NEET paper leak लोकतंत्र बनाम लाठीतंत्र : सवालों से डरती सत्ता? पसर रही अराजकता

अचानक उपजी इस देशव्यापी अराजकता के लिए सरकार भी कम जिम्मेवार नहीं है. नीट परीक्षा (NEET Exam) में लीक के मामले का संवाद से समाधान न तलाश ‘आ बैल मुझे मार’ जैसे हालात उसके खुद के पैदा किये हुए हैं. इसे अहंकारी नेतृत्व की अपरिपक्वता मानी जा सकती है.
प्रदर्शन छात्रों का था, पर संख्या उनकी काफी कम थी
सुरक्षा बलों के प्रति आक्रामकता जेहादियों जैसी दिखी
बल प्रयोग का आखिरी विकल्प चुनने पर उठ रहे सवाल
देशव्यापी अराजकता के लिए सरकार भी कम जिम्मेवार नहीं
अविनाश चन्द्र मिश्र
23 जुलाई 2026
दिल्ली में जंतर-मंतर (Jantar Mantar) से लेकर प्रधानमंत्री आवास तक जो कुछ हुआ उसे देश ने बारीकी से देखा. वह केवल विरोध प्रदर्शन नहीं था. उस बदलते लोकतांत्रिक माहौल की तस्वीर थी, जिसमें सत्ता और असहमति आमने-सामने दिखी. एक ओर परीक्षा प्रणाली (Examination System) में कथित गड़बड़ियों, युवा वर्ग की नाराजगी और जवाबदेही तय करने का मुद्दा उठा रखे प्रदर्शनकारी थे, तो दूसरी ओर सरकार और पुलिस थी, जो सुरक्षा और विधि-व्यवस्था (Order of Law) का हवाला दे उन्हें रोक रही थी. लेकिन, इसका एक पक्ष यह भी है कि घोषित तौर पर प्रदर्शन छात्रों का था, पर संख्या उनकी कम थी. ज्यादातर वही ‘आंदोलनजीवी’ थे जो सरकार विरोधी हर धरना-प्रदर्शन में गला फाड़ कूदते-फांदते और चेहरा चमकाते नजर आ जाते हैं. ‘आजादी’ के लिए डफली बजाने और ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ नारा लगाने वाले भी थे.
विरोध का उपद्रवी रूप
सबसे ज्यादा गंभीर बात यह कि सुरक्षा बलों के प्रति अधिकतर प्रदर्शनकारियों की आक्रामकता उग्रवादियों, आतंकवादियों व जेहादियों जैसी दिखी. प्रदर्शन छात्रों का था, मुद्दा नीट पेपर लीक का था. वह गौण पड़ गया. कुछ सिरफिरों ने मुद्दा सनातन धर्म और ब्राह्मणवाद के विरोध का उछाल दिया. लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध अपराध नहीं होता. भारत के संविधान ने नागरिकों को पूरी निर्भीकता के साथ सत्ता के समक्ष अपनी बात रखने का अधिकार दे रखा है. लेकिन, इसकी एक सीमा भी तय है. विरोध के उपद्रवी रूप में वह सीमा जंतर मंतर पर ही नहीं, दिल्ली के ही कनाट प्लेस और अगले दिन पटना (Patna) में भी टूटती दिखी. दिल्ली में संसद, प्रधानमंत्री आवास (Prime Minister’s Residence) और पटना में विधानसभा, मुख्यमंत्री आवास (Chief Minister’s Residence) आदि अतिसंवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य का दायित्व है. प्रदर्शनकारियों की समझ में भले यह दमन हो, राज्य ने लाठियां चला, अश्रु गैस के गोले छोड़ अपने दायित्व का निर्वहन किया.
हर किसी ने देखा और सुना
इसके बावजूद इस सवाल को एकदम से खारिज नहीं किया जा सकता कि पुलिस ने बल प्रयोग का आखिरी विकल्प ही क्यों चुना? क्या संवाद की संभावना तनिक भी नहीं बच गयी थी? बल प्रयोग से पहले सरकार को यह समझना चाहिए था कि जनता के सवालों का उत्तर बैरिकेटिंग, लाठी, आंसू गैस और हिरासत नहीं हो सकते. संवाद की जगह जब बल प्रयोग होता है तब लोकतंत्र की आत्मा कांप उठती है. लोकतांत्रिक सरकार की सबसे बड़ी ताकत आलोचना सहने और उसका तार्किक जवाब देने की क्षमता – दृढ़ता होती है न कि हर विरोध को सुरक्षा पर संकट समझ कठोर कार्रवाई. लेकिन, ऐसा तब जब आलोचना तर्कसंगत और विरोध शांतिपूर्ण हो. हर किसी ने देखा और सुना, दिल्ली के जंतर मंतर, कनाट प्लेस (Connaught Place) और पटना का प्रदर्शन हिंसक स्वरूप लिये हुए था.
