Bihar Politics बांकीपुर उपचुनाव : इस वजह से मात खा गयी भाजपा

अभिमानी – अहंकारी भाजपा नेतृत्व ने बदली राजनीतिक परिस्थितियों के मद्देनजर ‘बाघ’ के मुकाबले ‘बाघ’ नहीं खड़ा कर अपने पांव में खुद कुल्हाड़ी मार ली. इस घमंड में कि जिस किसी को भी भाजपा की उम्मीदवारी मिलेगी, सामने जो कोई हो, जीत उसकी होगी ही. भाजपा नेतृत्व का वही घमंड इस उपचुनाव का मुख्य मुद्दा था, जो एक झटके में टूट गया.
आधे मत भी नहीं मिल पाये नीरज कुमार सिन्हा को
जमानत जब्त हो गयी राजद की रेखा गुप्ता की
भाजपा का दूसरा मजबूत उम्मीदवार होता तब…
महागठबंधन का मौन समर्थन मिला जन सुराज को
अविनाश चन्द्र मिश्र
04 अगस्त 2026
पटना (Patna) के बांकीपुर (Bankipur) विधानसभा क्षेत्र के उपचुनाव (By-election) में जन सुराज (Jan Suraj) के सूत्रधार प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) की बड़ी जीत हुई. भाजपा (BJP) के निहायत सामान्य उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा (Neeraj Kumar Sinha) को उन्होंने 19 हजार 324 मतों से पछाड़ दिया. प्रशांत किशोर को 64 हजार 151 और नीरज कुमार सिन्हा को 44 हजार 827 मत मिले. राजद (RJD) की रेखा गुप्ता (Rekha Gupta) की जमानत जब्त हो गयी. वह 14 हजार 273 मतों के साथ तीसरे स्थान पर अटक गयीं. रेखा गुप्ता 2025 के चुनाव में भी राजद की उम्मीदवार थीं. 46 हजार 363 मत लाकर भाजपा उम्मीदवार नितिन नवीन (Nitin Navin) से 51 हजार 936 मतों के अंतर से मात खा गयीं थीं. नितिन नवीन के खाते में तब 98 हजार 299 मत गये थे.
आंकड़ों पर गौर कीजिये
उस चुनाव के महज नौ माह बाद हुए उपचुनाव में भाजपा उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा को उसके आधे मत भी नहीं मिल पाये जितने नितिन नवीन को मिले थे. राजद प्रत्याशी रेखा गुप्ता की स्थिति और अधिक दयनीय रही. 2025 में मिले मतों की तुलना में एक तिहाई मत भी वह हासिल नहीं कर पायीं. 2025 के चुनाव में वन्दना कुमारी (Vandana Kumari) जन सुराज की उम्मीदवार थीं. तीसरे स्थान पर तो रहीं, पर 07 हजार 717 मतों की ही प्राप्ति हो पायी . आंकड़ों पर गौर कीजिये, 2025 में नितिन नवीन मैदान में थे, भारी जीत हुई. जन सुराज की उम्मीदवार वन्दना कुमारी कमजोर थीं, 10 हजार का भी आंकड़ा नहीं छू पायीं.
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सिर्फ इस वजह से हार गयी
उपचुनाव में चुनावी रणनीतिकार (Strategist) की राष्ट्रीय पहचान रखने वाले प्रशांत कुमार जन सुराज के उम्मीदवार थे. भाजपा ने सामान्य कार्यकर्ताओं के बीच से उठाकर क्षेत्र के लिए बिल्कुल अपरिचित- अनजान चेहरा नीरज कुमार सिन्हा को उम्मीदवार बना दिया. प्रशांत किशोर की बड़ी जीत बड़ी आसानी से हो गयी. पूरी ताकत खपा देने के बाद भी भाजपा मात खा गयी तो सिर्फ इस वजह से कि उम्मीदवार बेहद कमजोर था. अपना कोई व्यक्तित्व- प्रभुत्व नहीं था. उम्मीदवारी घोषित होते ही यह बात हर जुबान पर आ गयी कि भाजपा की हार हुई, तो उसकी बड़ी वजह यही होगी. भाजपा की हार हो गयी. सामान्य समझ है कि नीरज कुमार सिन्हा की जगह कोई दूसरा मजबूत उम्मीदवार होता तो शायद परिणाम कुछ और निकलता.
घमंड बन गया उपचुनाव का मुद्दा
अभिमानी – अहंकारी भाजपा नेतृत्व ने बदली राजनीतिक परिस्थितियों के मद्देनजर ‘बाघ’ के मुकाबले ‘बाघ’ नहीं खड़ा कर अपने पांव में खुद कुल्हाड़ी मार ली. इस घमंड में कि जिस किसी को भी भाजपा की उम्मीदवारी मिलेगी, सामने जो कोई हो, जीत उसकी होगी ही. भाजपा नेतृत्व का वही घमंड इस उपचुनाव का मुख्य मुद्दा था, जो एक झटके में टूट गया. पार्टी नेतृत्व के लिए यह अधिक सदमादायक इसलिए है कि घमंड टूटा भी तो भाजपा अध्यक्ष (BJP President) नितिन नवीन के उस पुश्तैनी विधानसभा क्षेत्र में जिसकी भाजपा के गढ़ के रूप में तीन दशकीय पहचान रही है. भाजपा इसका प्रायश्चित किस रूप में करती है, यह देखना भी दिलचस्प होगा. वैसे, प्रशांत किशोर की जीत में जितना योगदान भाजपा नेतृत्व के घमंड का रहा उससे तनिक भी कम महागठबंधन (Grand Alliance) समर्थकों के मौन समर्थन का नहीं रहा.

अविनाश चन्द्र मिश्र समकालीन तापमान के संपादक हैं.
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