Sansanikhej Khulasa : डस्टबिन खरीद : वाकई हुआ घोटाला?

अस्पतालों को वास्तव में अंतर्रष्ट्रीय मानकों वाली ‘माइक्रोवेव कंपैटिबल’ मशीनरी तकनीक के डस्टबिन मिले हैं, तो इसे सरकारी नीतियों और नियमों का अनुपालन कहा जा सकता है. लेकिन, जांच में उजागर हुआ कि बड़ी राशि के भुगतान के बाद भी आपूर्तिकर्ताओं ने अस्पतालों में सामान्य ‘फुट-पेडल प्लास्टिक बिन’ ही पहुंचा दिये हैं, तो उससे बहुत बड़े घोटाले की पुष्टि खुद-ब-खुद हो जायेगी.
मंगल पाण्डेय के स्वास्थ्य मंत्री रहते हुआ यह सब
बीएमएसआईसीएल के जरिये होती है खरीद
सिंडिकेट ने बोलियों में घालमेल कर दिया!
जांच के लिए त्वरित पहल करे सरकार
तापमान लाइव ब्यूरो
17 अगस्त 2026
Patna : बिहार (Bihar) में 300 करोड़ का डस्टबिन (Dustbin) घोटाला ! सरसरी तौर पर यह चौंकाऊ खबर है. मामला बहुत गंभीर भी है. पर, राज्य में तीन- साढ़े तीन दशकों के दौरान हुए घोटालों की लम्बी फेहरिस्त में जगह मिल जाने के अलावा वर्तमान व्यवस्था में इसका कोई महत्व नहीं है. मुख्य रूप से यह सरकारी अस्पतालों में खरीद की कीमतों और बाजार मूल्य में कथित भारी अंतर से जुड़ा मामला है. विपक्ष और सोशल मीडिया (Social Media) ने मामले को घोटाले के रूप में पेश कर इसे राजनीतिक (Political) रंग दे दिया है. यह तर्क रखते हुए कि बाजार में जिस 75 लीटर के डस्टबिन की सामान्य कीमत एक से डेढ़ हजार रुपया है, स्वास्थ्य विभाग (Health Department) ने उसे 15 हजार 490 रुपये प्रति की दर से खरीदा है. यानी डस्टबिन खरीद में भारी घपलेबाजी हुई है. सोशल मीडिया में तकरीबन तीन सौ करोड़ के घोटाले का शोर है ! सचमुच ऐसा हुआ है क्या?
सामान्य डस्टबिन नहीं है यह !
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक डस्टबिन की खरीद तब हुई थी जब मंगल पाण्डेय (Mangal Pandey) स्वास्थ्य विभाग के मंत्री थे. वर्तमान में पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के पुत्र निशांत कुमार (Nishant Kumar) स्वास्थ्य विभाग के मंत्री (Minister) हैं. इस मुद्दे पर दोनों में से किसी का कोई बयान नहीं आया है. पर, मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक स्वास्थ्य विभाग के उपक्रम बिहार मेडिकल सर्विसेज एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर कारपोरेशन लिमिटेड (BMSICL) ने अपने तरीके से तमाम आरोपों का जवाब दिया है. अस्पतालों के लिए उपकरणों, दवाओं एवं जरूरत के अन्य सामान की खरीद इसी उपक्रम के जरिये होती है. सुब्रत सेन (Subrata Sen) इसके प्रबंध निदेशक (Managing Director) हैं. उनका कहना है कि लोग जिसे घरों या नगर निकायों में उपयोग होने वाले ‘प्लास्टिक की सामान्य बाल्टी या डस्टबिन’ समझ रहे हैं, वह असल में अस्पतालों को संक्रमण मुक्त रखने वाली बायो-मेडिकल वेस्ट डिस्पोजल सिस्टम का हिस्सा (Customized Bin) है. यह अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली आधुनिक ‘माइक्रोवेव-बेस्ड मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट’ मशीनों के अनुकूल उपकरण है.
राजनीतिक सांचे में ढाल दिया
मामला तब सार्वजनिक हुआ जब बेगूसराय (Begusarai) जिला निवासी एक व्यक्ति ने सूचना के अधिकार (RTI) का इस्तेमाल कर स्वास्थ्य विभाग और बिहार मेडिकल सर्विसेज एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर कारपोरेशन लिमिटेड से कुछ अस्पतालों में हुई डस्टबिन की खरीद के बिल और संबंधित दस्तावेज की मांग की. विभाग का जवाब आया, तो उसमें प्रति डस्टबिन की आधिकारिक कीमत 15 हजार 490 दर्ज थी. डस्टबिन के अंदर लगने वाले विशेष कचरा बैग (Container Bag) की कीमत भी सामान्य से काफी अधिक 75 से 96 रुपये दिखायी गयी थी. इसी दस्तावेज के आधार पर शिकायतकर्ता ने सरकारी खरीद दर और बाजार दर का एक तुलनात्मक खाका तैयार किया. वही खाका सनसनीखेज रूप में सोशल मीडिया में छा गया. यूट्यूबर पत्रकारों ने इसे राजनीतिक सांचे में ढाल दिया. बीएमएसआईसीएल के अधिकारियों का कहना रहा कि विशेष तकनीकी विनिर्देशों (Technical Specifications) के कारण इसकी कीमत सामान्य डस्टबिन से अधिक है. उनका दावा है कि खरीद नियमों के अनुरूप हुई है.

