Sultanganj अजगैबीनाथ धाम : घिस रहा इतिहास धीरे-धीरे!

इतिहासकारों और विशेषज्ञों के लिए यह क्षेत्र इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां धार्मिक आस्था और पुरातात्विक विरासत एक-दूसरे से अलग नहीं हैं. एक तरफ बाबा अजगैबीनाथ हैं, दूसरी तरफ उन्हीं पत्थरों में दर्ज सदियों पुरानी कहानी. दुर्भाग्य यह है कि आस्था को तो हम बचाना चाहते हैं, लेकिन आस्था की इस ऐतिहासिक जमीन को बचाने की चिंता उतनी दिखाई नहीं देती.
चकाचौंध के पीछे है एक दूसरा सुलतानगंज भी है
विरासत संरक्षण भी तब पीछे चला जाता है
प्राचीन शिलाओं का संरक्षण सबसे ज्यादा जरूरी
आस्था और विरासत एक-दूसरे से अलग नहीं
शिवकुमार राय
04 अगस्त 2026
Sultanganj : गंगा (Ganga) की उत्तरवाहिनी (Uttarvahini) धारा… लाखों कांवरियों (kanvriyon) की आस्था… पत्थरों पर सदियों पुराना इतिहास. यही है सुलतानगंज का अजगैबीनाथ धाम (Ajgaibinath Dham) . हर सावन (Sawan) यहां आस्था का सैलाब उमड़ता है. बाबा अजगैबीनाथ की पूजा और नमामि गंगे (Namami Gange) घाट से पवित्र गंगाजल लेकर श्रद्धालु देवघर (Deoghar) की ओर प्रस्थान करते हैं. सरकार करोड़ों रुपये खर्च करती है. श्रावणी मेले की तैयारी होती है. सड़क, रोशनी, सुरक्षा और कांवरियों की सुविधा पर योजनाएं बनती हैं. लेकिन, इस चकाचौंध के पीछे एक दूसरा सुलतानगंज भी है, जहां इतिहास धीरे-धीरे घिस रहा है. अजगैबीनाथ मंदिर की शिलाओं पर उकेरी गई प्राचीन कलाकृतियां (Ancient artifacts) और अभिलेख इस क्षेत्र के प्राचीनता की गवाही देते हैं. विशेषज्ञों ने यहां गुप्तकालीन (Guptkalin) मूर्तियों और गुप्त-ब्राह्मी लिपि के अभिलेखों का उल्लेख किया है.
वैज्ञानिक संरक्षण की जरूरत
यानी ये सिर्फ पत्थर नहीं हैं. ये अंग क्षेत्र के अतीत की किताब हैं. और सवाल यह है—इस किताब के पन्ने सुरक्षित हैं हैं क्या ? सावन आता है, इतिहास फिर अकेला रह जाता है. सावन में अजगैबीनाथ धाम की तस्वीर बदल जाती है. लाखों श्रद्धालु आते हैं. प्रशासन (Administration) सक्रिय हो जाता है. सुरक्षा के इंतजाम होते हैं. अस्थायी सुविधाएं बढ़ती हैं.पूरा इलाका धार्मिक पर्यटन (Dharmik paryatan) के केंद्र में बदल जाता है. लेकिन, जैसे ही सावन खत्म होता है, विरासत संरक्षण भी पीछे चला जाता है. क्या अजगैबीनाथ धाम की चिंता केवल कांवरियों की भीड़ तक सीमित रहनी चाहिए? अगर इस धरोहर का वैज्ञानिक संरक्षण नहीं हुआ, तो आने वाली पीढ़ी को शायद सिर्फ इतना बताया जायेगा कि यहां कभी प्राचीन शिलाकृतियां हुआ करती थीं!
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पत्थरों पर गुप्तकाल की छाप
अजगैबीनाथ धाम और आसपास के क्षेत्रों में मौजूद शिलाकृतियां इस इलाके के प्राचीन सांस्कृतिक इतिहास की ओर संकेत करती हैं. मुरली पहाड़ी और आसपास की चट्टानों पर विभिन्न देवी-देवताओं की आकृतियों का उल्लेख मिलता है. कुछ अभिलेखों को गुप्त-ब्राह्मी लिपि से जोड़ा गया है. इतिहासकारों और विशेषज्ञों के लिए यह क्षेत्र इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां धार्मिक आस्था और पुरातात्विक विरासत एक-दूसरे से अलग नहीं हैं. एक तरफ बाबा अजगैबीनाथ हैं, दूसरी तरफ उन्हीं पत्थरों में दर्ज सदियों पुरानी कहानी. दुर्भाग्य यह है कि आस्था को तो हम बचाना चाहते हैं, लेकिन आस्था की इस ऐतिहासिक जमीन को बचाने की चिंता उतनी दिखाई नहीं देती.
सौंदर्यीकरण ही नहीं, संरक्षण भी चाहिए
मंदिर को सुंदर बनाना और विरासत को सुरक्षित रखना दो अलग-अलग काम हैं. नयी रोशनी लगा देना, रंग-रोगन कर देना या आसपास का सौंदर्यीकरण कर देना प्राचीन शिलाओं का संरक्षण नहीं है. प्राचीन पत्थरों को विशेषज्ञों की निगरानी चाहिए. उनकी रासायनिक संरचना, नमी, क्षरण, तापमान, मानवीय हस्तक्षेप और आसपास के निर्माण—हर पहलू का अध्ययन जरूरी है. वरना विकास के नाम पर किया गया निर्माण ही भविष्य में विरासत के लिए खतरा बन जा सकता है. इस पर भी ध्यान देने की जरूरत है. यह कोई बंद संग्रहालय नहीं है.यहां रोज पूजा होती है. श्रद्धालु आते हैं. फूल, जल, सिंदूर और दूसरे पूजन पदार्थ चढ़ते हैं. अजगैबीनाथ जैसे जीवंत धार्मिक स्थल के संरक्षण के लिए यही सबसे बड़ी चुनौती है.

शिवकुमार राय वरिष्ठ पत्रकार हैं.]
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