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Bihar: सम्राट सरकार के 100 दिन : कुम्हलातीं उम्मीदें… दस्तक दे रहा अराजक दौर!

अविनाश चन्द्र मिश्रा
25 जुलाई 2026

बिहार में सम्राट चौधरी (Samrat Chaudhary) के नेतृत्व वाली ‘भाजपा सरकार’ (BJP government) के 100 दिन पूरे हो गये. वैसे, यह भाजपा की खुद की नहीं, एनडीए (NDA) की सरकार है. इस सरकार का नेतृत्व पहले जदयू सुप्रीमो (JDU Supremo) नीतीश कुमार (Nitish Kumar) करते थे, अब भाजपा के सम्राट चौधरी कर रहे हैं. ऐसा पहली बार हुआ है. बात अब इस सरकार के 100 दिन पूरे होने की. सत्ता पक्ष 100 दिनों की उपलब्धियों को ‘नयी शुरुआत’ बता रहा है. पर, यहां बड़ा सवाल यह है कि बिहार (Bihar) की जनता को भी ऐसा कुछ अहसास हो रहा है या यह सिर्फ बेहिसाब घोषणाओं व आसमानी दावों से भरे सरकारी विज्ञापनों में ही सिमटा हुआ है? वैसे, 100 दिन किसी सरकार की काबिलियत के मूल्यांकन के लिए पर्याप्त नहीं होते, लेकिन ऐसे 100 दिन यह जरूर बताते हैं कि सरकार किस दिशा में बढ़ रही है. वह दिशा जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप है या नहीं. सम्राट चौधरी को इस पर विशेष ध्यान रखने की जरूरत है कि जनता सरकार की मंशा के साथ-साथ नतीजे भी देखती है.

सत्ता संभालने के बाद सम्राट चौधरी की सरकार ने बैठकों का रिकार्ड बनाया, योजनाओं की समीक्षा की, अधिकारियों को निर्देश दिये, भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्ती की बात कही और प्रशासनिक सुधार का संदेश देने की कोशिश की. जनशिकायत निवारण, बुनियादी ढांचा, शिक्षा, स्वास्थ्य, ई-गवर्नेंस आदि की पहल की. ‘सहयोग’ (Sahyog) जैसे जनशिकायत कार्यक्रम को प्रमुखता से पेश कर रही है. लेकिन, कहींें कोई बड़ा बदलाव होता नहीं दिख रहा है. सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बेकाबू होती कानून-व्यवस्था (Law and order) है. हत्या, रंगदारी, अपहरण और दुष्कर्म की घटनाओं में चिंताजनक वृद्धि तो हो ही रही है, पूर्व के पन्द्रह वर्षीय ‘जंगल राज’ (rule of the jungle) के अराजक दौर की तरह संगठित अपराध भी खतरनाक रूप लेने लग गया है. विपक्ष इसे मुद्दा बना रहा है. कह रहा है कि सम्राट चौधरी के शासन में आम नागरिक खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहा है. जमीनी हकीकत भी यही है. ऐसा क्यों हो रहा है, सरकार को इस पर गंभीर आत्ममंथन करना चाहिए.
रोजगार के मामले में भी उपलब्धियां बहुत उत्साहजनक नहीं है. बिहार के युवा आज भी रोजगार और पलायन के सवालों का जवाब खोज रहे हैं. निवेश की बड़ी-बड़ी घोषणाएं तभी मायने रखेंगी, जब वे जमीन पर उद्योग और नौकरियों के रूप में बदलेंगी, अन्यथा डपोरशंखी ही मानी जायेंगी.

सबसे दिलचस्प बात यह है कि सम्राट चौधरी की सरकार के 100 दिन पूरे होने पर एनडीए में कोई उमंग-तरंग नहीं है. कारण संभवतः यह कि ये 100 दिन वास्तव में उपलब्धियों से भरे होते, तो सत्ता पक्ष में उत्साह दिखता. लेकिन, कहीं काई उत्सव जैसा माहौल नहीं दिखा.जब भाजपा ही उत्साहहीन दिख रही है तब सहयोगी दलों का निर्विकार रहना स्वाभाविक ही है. आखिर, ऐसा क्यों है? इस क्यों का जवाब हर कोई जानना चाहता है. इस उत्साहहीनता की कई वजहें हो सकती हैं. सबसे बड़ी बात यह कि सरकार अभी तक कोई ऐसा बड़ा फैसला नहीं ले सकी है, जो बदलाव की बावत राजनीतिक विमर्श बदल दे. वह अब भी अपनी पहचान बनाने के प्रयास में है और कई मोर्चों पर रक्षात्मक नजर आती है. जनता का मूड भी ‘देखते हैं आगे क्या होता है’ वाला है, न कि ‘सरकार ने कमाल कर दिया’ वाला. वैसे, उत्साहहीनता का एक बड़ा कारण यह भी हो सकता है कि सम्राट चौधरी की सरकार पूरी तरह नयी नहीं, बल्कि सत्ता का नेतृत्व परिवर्तन है. इसलिए नयी सरकार वाला उत्साह सीमित है. भाजपा इसे उत्सव का रूप इस वजह से भी नहीं दे पायी कि उससे गठबंधन (Alliance) में असहज स्थिति उत्पन्न हो जा सकती थी.

सवाल अब यह है कि सरकार के समक्ष सबसे बड़ा खतरा क्या है? इसका एक पंक्ति में जवाब यही हो सकता है कि उसके लिए खतरा विपक्ष नहीं, उसकी खुद की आत्ममुग्धता है. सरकार यह मान बैठे कि शुरुआती घोषणाएं ही उपलब्धियां हैं, तो आने वाले दिनों में जनाकांक्षाएं उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जा सकती हैं. बिहार की जनता का मिजाज काफी कुछ बदल गया है. अब वह भाषणों से प्रभावित नहीं होती, सड़क, अस्पताल, स्कूल, रोजगार, निवेश और सुरक्षा का ठोस इंतजाम चाहती है. बहरहाल, सम्राट चौधरी की सरकार के पहले 100 दिन आशा और अपेक्षा के बीच उलझे दिखाई देते हैं. सरकार ने सक्रियता दिखायी है, लेकिन सक्रियता और उपलब्धि में फर्क होता है. प्रशासनिक बैठकों से सरकार चलती है, लेकिन जनविश्वास केवल परिणामों से जमता है. अब असली परीक्षा अगले 100 दिनों की है. यदि कानून-व्यवस्था, रोजगार, निवेश और भ्रष्टाचार पर निर्णायक प्रहार के मामले में बदलाव नहीं दिखे, तो यह सवाल और बड़ा हो जायेगा कि बिहार में सिर्फ मुख्यमंत्री (Chief Minister) बदला है, शासन की कार्य संस्कृति नहीं?

अविनाश चन्द्र मिश्र समकालीन तापमान के संपादक हैं

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