कातिल पत्नियां : चिंता बढ़ा रहीं समाज की
पति की हत्या पत्नी द्वारा किये जाने के मामले हों या पत्नी की हत्या पति द्वारा, दोनों ही समाज के लिए समान रूप से गंभीर और दुखद हैं. उपलब्ध अध्ययनों में पिछले पांच वर्षों के दौरान लगभग 785 मामलों का उल्लेख पांच राज्यों के संदर्भ में मिलता है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर इस विषय का अलग आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है. फिर भी प्रत्येक ऐसी घटना इस बात का संकेत है कि कुछ परिवारों में संवाद, विश्वास और संवेदनशीलता का संकट गहराता जा रहा है.
– जीवन साथी ही बन रहा जीवन का सबसे बड़ा दुश्मन
– प्रभावित हो रही विवाह जैसी पवित्र संस्था
– उत्पन्न हो रही विवाह के प्रति भय व असुरक्षा की भावना
– शोसल मीडिया भी उत्पन्न कर रहा समस्याएं
महेन्द्र तिवारी
16 जुलाई 2026
भारत में विवाह को केवल एक सामाजिक अनुबंध नहीं बल्कि विश्वास, समर्पण, सहयोग और आजीवन साथ निभाने का पवित्र बंधन माना गया है. भारतीय संस्कृति (Indian Culture) में पति (Husband) और पत्नी (Wife) को एक दूसरे का पूरक समझा गया है, जो जीवन की हर परिस्थिति में एक दूसरे का साथ निभाते हैं. यही कारण है कि विवाह (Marriage) संस्था सदियों से भारतीय समाज की सबसे मजबूत नींव रही है. किंतु बदलते समय में अनेक ऐसे घटनाक्रम सामने आ रहे हैं जिन्होंने इस विश्वास को गहरी चोट पहुंचायी है. हाल के दिनों में ऐसे कई मामले सामने आये हैं जिनमें पत्नियों पर पतियों की हत्या (Murder of husbands) का आरोप लगा. इन घटनाओं ने समाज को झकझोर दिया है और लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर रिश्तों में ऐसा कौन सा जहर घुल रहा है कि जीवनसाथी (Spouse) ही जीवन का सबसे बड़ा शत्रु बनता जा रहा है.
आधिकारिक आंकड़ा नहीं
इस विषय पर चर्चा करते समय तथ्यों की प्रामाणिकता अत्यंत आवश्यक है. उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के अनुसार राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (National Crime Records Bureau) पति की हत्या पत्नी द्वारा किये जाने की अलग राष्ट्रीय श्रेणी प्रकाशित नहीं करता. इसलिए पूरे देश के लिए कोई आधिकारिक संख्या उपलब्ध नहीं है. कुछ स्वतंत्र अध्ययनों और पांच राज्यों के संकलित मामलों के आधार पर वर्ष 2020 से 2024 के बीच लगभग 785 ऐसे मामले सामने आने का उल्लेख किया गया है, जबकि विशेषज्ञों का अनुमान है कि राष्ट्रीय स्तर पर वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है. इन अनुमानों को अंतिम या आधिकारिक आंकड़ा नहीं माना जा सकता. लेकिन, इतना अवश्य स्पष्ट है कि ऐसी घटनाएं समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय बन चुकी हैं.
पहले जैसा सुरक्षित नहीं
इन घटनाओं का सबसे बड़ा प्रभाव विवाह जैसी पवित्र संस्था पर पड़ता है. विवाह का आधार विश्वास होता है. यदि पति और पत्नी के बीच विश्वास (Trust between husband and wife) समाप्त हो जाये तो केवल एक परिवार ही नहीं टूटता बल्कि समाज की मूल संरचना भी कमजोर होने लगती है. जब लोग यह सुनते हैं कि किसी पत्नी ने अपने पति की हत्या कर दी या किसी पति ने अपनी पत्नी की हत्या कर दी, तो उनके मन में विवाह के प्रति भय और असुरक्षा की भावना उत्पन्न होती है. युवा पीढ़ी के सामने विवाह का आदर्श स्वरूप धुंधला पड़ने लगता है और यह धारणा बनने लगती है कि वैवाहिक जीवन (Married life) अब पहले जैसा सुरक्षित और स्थिर नहीं रहा. अधिकतर मामलों का अध्ययन बताता है कि ऐसे अपराध (Crime) किसी एक कारण से नहीं होते. कई मामलों में विवाहेत्तर संबंध (Extramarital Affair), पारिवारिक विवाद (Family Dispute), आर्थिक तनाव (Financial Stress), संपत्ति का झगड़ा (Property Dispute), लंबे समय से चला आ रहा वैवाहिक तनाव, आपसी अविश्वास और प्रतिशोध जैसी परिस्थितियां सामने आती हैं.
नकारात्मक धारणा उचित नहीं
राष्ट्रीय स्तर पर हत्या के मामलों के उद्देश्यों में भी पारिवारिक विवाद, व्यक्तिगत दुश्मनी, प्रेम संबंध और अवैध संबंध महत्वपूर्ण कारणों में शामिल पाये गये हैं. इससे स्पष्ट होता है कि परिवार के भीतर पैदा होने वाले विवाद यदि समय रहते नहीं सुलझाये जायें तो वे कभी-कभी अत्यंत हिंसक रूप धारण कर ले सकते हैं. यह भी समझना आवश्यक है कि हर वैवाहिक विवाद हत्या में परिवर्तित नहीं होता. अधिकतर परिवार कठिन परिस्थितियों के बावजूद बातचीत, समझौते, पारिवारिक सहयोग और कानूनी उपायों के माध्यम से अपने मतभेद सुलझा लेते हैं. इसलिए कुछ जघन्य घटनाओं के आधार पर पूरे समाज या किसी एक लिंग के प्रति नकारात्मक धारणा बनाना उचित नहीं होगा. अपराधी का मूल्यांकन (Assessment of the offender) उसके अपराध के आधार पर होना चाहिए, उसके लिंग के आधार पर नहीं.
