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बदलता बाजार : ऑनलाइन खरीदारी… फेरीवालों का खत्म कहानी!

वह हर रोज सुबह एक नयी जंग के लिए निकलता है, यह जानते हुए भी कि इस बाजार में उसकी हार पहले से ही तय है. अब तो गलियों में उसकी आवाज भी जैसे घुटकर रह गयी है. पहले उसकी एक हांक पर पूरा मोहल्ला जीवंत हो उठता था! अब उसकी आवाज कलाई घड़ियों के अलार्म और मोबाइल की रील के शोर में कहीं दफन हो गयी है.

  • खो गयी कहीं पूरी दुनिया

  • चमचमाते मलबे के नीचे दब गयी उम्मीदें

  • मेले भी हो गये अब कारपोरेट

  • आसमान का कलेजा भी कांप उठता होगा

डा. विजय गर्ग
24 जून 2026

चपन (Childhood) की यादों के किसी कोने में आज भी वह एक दृश्य ठहरा हुआ है- गांव की चौहद्दी पर लगे मेले की धूल, तपती गर्मी और उस सबके बीच से गुजरती एक पुरानी, चरमराती साइकिल. उस साइकिल (Bicycle) के पीछे कैरियर (Career) पर बंधी एक बांस की खपच्ची, जिसमें खोंसे हुए रंग-बिरंगे भोंपू, प्लास्टिक की गुड़िया, टिक-टिक करती तीतर-बटेर वाली गाड़ियां और हवा में लहराती लाल-पीली पन्नियों की फिरफिरियां. वह महज खिलौने (Toys) बेचने वाला नहीं था, वह सीधे अपनी पीठ पर खुशियों का पूरा का पूरा संसार लादे चला आता था. उसकी साइकिल की घंटी बजती थी, तो लगता था जैसे पूरे मोहल्ले के बच्चों के फेफड़ों में नयी हवा भर गयी हो.

पोटली अब कबाड़ का ढेर

आज लगता है कि हम सब बड़े क्या हुए, उस साइकिल वाले की पूरी दुनिया ही कहीं खो गयी. अब न वह घंटी सुनाई देती है, न मेले की उस धूल में वह जानी-पहचानी सूरत दिखाई देती है. ऐसा लगता है कि वक्त की तेज रफ्तार ने उस गरीब के पैरों के पैडल ही छीन लिये हैं. ऑनलाइन (Online) खरीदारी वाले इस नये जमाने में उस गरीब फेरीवाले (Hawkers) की पोटली अब कबाड़ (Scrap) का ढेर लगने लगी है. वह हर सुबह उठकर अपनी साइकिल की उतरी हुई चेन चढ़ाता है, जी-तोड़ पैडल मारता है. पर, कमबख्त वक्त का पहिया उससे बहुत आगे निकल चुका है. बाजार के इस चमचमाते मलबे के नीचे उसकी उम्मीदें और छोटा-सा हुनर घुटकर दम तोड़ चुके हैं.

नहीं देखना चाहती बेरहम दुनिया

लोग सच ही कहते हैं कि भूखे भजन न होय गोपाला, पर यहां तो पूरी जिंदगी ही भूख का अंतहीन भजन बन गयी है. यह सोच कर किसी का भी कलेजा फट जाये कि जो शख्स दूसरों के बच्चों के होठों पर चंद रुपयों में मुस्कान बिखेरने की जिद में अपनी एड़ियां घिस देता है, उसके अपने बच्चे रात को अक्सर भूखे पेट, रोते हुए सो जाते हैं. उसकी उस फटी कमीज के मैल और पसीने की गंध में ईमानदारी की आखिरी गवाही बची है, जिसे यह बेरहम दुनिया देखना ही नहीं चाहती. मेले का मतलब कभी होता था रिश्तों का मिलना, खुशियों का साझा होना, लेकिन अब मेले भी कॉरपोरेट (Corporate) हो गये हैं. बड़े-बड़े पंडाल, टिकट वाले झूले और वीआईपी पास के बीच उस साइकिल वाले को बाहर से ही खदेड़ दिया जाता है. डांट सुन कर सिर्फ उसकी साइकिल पीछे नहीं हटती, बल्कि उसका आत्मसम्मान भीतर तक लहूलुहान हो जाता है.

