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कलंक कथा कुलपतियों की : कार्रवाई में अब विलम्ब क्यों?

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विजय शंकर पांडेय
04 मई 2023

PATNA : बिहार के तमाम जागरूक लोगों के स्मरण में यह मामला अवश्य होगा. पूर्व कुलाधिपति फागू चौहान (Fagu Chauhan) के विवादों से भरे कार्यकाल के दौरान एक ‘आरोप-पत्र’ की खूब चर्चा हुई थी. आरोप-पत्र पुलिस का नहीं था, एक चर्चित आरटीआई (RTI) कार्यकर्त्ता द्वारा सक्षम प्राधिकार को प्रेषित ‘आरोपों का पुलिंदा’ था जिसके आधार पर निगरानी अन्वेषण ब्यूरो ने कुलाधिपति से आरोपितों के खिलाफ कार्रवाई की अनुमति मांगी थी. तत्कालीन कुलाधिपति के दो पुत्रों, निजी सचिव विजय सिंह (Vijay Singh) एवं लखनऊ निवासी अतुल श्रीवास्तव (Atul Shrivastava) सहित 27 लोगों से जुड़े इस आपराधिक मामले में कार्रवाई की अनुमति मांगनेे की जरूरत थी या नहीं, यह विवेचना का एक अलग विषय है. यहां मुख्य मुद्दा यह है कि कार्रवाई की अनुमति के उस अनुरोध पर कुलाधिपति कार्यालय का निर्णय क्या हुआ?

नये कुलाधिपति से उम्मीद
पटना के राजभवन (Rajbhawan) से निकलते-निकलते फागू चौहान ने संबंधित संचिका को ‘निष्पादित’ कर दिया या वह उसी तरह लंबित पड़ा हुआ है, यह जानने की जिज्ञासा हर किसी की होगी. राज्यपाल (Governor) संवैधानिक पद है. न्यायिक दायरे से बाहर है, सवालों से परे है. लेकिन, कुलाधिपति पद के लिए यह प्रावधान लागू नहीं होता. कानून (Law) के जानकारों के मुताबिक सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने भी इसे व्याख्यायित कर रखा है. उच्च शिक्षा जगत को अभी के राज्यपाल-सह-कुलाधिपति राजेद्र विश्वनाथ अर्लेकर (Rajendra Vishwanath Arlekar) पर विश्वास है कि संबद्ध संचिका पर उनका न्यायोचित निर्णय होगा.

अनसुना कर दिया
आरटीआई कार्यकर्त्ता रोहित कुमार (Rohit Kumar) के ‘आरोप-पत्र’ के आधार पर निगरानी अन्वेषण ब्यूरो के तत्कालीन अपर पुलिस अधीक्षक मनोज कुमार (Manoj Kumar) ने 26 नवम्बर 2021 को कार्रवाई की बाबत शिक्षा विभाग (Education Department) को पत्र भेजा था. उस पत्र के आलोक में शिक्षा विभाग के उपसचिव ने राज्यपाल-सह कुलाधिपति से कार्रवाई की अनुमति देने का अनुरोध किया था. उस अनुरोध को अनसुना कर दिया गया. इतना ही नहीं, विश्वविद्यालयों में उजागर घोटालों में निगरानी अन्वेषण ब्यूरो ने जो कार्रवाई की, कुलाधिपति कार्यालय को वह भी नागवार गुजरी. कानून विरुद्ध बता उसे तत्काल रोक देनेे का तर्क रखा.

कार्रवाई रोकने का प्रयास
राज्यपाल-सह कुलाधिपति के प्रधान सचिव आर एल चोंग्थू (R L Chongthu) ने इस संदर्भ में मुख्य सचिव आमिर सुबहानी (Amir Subhani) को पत्र तक लिख दिया. उसमें कहा गया कि विश्वविद्यालयों के मामले में सक्षम प्राधिकार कुलाधिपति होते हैं. उनकी अनुमति के बिना निगरानी अन्वेषण ब्यूरो की कार्रवाई कानून का उल्लंघन है. विश्वविद्यालयों (Universities) की स्वायत्तता पर कुठाराघात है. राजनीति (Politics) को वह पत्र ‘घुड़की’ केे समान लगा. तभी तो राज्य सरकार (State Government) ने भी उसे उसी रूप में लिया. विधि सम्मत कार्रवाई का क्रम बना रहा.

निवर्तमान के दो पुत्र भी
आरटीआई कार्यकर्त्ता रोहित कुमार उस दौर में विश्वविद्यालयों में पल रहे ‘पाप’ पर आधारित आरोप-पत्र प्रधानमंत्री (Prime Minister) और मुख्यमंत्री (Chief Minister) कार्यालयों को समर्पित किया था. मुख्यमंत्री कार्यालय में उसकी क्या गति-सद्गति हुई यह नहीं कहा जा सकता. पर, प्रधानमंत्री कार्यालय ने त्वरित संज्ञान लिया. निगरानी अन्वेषण ब्यूरो की सक्रियता उसी परिप्रेक्ष्य में बढ़ी. रोहित कुमार ने जिन लोगों को आरोपित कर रखा है उनमें निवर्तमान कुलाधिपति फागू चौहान के दो पुत्र – रामविलास चौहान (Ramvilash Chauhan) और कैलाश चौहान (Kailash Chauhan) भी हैं. एक पुत्र सात कंपनियों के अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक हैं.