दुष्प्रभाव बच्चों पर
इन घटनाओं का सबसे अधिक दुष्प्रभाव बच्चों पर पड़ता है. जब किसी परिवार में एक अभिभावक की हत्या हो जाती है और दूसरा जेल चला जाता है, तब बच्चे एक साथ माता और पिता दोनों का सहारा खो देते हैं. उनके सामने आर्थिक, सामाजिक और मानसिक संकट खड़ा हो जाता है. वे लंबे समय तक भय, अवसाद, असुरक्षा और सामाजिक उपेक्षा का सामना करते हैं. अनेक मनोवैज्ञानिक अध्ययन (Psychological study) बताते हैं कि बचपन में इस प्रकार का आघात व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व को प्रभावित कर सकता है. ऐसे बच्चे पढ़ाई, सामाजिक संबंधों और मानसिक स्वास्थ्य में गंभीर कठिनाइयों का सामना कर सकते हैं. समाज के स्तर पर भी इन घटनाओं के दूरगामी परिणाम दिखाई देते हैं. जब परिवारों के भीतर हिंसा बढ़ती है तो सामाजिक विश्वास कमजोर होता है. पड़ोसी, रिश्तेदार और मित्र भी वैवाहिक संबंधों को संदेह की दृष्टि से देखने लगते हैं. समाज में अविश्वास का वातावरण बनने लगता है.
डिजिटल युग की चुनौतियां
यह स्थिति केवल पति-पत्नी (Husband and Wife) तक सीमित नहीं रहती बल्कि अगली पीढ़ी तक पहुंचती है. बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने आसपास देखते हैं. यदि वे हिंसा, धोखे और प्रतिशोध को सामान्य व्यवहार के रूप में देखने लगेंगे तो समाज में संवेदनशीलता और सहिष्णुता का स्तर लगातार घटेगा. आज का डिजिटल युग भी रिश्तों को नयी चुनौतियां दे रहा है. सोशल मीडिया (Social Media) ने लोगों को अभूतपूर्व संवाद के अवसर दिये हैं, लेकिन इसके साथ ही कई नयी समस्याएं भी उत्पन्न हुई हैं. कभी-कभी आभासी संबंध वास्तविक संबंधों पर भारी पड़ने लगते हैं. पति-पत्नी के बीच संवाद कम होता जाता है और गलतफहमियां (Misunderstandings) बढ़ती जाती हैं. कई बार छोटी बातों को समय रहते सुलझाया नहीं जाता, जिससे तनाव गहराता जाता है. यह कहना उचित नहीं होगा कि केवल सोशल मीडिया ही अपराधों का कारण है, लेकिन यह स्वीकार करना होगा कि यदि इसका उपयोग संयम और जिम्मेदारी से न किया जाये तो यह पारिवारिक संबंधों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है.
कानून में है सम्मानजनक मार्ग
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि भारत में घरेलू हिंसा (Domestic Violence) और वैवाहिक अपराधों (Matrimonial Offense) के शिकार पुरुष और महिलाएं दोनों होते हैं. महिलाओं के विरुद्ध घरेलू हिंसा, दहेज मृत्यु और क्रूरता के मामले भी बड़ी संख्या में दर्ज होते हैं. इसलिए समाधान किसी एक पक्ष को दोषी ठहराने में नहीं बल्कि पूरे परिवार और समाज में स्वस्थ संबंधों की संस्कृति विकसित करने में है. यदि पति-पत्नी के बीच संबंध इतने खराब हो जाये कि साथ रहना असंभव हो, तो कानून ने उनके लिए अलग होने का सम्मानजनक और शांतिपूर्ण मार्ग उपलब्ध करा रखा है. आपसी सहमति से अलग होना, न्यायालय की सहायता लेना, पारिवारिक परामर्श लेना और कानूनी प्रक्रिया अपनाना किसी भी प्रकार की हिंसा से कहीं बेहतर विकल्प हैं. किसी भी परिस्थिति में हत्या न तो समस्या का समाधान है और न ही किसी प्रकार से उसे उचित ठहराया जा सकता है.
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संवेदनशीलता का संकट
ऐसे मामलों में मीडिया की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है. अपराधों को सनसनी बनाकर प्रस्तुत करने के बजाय उनके सामाजिक और मानवीय परिणामों पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए. यदि समाचारों में केवल रोमांच और सनसनी दिखाई जायेगी तो समाज समस्या की गंभीरता को सही रूप में नहीं समझ पायेगा. मीडिया को समाधान, जागरुकता और पारिवारिक मूल्यों को भी उतना ही महत्व देना चाहिए. अंततः यह कहा जा सकता है कि पति की हत्या पत्नी द्वारा किये जाने के मामले हों या पत्नी की हत्या पति द्वारा, दोनों ही समाज के लिए समान रूप से गंभीर और दुखद हैं. उपलब्ध अध्ययनों में पिछले पांच वर्षों के दौरान लगभग 785 मामलों का उल्लेख पांच राज्यों के संदर्भ में मिलता है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर इस विषय का अलग आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है. फिर भी प्रत्येक ऐसी घटना इस बात का संकेत है कि कुछ परिवारों में संवाद, विश्वास और संवेदनशीलता का संकट गहराता जा रहा है.
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