यही सिला दिया ईमानदारी का

वह अपनी ढीली पड़ चुकी चप्पल को घसीटता हुआ, सिर झुकाये किसी पेड़ की छांव में जा खड़ा होता है. उसकी वह लाचारी, उसका वह मौन विलाप देखकर आसमान का कलेजा भी कांप उठता होगा. उसने कभी किसी से भीख नहीं मांगी, उसने तो बस अपने पसीने की बूंदों से खिलौने सींचे थे, पर इस बेरहम दुनिया ने उसे उसकी ईमानदारी का यही सिला दिया. ऐसा लगता है कि वह सिर्फ एक खिलौने बेचने वाला (Toy seller) नहीं, बल्कि हमारी गुजर चुकी मासूमियत का आखिरी कफन है, जो धीरे-धीरे मैला हो रहा है. हम जितने आधुनिक (Modern) हो रहे हैं, उतने ही कसाई होते जा रहे हैं. हमें तरस आता है भूखे जानवरों (Hungry Animals) पर, हम सोशल मीडिया (Social Media) पर संवेदनाओं के समंदर बहा देते हैं, पर सामने खड़े उस जीते-जागते मरते हुए इंसान की सिसकी हमारे कानों तक नहीं पहुंचती. उसकी साइकिल का वह जर्जर ढांचा, जिसका हैंडल अब मुड़ चुका है और जिसकी गद्दी फटकर रुई उगल रही है, ठीक उसकी जिंदगी का आईना है.

बन चुका है जीता-जागता भूत

वह हर रोज सुबह एक नयी जंग के लिए निकलता है, यह जानते हुए भी कि इस बाजार में उसकी हार पहले से ही तय है. अब तो गलियों में उसकी आवाज भी जैसे घुटकर रह गयी है. पहले उसकी एक हांक पर पूरा मोहल्ला जीवंत हो उठता था! अब उसकी आवाज कलाई घड़ियों के अलार्म (Alarm) और मोबाइल की रील (Mobile reel) के शोर में कहीं दफन हो गयी है. लोग अपने घरों के ऊंचे दरवाजे और खिड़कियां बंद कर लेते हैं, ताकि बाहर की धूल और वह दरिद्रता भीतर न आ सके. वह बंद दरवाजों को देखता है, अपनी सूखी जीभ से होठों को चाटता है और बिना कुछ कहे आगे बढ़ जाता है. उसकी पीठ झुक गयी है, बाल समय से पहले सफेद हो गये हैं और हाथों की नसें इस तरह उभर आई हैं जैसे कोई सूखा हुआ दरख्त हो. वह एक जीता-जागता भूत बन चुका है, जो इंसानों की बस्ती में अपनी खोयी हुई जिंदगी ढूंढ रहा है.

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तब लोग उसे याद करेंगे

आखिर में जब वह इतिहास (History) के पन्नों से पूरी तरह गायब हो जायेगा, तब शायद हम उसे याद करें, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी. हमने अपनी तरक्की की वेदी पर एक बेहद मासूम और ईमानदार वजूद की बलि चढ़ा दी होगी. जब भी कभी किसी पुरानी अलमारी (Wardrobe) से वह धूल खाती हुई प्लास्टिक की फिरफिरी मिले, तो यह सोचने की जरूरत है कि इसे बेचने वाले के घर में उस दिन दीया जला था या नहीं. वह साइकिल वाला कोई कहानी का पात्र नहीं है, वह हमारी आंखों के सामने दम तोड़ती हुई एक संस्कृति (Culture) है, जिसकी मौत पर न कोई मातम मनेगा, न कोई आंसू बहायेगा. बस, हवा में उसकी साइकिल की वह आखिरी घंटी कहीं गूंजकर हमेशा-हमेशा के लिए खामोश हो जायेगी और हम अपनी सजी-धजी दुनिया में मगन रहेंगे, यह भूलकर कि किसी का पूरा वजूद हमारी बेरुखी की भेंट चढ़ गया.

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(डा विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्राचार्य हैं. विभिन्न विषयों पर सारगर्भित लेखन भी करते हैं.)
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