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‘आ बैल मुझे मार ’
तथाकथित मानवतावादियों और आंदोलनजीवियों को यह बात चुभ सकती है, पर वहां की परिस्थितियां बताती हैं कि विधि- व्यवस्था के मद्देनजर सुरक्षा बलों को ज्यादा संयम बरतने की जरूरत नहीं थी. इसके बावजूद उग्र प्रदर्शनकारियों के ईंंट-पत्थरों से लहूलुहान पुलिस कर्मियों ने हाथ बांधे रखा. जो हो, अचानक उपजी इस देशव्यापी अराजकता के लिए सरकार भी कम जिम्मेवार नहीं है. नीट परीक्षा (NEET Exam) में लीक के मामले का संवाद से समाधान न तलाश ‘आ बैल मुझे मार’ जैसे हालात उसके खुद के पैदा किये हुए हैं. इसे अहंकारी नेतृत्व की अपरिपक्वता मानी जा सकती है.
विपक्ष भी उतना ही जिम्मेवार
ऐसे हालात के लिए विपक्ष भी करीब-करीब उतना ही जिम्मेदार है, जितना सरकार. हर आंदोलन को राजनीतिक चश्मे से देख उसे शक्ति-प्रदर्शन में बदल देने की उसकी प्रवृत्ति जन सरोकारों को अक्सर पीछे धकेल देती है. उद्देश्य समाधान से अधिक टकराव पैदा करना हो, तो जनता का असली मुद्दा राजनीतिक नारों में दब जाता है. नीट पेपर लीक आंदोलन के सिलसिले में लोकसभा में नेता, प्रतिपक्ष राहुल गांधी (Rahul Gandhi) का प्रधानमंत्री आवास के समक्ष आकस्मिक धरना, राकांपा (NCP) सुप्रीमो शरद पवार का जंतर मंतर पर पहुंचना, सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) और सुप्रिया सुले (Supriya Sule) का राहुल गांधी के समर्थन में जुटना और अगले दिन उद्धव ठाकरे और महुआ मोइत्रा का आ धमकना नीट पेपर लीक आंदोलन को लेकर भी ऐसा ही कुछ संकेत दे रहा है.
नुकसान जनता का
लोकतंत्र में आंदोलन का नैतिक बल उसकी शांतिपूर्ण प्रकृति और स्पष्ट उद्देश्य से आता है, केवल भीड़ के आकार और उसके उपद्रवी स्वरूप से नहीं. दिल्ली और पटना में उत्पन्न अराजकता से इस धारणा को मजबूती मिली कि देश में असहमति और अविश्वास की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है. सरकार विरोध को राजनीतिक साजिश मानने लगती है और विपक्ष हर प्रशासनिक कार्रवाई को दमन बताने लगता है. इसमें आम नागरिक, जिसकी समस्याएं आंदोलन को जन्म देती हैं, वह पीछे रह जाता है. लोकतंत्र (Democracy) की मजबूती इस बात से तय नहीं होती कि सरकार कितनी शक्तिशाली है, बल्कि इस बात से होती है कि असहमति के लिए वह कितनी जगह छोड़ती है. उसी तरह आंदोलनों की विश्वसनीयता इस बात से तय होती है कि वे संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर रहकर व्यवस्था से जवाब मांगते हैं या टकराव को लक्ष्य बना लेते हैं. इस परिप्रेक्ष्य में इस बात को गहराई से समझने की जरूरत है कि यदि संवाद की जगह टकराव और विश्वास की जगह संदेह ले लेगा, तो उससे नुकसान किसी राजनीतिक दल का नहीं, सीधे तौर पर जनता का होगा. सत्ता बदलती रहती है, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा एक बार कमजोर पड़ जाये, तो उसे फिर से मजबूत करने में वर्षों लग जाते हैं.

अविनाश चन्द्र मिश्र समकालीन तापमान के संपादक हैं
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