी करनी पड़ी. इसी दौरान एक युवक की मौत की खबर फैल गयी. बस फिर क्या था, वही एक लाश ने पूरे तराई क्षेत्र (Tarāi kṣētra) को सड़क पर उतार दिया.

युवक की मृत्यु के बाद गुस्सा ऐसा फूटा कि लोग हाथों में तख्तियां लिये सड़क पर निकल पड़े. मांग सिर्फ एक मृत व्यक्ति के लिए न्याय की नहीं थी. मांग थी उस सम्मान की वापसी की जो उन्हें लगता है कि 2015 के बाद से छिन गया है. 2015 में नेपाल ने खुद को धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र घोषित किया था. संविधान से ‘हिंदू राष्ट्र’ शब्द हटा दिया गया था. तब से एक बड़ा वर्ग लगातार कह रहा है कि 80 प्रतिशत हिंदुओं वाले देश की आत्मा को धर्मनिरपेक्षता के आवरण से नहीं ढका जा सकता. सुनसरी की घटना ने उस पुराने घाव को फिर कुरेद दिया है. सड़कों पर सिर्फ ‘न्याय दो’ नहीं सुनाई दे रहा, ‘हमें हिंदू राष्ट्र चाहिए’ कुछ अधिक तेज आवाज में गूंज रहा है.

हिंसा की आग यहीं नहीं रुकी. सुनसरी से शुरू हुआ विरोध धीरे-धीरे विराटनगर(Biratnagar) , इटहरी, (Itahari) धरान (Dharan) और फिर काठमांडू तक पहुंच गया. कई जगह सरकारी इमारतों में तोड़फोड़ हुई, वाहनों में आग लगायी गयी और पुलिस चौकियों पर हमले हुए. भारत से सटे जोगबनी (Jogbani) बॉर्डर के इंटीग्रेटेड चेकपोस्ट (Integrated Checkpost) पर भी उपद्रवियों ने आगजनी की. कपिलवस्तु (Kapilvastu) में भी कुछ दिन पहले इसी तरह का तनाव देखा गया था. वहां ईद के दिन मंदिर में तेज आवाज में भजन बजाने को लेकर विवाद हुआ था. मंदिर पर हमले और पुजारी से मारपीट के बाद पीड़ित समुदाय सड़कों पर उतर आया था. पुलिस ने आंसू गैस और फिर गोलियां चलायी थी. 23 लोग घायल हुए थे. उन घटनाओं और सुनसरी की घटना को लोग अब एक साथ जोड़कर देख रहे हैं. उन्हें लग रहा है कि उनकी आस्था को बार-बार निशाना बनाया जा रहा है.

इस बीच नेपाल की जेलें भी नहीं बचीं. देशभर में चल रहे विरोध और जेन-जी आंदोलन के दौरान कई जेलों पर हमले हुए. रामेछाप जेल में कैदियों ने गैस सिलेंडर से धमाका करके भागने की कोशिश की. सुरक्षाबलों की फायरिंग में तीन कैदी मारे गये. सुनसरी के झुम्का जेल से 1575 कैदी, चितवन से 700, कपिलवस्तु से 459 कैदी भाग निकले. कुल मिलाकर 15 हजार से अधिक कैदियों के फरार हो जाने की खबरें हैं. जेल टूटने, आगजनी और पलायन ने माहौल को और ज्यादा अराजक बना दिया है. भारत के लिए ये घटनाएं महज पड़ोसी देश की खबर भर नहीं है.

सुनसरी बिहार की सीमा से सटा है. अररिया, किशनगंज, पूर्णिया और मधुबनी में लोग टीवी और मोबाइल पर नजरें गड़ाये बैठे हैं. सोनौली और बढ़नी बार्डर पर आवाजाही धीमी है. भारतीय सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हैं. महाराजगंज, हरदौना और बहादुरगंज में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया है. क्योंकि धर्म और संस्कृति की आग सीमा नहीं देखती. वहां जो होता है उसकी तपिश इधर भी महसूस की जाती है. सोशल मीडिया पर ‘रामचंद्र कह गये सिया से ऐसा कलयुग आयेगा’ की पंक्तियां फिर से शेयर की जा रही हैं. लोगों को लग रहा है कि जब धर्म तो होगा लेकिन शर्म नहीं होगी, तब ऐसी ही घटनाएं होंगी.

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि नेपाल जायेगा किधर? सरकार के सामने दो विकल्प हैं. पहला रास्ता दमन का है. ज्यादा पुलिस, ज्यादा प्रतिबंध और ज्यादा गिरफ्तारियां. लेकिन, इससे समस्या सुलझेगी नहीं, दब जायेगी. पर, अंदर ही अंदर सुलगती रहेगी. दूसरा विकल्प संवाद का है. निष्पक्ष जांच हो कि गोली किसके आदेश पर चली, किसने पहले हमला किया. दोषियों को कानून के सामने लाया जाये चाहे वे किसी भी समुदाय के हों. साथ ही उन लोगों से बात की जाये जो ‘हिंदू राष्ट्र’ की मांग कर रहे हैं. उनकी बात को सुना जाये, उन्हें खारिज नहीं किया जाये. ‘हिंदू राष्ट्र’ का मतलब कट्टरता नहीं है. नेपाल में इसका मतलब हमेशा से सहिष्णुता रहा है. पशुपतिनाथ की छाया में बौद्ध भी पले, मुसलमान भी रहे, ईसाई भी रहे. लेकिन, देश की मूल पहचान सनातन रही. लोग चाहते हैं कि संविधान में वह पहचान वापस आ जाये. उन्हें डर है कि अगर पहचान मिट गयी, तो संस्कृति भी मिट जायेगी.

एक युवक की मौत ने पूरे देश को सोचने पर मजबूर कर दिया है. यह कि देश संवाद से चलेगा या संघर्ष से. क्या इतिहास को मिटाकर भविष्य बनायेंगे या इतिहास को साथ लेकर चलेंगे. नेपाल के पास मौका है कि वह दुनिया को दिखाये कि हिंदू राष्ट्र का आदर्श क्या होता है. वह आदर्श जिसमें सबके लिए जगह है, सबकी इज्जत है, लेकिन जड़ें भी सुरक्षित हैं. नेपाल के नेताओं को सद्बुद्धि आये कि माहौल को ज्यादा विषाक्त नहीं बनायें. ऐसा नहीं हुआ तो सुनसरी की चिंगारी सिर्फ नेपाल को ही नहीं, संपूर्ण उपमहाद्वीप की शांति को जला कर रख देगी.

प्रदीप कुमार नायक स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार हैं.

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