आरोपितों में कई कुलपति
ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के कुलपति प्रो. सुरेन्द्र प्रताप सिंह (Prof. Surendra Pratap Singh), भीमराव अम्बेदकर बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर के तत्कालीन कुलपति प्रो. हनुमान प्रसाद पांडेय (Prof. Hanuman Prasad Pandey), जेल में पाप गिन रहे मगध विश्वविद्यालय, बोधगया के तब के कुलपति प्रो. राजेन्द्र प्रसाद (Prof. Rajendra Prasad), पूर्णिया विश्वविद्यालय, पूर्णिया के पूर्व कुलपति प्रो. राजेश सिंह (Prof. Rajesh Singh), पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना के पूर्व कुलपति प्रो. गुलाब चन्द्र राय जायसवाल (Prof. Gulab Chandra Ray Jaiswal), एम ए कुमार (M A Kumar), अतुल श्रीवास्तव (Atul Shrivastava), कुलाधिपति के निजी सचिव विजय सिंह (Vijay Singh), विजय सिंह की पुत्री डा. रिशा सिंह (Dr. Risha Singh) भी आरोपितों में शामिल हैं.


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ढेर सारे हैं नाम
कुलाधिपति कार्यालय की निम्नवर्गीय लिपिक आकांक्षा (Akansha), पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना के तत्कालीन कुलसचिव जितेन्द्र कुमार (Jitendra Kumar), वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा के तब के कुलसचिव धीरेन्द्र कुमार सिंह (Dhirendra Kumar Singh), वित्तीय परामर्शी ओमप्रकाश (Omprakash) तथा वित्त पदाधिकारी सुशील कुमार (Sushil Kumar), ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के कुलसचिव डा. मुश्ताक अहमद (Dr. Mustaq Ahmad) तथा तत्कालीन वित्त सलाहकार-सह-वित्त पदाधिकारी कैलाश राम (Kailash Ram) आदि शामिल हैं.

खूब अनदेखी हुई
‘आरोप-पत्र’ में वर्णित है कि कुलाधिपति कार्यालय एवं विश्वविद्यालयों के वर्तमान एवं निवर्तमान पदधारियों ने लखनऊ निवासी दो खास आरोपितों के निर्देशन में अनेक अनियमित कार्यों को अंजाम दिया और दिलाया. कुलपति, प्रतिकुलपति, कुलसचिव, वित्तीय परामर्शी, वित्त पदाधिकारी, परीक्षा नियंत्रक आदि के पदों पर बहाली में भी नियमों की अनदेखी कर मर्जी चलायी.

अनाप-शनाप खरीद
विभिन्न विश्वविद्यालयों में पत्रों-प्रपत्रों, प्रश्न पत्रों, उत्तर पुस्तिकाओं, अंक पत्रों, प्रमाण पत्रों, ओएमआर शीट्स आदि की छपायी, विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में ऑटोमेशन संबंधित तमाम कार्य, पुस्तकालयों के लिए लाखों-करोड़ों की पुस्तकों, कम्प्यूटरों (Computers) एवं संबंधित फर्नीचरों की कथित अनाप-शनाप खरीद में भी इनकी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष भूमिका रही. उसमें यह भी कहा गया है कि ऐसे अधिकतर काम लखनऊ (Lucknow) की इन्फोलिंक कन्सलटेंसी प्रा. लि., आर एम एस टेक्नो सोल्यूशन द्वारा कराये गये. खरीद भी उन्हीं से या उन्हीं के जरिये की गयी.

सिंडिकेट की तरह था
उक्त लोगों की कथित अवांछित गतिविधियां एक सिंडिकेट की तरह संचालित होती थीं. इसमें अवरोध खड़ा करने या कराने की कोई कोशिश करता, तो उसे उसका खामियाजा भुगतना पड़ जाता था. उदाहरण के रूप में मगध विश्वविद्यालय (Magadh University) के तत्कालीन कुलसचिव डा. विजय कुमार का नाम लोग लेते थे. डा. विजय कुमार ने मगध विश्वविद्यालय में परीक्षा से संबंधित ओएमआर शीट्स (OMR Sheets) आदि के क्रय में तकरीबन 16 करोड़ के अनियमित भुगतान पर रोक लगाने का प्रयास किया तो उन्हें पदमुक्त कर दिया गया. वित्त पदाधिकारी, परीक्षा नियंत्रक (Examination Controller) आदि के साथ भी वैसा ही कुछ हुआ.

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