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Bihar Politics बड़ा सवाल: बिहार में गल पायेगी दीपके की दाल?

अविनाश चन्द्र मिश्र
27 जुलाई 2026
दिल्ली (Delhi) के जंतर मंतर (Jantar Mantar) के जिस आंदोलन ने नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) की सरकार को बैकफुट पर ला दिया, केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान (Dharmendra Pradhan) को इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया, वैसा ही आंदोलन यदि बिहार (Bihar) में होता है तब क्या होगा? यह सवाल इसलिए कि जंतर मंतर आंदोलन के नेतृत्वकर्ता व कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके (Abhijeet Deepke) ने अगला पड़ाव पटना (Patna) के गांधी मैदान (Gandhi Maidan) में डालने की बात कही है. यदि वैसा होता है तो सरसरी तौर पर उसका असर सिर्फ एक रैली तक सीमित नहीं रहेगा. ज्यादा कुछ नहीं तो राज्य की राजनीति में हिलोरें तो पैदा कर ही देगा. पर, इस संदर्भ में महत्वपूर्ण बात यह भी है कि यहां कदम रखने से पहले अभिजीत दीपके को इस तथ्य से अच्छी तरह अवगत हो लेना होगा कि बिहार दिल्ली नहीं है. यहां की राजनीति का गणित सिर्फ नारों से नहीं, सामाजिक समीकरणों से तय होता है. सामाजिक समीकरण का मतलब जातीय समीकरण से है.

अभिजीत दीपके पटना में भीड़ जितनी भी जुटा लें, हंगामा जितना बड़ा भी खड़ा कर दें, आंदोलन जैसे ही राजनीति की चौखट पर पहुंचेगा, जातीय समीकरण (Caste Equations) हावी होने लग जायेगा. इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि बढ़ती मंहगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, बिगड़ती विधि-व्यवस्था और पलायन के साथ शिक्षा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्रों में समायी अराजकता बिहार की बड़ी समस्याएं हैं. बड़ी आसानी से ये आंदोलन का मुद्दा बन सकते हैं. पूर्व में बनते भी रहे हैं. वर्तमान में भी जन सुराज (Jan Suraj) के सूत्रधार प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) मुख्यतः इन्हीं मुद्दों को अपनी राजनीति का मूल आधार बनाये हुए हैं. पर, लोग उनके प्रति ज्यादा गंभीर नहीं दिख रहे हैं. यही मुख्य कारण है कि पटना के बांकीपुर उपचुनाव (Bankipur by-election) में एक अदद जीत के लिए वह खुद जद्दोजहद कर रहे हैं. इसे शिष्टाचार मानिये या अपनी असमर्थता का इजहार, प्रशांत किशोर बिहार में अभिजीत दीपके के स्वागत की बात करने लगे हैं.

दरअसल जनता से जुड़े उक्त मुद्दे वक्त-बेवक्त सुलगते जरूर हैं, आंदोलन भी होते हैं, पर चुनाव आते-आते जाति उन पर हावी हो जाती है. इस राज्य की यही त्रासदी है. राजनीति का परम्परागत चरित्र है कि यहां हर मुद्दे की जाति पूछी जाती है. ऐसे में अभिजीत दीपके सामाजिक आंदोलन तक सीमित रहते हैं तो समर्थन मिलेगा खूब मिलेगा. पर, उस समर्थन को चुनावी आंदोलन में बदलने की कोशिश करेंगे, तो उनका पहला मुकाबला किसी राजनीतिक दल से नहीं, बल्कि राज्य में गहरी जड़ें जमा रखी जाति आधारित राजनीति से होगा. वैसे, उनकी गतिविधियां बताती है कि फिलहाल वह मुद्दा आधारित अभियान पर ही खुद को केन्द्रित रखेंगे. तब भी जुड़ाव आम आदमी पार्टी (Aam Aadmi Party) से रहा है तो दूरगामी राजनीतिक लक्ष्य भी कुछ न कुछ होगा ही.

खुदा न खास्ता अभिजीत दीपके पटना के गांधी मैदान में सियासी मजमा लगा उक्त मुद्दों को जातीय जकड़नों से निकाल युवा वर्ग के भविष्य का प्रश्न बना देते हैं, तो अंतिम फलाफल जो निकले, तात्कालिक तौर पर यह पारंपरिक राजनीति के लिए चुनौती जरूर बन जा सकता है. वैसे में एनडीए (NDA) और महागठबंधन (Grand Alliance) दोनों असहज हो जा सकते हैं. ज्यादा असहजता सत्तारूढ़ एनडीए यानी भाजपा-जदयू (BJP-JDU) में पैदा हो सकती है. इसलिए कि सत्ता से जवाब मांगा जायेगा तब दबाव बढ़ जायेगा. लेकिन, उससे कम बेचैनी महागठबंधन, विशेष कर राजद-कांग्रेस में भी नहीं दिखेगी. जाति छोड़कर युवा रोजगार और शिक्षा के सवाल पर संगठित हो जायेंगे तो सामाजिक न्याय की राजनीति के साथ ‘माय’ समीकरण भी दरक जायेगा. राजद-कांग्रेस (RJD-Congress) से जनता सवाल पूछेगी कि सत्ता में रहे तब क्या किया और अब विपक्ष में रहकर क्या कर रहे हैं?

बिहार ने जयप्रकाश आंदोलन (Jayaprakash Movement) देखा है, अन्ना आंदोलन (Anna Movement) की तपिश महसूस की है और प्रशांत किशोर की जन सुराज यात्रा का चुनावी हश्र भी देखा है. इतिहास बताता है कि यहां भीड़ और वोट हमेशा एक दिशा में नहीं चलते. सोशल मीडिया की लोकप्रियता और जनसभा की भीड़ तब तक चुनावी ताकत नहीं बनती, जब तक उसके पीछे पंचायत स्तर का संगठन और सामाजिक गठबंधन न हो. यहां असली खतरा चुनावी नहीं, राजनीतिक विमर्श का है. अभिजीत दीपके बिहार में युवा वर्ग को यह विश्वास दिलाने में सफल हो जाते हैं कि ‘जाति बाद में, नौकरी पहले’ तो इससे बिहार की राजनीति में वैचारिक बदलाव की शुरुआत हो सकती है. यह बदलाव तुरंत सरकार नहीं बदलेगा, लेकिन राजनीतिक दलों का एजेंडा जरूर बदल देगा. पर, आंदोलन जातीय खांचों में फंस गया, तो वह भी पूर्व के राजनीतिक प्रयासों की तरह इतिहास का हिस्सा बनकर रह जायेगा. इससे अधिक कुछ भी नहीं!

अविनाश चन्द्र मिश्र समकालीन तापमान के संपादक हैं

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