ऐसे हुआ आपूर्तिकर्ता का चयन
बीएमएसआईसीएल की मानें, तो अस्पतालों के लिए डस्टबिन की खरीद किसी स्थानीय बिक्रेता या आपूर्तिकर्ता से नहीं की गयी. भारत सरकार (Government of India) के गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (GeM) पोर्टल के माध्यम से खुली बोली (Open Bidding) द्वारा आपूर्तिकर्ता का चयन किया गया. न्यूनतम बोली लगाने वाले (L1 वेंडर) को आपूर्ति का काम दिया गया. यह जानने वाली बात है कि खुली बोली में शामिल आपूर्तिकर्ता सामान्य प्लास्टिक निर्माता नहीं हैं, बल्कि ये मेडिकल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स और ऑथराइज्ड बायो-मेडिकल सप्लायर्स हैं. ये कंपनियां अस्पतालों को कस्टमाइज्ड उपकरण और मशीनें आपूर्ति करती हैं. विपक्ष का आरोप है कि आपूर्ति की प्रक्रिया तो यही अपनायी गयी, पर कुछ चुनिंदा आपूर्तिकर्ताओं के सिंडिकेट ने बोलियों में घालमेल कर घोटाले का आधार खड़ा कर दिया.
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पर्यावरणीय वैधानिक दिशा – निर्देश
तकनीकी विशेषज्ञों के मुताबिक अस्पतालों के लिए सामान्य डस्टबिन की खरीद नहीं होती है. उसके लिए जो उपयुक्त डस्टबिन होते हैं, उसकी खरीद के लिए पर्यावरणीय वैधानिक दिशा – निर्देश जारी हैं. भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय द्वारा अधिसूचित नियमों के तहत अस्पतालों के संक्रामक कचरे को स्रोत पर ही अलग-अलग रंग के डिब्बों में विभाजित करना अनिवार्य है. नियमानुसार पीले और लाल रंग के डिब्बों में रखे संक्रामक कचरे को सीधे कचरा डंप में नहीं फेंका जा सकता. उसे पहले 100°C से अधिक के तापमान पर माइक्रोवेव (Microwave) या भाप के जरिए कीटाणुमुक्त करना पड़ता है. अस्पतालों में क्लोरीनेटेड प्लास्टिक बैग्स के इस्तेमाल पर प्रतिबंध है. ऐसा इसलिए कि इन्हें जलाने या गर्म करने से हानिकारक डाइऑक्सिन गैस निकलती है. इसी सतर्कता – बाध्यता के मद्देनजर स्वास्थ्य विभाग ने नॉन-क्लोराइड, बायोडिग्रेडेबल और हाई-टेम्परेचर रेसिस्टेंट बैग्स खरीदे, जिनकी कीमत आम पॉलीथिन से काफी ज्यादा होती है.
कुछ फर्मों के कोटेशन भी दिखाये
विपक्षी दलों, विशेष कर राजद (RJD) के नेताओं द्वारा मीडिया के समक्ष बतौर सबूत कुछ कागजात पेश किये गये, जो प्रशासनिक खामियों को इंगित करते हैं. विपक्ष ने बेगूसराय और अन्य स्वास्थ्य केंद्रों से जुड़े विभागीय स्टॉक रजिस्टर और भुगतान वाउचर की प्रतियां जारी कीं, जिनमें स्पष्ट रूप से प्रति डस्टबिन 15 हजार 490 और प्रति बैग 75 से 96 रुपये का भुगतान दर्ज है. इतना ही नहीं , विपक्ष ने मेडिकल उपकरणों की आपूर्ति करने वाले कुछ फर्मों के कोटेशन भी दिखाये हैं जिनमें 75 लीटर की समान क्षमता वाले मेडिकल-ग्रेड फुट-ऑपरेटेड बिन की कीमत 02 हजार 500 से 04 हजार रुपये के बीच दिखायी गयी थी. इसी दस्तावेज के आधार पर विपक्ष इसे सीधे तौर पर कीमत बढ़ा कर खरीद दिखाने(Over-Pricing) का मामला बता रहा है.
उच्च स्तरीय जांच की जरूरत
तथ्यों के गहराई से विश्लेषण में यह मामला प्रशासनिक पारदर्शिता और वास्तविक आपूर्ति के बीच झुलता दिख रहा है. बिहार मेडिकल सर्विसेज एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर कारपोरेशन लिमिटेड के दावे के अनुरूप अस्पतालों को वास्तव में अंतर्राष्ट्रीय मानकों वाली ‘माइक्रोवेव कंपैटिबल’ मशीनरी तकनीक के डस्टबिन मिले हैं, तो इसे सरकारी नीतियों और नियमों का अनुपालन कहा जा सकता है. लेकिन, जांच में उजागर हुआ कि बड़ी राशि के भुगतान के बाद भी आपूर्तिकर्ताओं ने अस्पतालों में सामान्य ‘फुट-पेडल प्लास्टिक बिन’ (Foot-Pedal Plastic Bin) ही पहुंचा दिये हैं, तो उससे बहुत बड़े घोटाले की पुष्टि खुद-ब-खुद हो जायेगी. सच का खुलासा फोरेंसिक ऑडिट (Forensic Audit) या फिर निगरानी जांच से ही हो पायेगा. गहराते खरीद विवाद के मद्देनजर ऐसी किसी जांच के लिए राज्य सरकार को त्वरित पहल करनी चाहिए. वर्तमान स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार को भी मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए.
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