Bihar Politics बांकीपुर में हार : पसर गयी राजद में रार!

राजद के लिए सबसे अधिक चिंता की बात यह रही कि हार के तुरंत बाद पार्टी के कई नेताओं ने सार्वजनिक रूप से संगठन और नेतृत्व पर सवाल उठाने शुरू कर दिये. ऐसे नेताओं में वरिष्ठ विधायक भाई वीरेन्द्र भी हैं. उन्होंने सीधे तौर पर नेतृत्व पर कुछ नहीं कहा, सांगठनिक अक्षमता पर प्रहार जरूर किया.
चुनावी हार से ज्यादा बड़ा संकट संगठनात्मक विश्वास का
बांकीपुर के उपचुनाव में भी वही सबक मिला तेजस्वी को
तब अनुशासन कमजोर पड़ जा सकता है राजद में
राजनीति अब एनडीए बनाम महागठबंधन के रूप में ही नहीं
अविनाश चन्द्र मिश्र
05 अगस्त 2026
Patna : बिहार (Bihar) का इतिहास बताता है कि कभी – कभी एक उपचुनाव (By-election) यहां की सत्ता का नहीं सही, राजनीति (Politics) का परिदृश्य बदल देता है. बांकीपुर (Bankipur) विधानसभा क्षेत्र के उपचुनाव का परिणाम भी बहुत कुछ वैसा ही संदेश देता दिख रहा है. खासकर राजद के भविष्य को लेकर. राजद (RJD) उपचुनाव में सिर्फ हार ही नहीं गया, उसकी उम्मीदवार रेखा गुप्ता (Rekha Gupta) की जमानत तक जब्त हो गयी. ऐसा क्यों हुआ, विवेचना का यह अलग मुद्दा है. फिलहाल उसकी एक सीट पर हार ही नहीं हुई है, यह राजद के भीतर लंबे समय से सुलग रहे असंतोष के सार्वजनिक होने का कारण भी बन गयी है. परिणाम घोषित होते ही जिस तरह के बयान आये, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि चुनावी हार से ज्यादा बड़ा संकट संगठनात्मक विश्वास का है. इससे सवाल केवल राजद की हार तक सीमित नहीं रह गया, पार्टी के भीतर नेतृत्व, निर्णय प्रक्रिया और राजनीतिक दिशा को लेकर उभरी असहमति भी इसकेे दायरे में आ गयी.
हार ही नहीं, चेतावनी भी
राजद ने पिछले कुछ वर्षों में बिहार की राजनीति में खुद को विपक्ष (Opposition) की सबसे बड़ी ताकत के रूप में स्थापित किया. पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष तेजस्वी प्रसाद यादव (Tejashwi Prasad Yadav) ने पलायन, रोजगार, शिक्षा और युवाओं के मुद्दों को शिद्दत से उठा अपनी अलग राजनीतिक पहचान बना ली. लेकिन, 2025 के विधानसभा चुनाव में पिछड़ जाने से लस्त- पस्त तेजस्वी प्रसाद यादव को बांकीपुर के उपचुनाव में भी वही सबक मिला कि जनसभाओं की भीड़ और सोशल मीडिया (Social Media) पर सक्रियता ही चुनावी सफलता की गारंटी नहीं होती. जमीनी हकीकत यही है कि शहरी मतदाताओं, युवा वर्ग और नये मतदाताओं तक प्रभावी पहुंच बनाने में राजद अब भी संघर्ष करता दिख रहा है. यह कमजोरी इसी रूप में बनी रही, तो आगामी चुनावों में इसका ‘जड़ उखारू’ असर पड़ सकता है.
सार्वजनिक बयानबाज़ी ने बढ़ाई चिंता
राजद के लिए सबसे अधिक चिंता की बात यह रही कि हार के तुरंत बाद पार्टी के कई नेताओं ने सार्वजनिक रूप से संगठन और नेतृत्व पर सवाल उठाने शुरू कर दिये. ऐसे नेताओं में वरिष्ठ विधायक (MLA) भाई वीरेन्द्र (Brother Virendra) भी हैं. उन्होंने सीधे तौर पर नेतृत्व पर कुछ नहीं कहा, सांगठनिक अक्षमता पर प्रहार जरूर किया. राजनीतिक दलों में मतभेद असामान्य बात नहीं होती, लेकिन जब वे खुले मंच पर सामने आने लगें तो प्रतिद्वंद्वी दलों को स्वाभाविक रूप में राजनीतिक हथियार मिल जाता है. ऐसे में इस असंतोष को समय रहते नहीं संभाला गया, तो राजद के कार्यकर्ताओं का मनोबल प्रभावित हो सकता है और संगठन में अनुशासन कमजोर पड़ जा सकता है.
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नेतृत्व की सबसे बड़ी परीक्षा
यह निर्विवाद है कि लालू प्रसाद (Lalu Prasad) के बाद तेजस्वी प्रसाद यादव ही राजद के सबसे बड़ा चेहरा हैं. उनकी जन स्वीकार्यता और राजनीतिक विश्वसनीयता पर बहुत कम लोग सवाल उठाते हैं. लेकिन, अब संगठन को साथ लेकर चलने की उनकी क्षमता के समक्ष चुनौती खड़ा हो गयी है. हर बड़े नेता के राजनीतिक जीवन में एक समय ऐसा आता है जब उसे केवल चुनाव नहीं, अपनी पार्टी को भी संभालना पड़ता है. यह कहें कि बांकीपुर की हार के बाद तेजस्वी प्रसाद यादव राजनीति के उसी मोड़ पर आ गये हैं, तो वह तनिक भी अप्रासंगिक नहीं होगा.
प्रशांत किशोर के रूप में नयी चुनौती
भविष्य में क्या होगा, यह अभी नहीं कहा जा सकता, तात्कालिक तौर पर बांकीपुर के उपचुनाव परिणाम ने इस मिथक को तो तोड़ ही दिया कि बिहार की राजनीति अब एनडीए (NDA) बनाम महागठबंधन (Mahagathbandhan) के रूप में सीमित नहीं रह गयी है. बांकीपुर में प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) की जीत के बाद जन सुराज पार्टी (Jan Suraj Party) शहरी और शिक्षित मतदाताओं के बीच अपनी पैठ बढ़ाती है, तो विपक्षी मतों के नये ढंग से बंटवारे की संभावना को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता. राजद के लिए यह चुनौती इसलिए भी बड़ी है कि पारंपरिक सामाजिक आधार के बाहर जनाधार विस्तार की उसकी कोशिश प्रायः विफल ही रही है. वैसे, जाति आधारित राजनीति के लिए कुख्यात बिहार में आगे के चुनावों में भी ऐसा ही परिणाम आयेगा, यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता. इसलिए कि कतिपय विश्लेषकों की नजर में बांकीपुर का परिणाम ‘पानी के बुलबुले’ की तरह है. तब भी राजद के लिए इसे हल्के में लेना राजनीतिक भूल होगी.
तब हो जायेगा नुकसान
बिहार में राजनीति के बदलते स्वरूप- समीकरण के मद्देनजर राजद को अब मुख्य रूप से तीन मोर्चों पर एक साथ कदम बढ़ाना होगा. संगठन के भीतर बढ़ते असंतोष को शांत करना होगा. नयी राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप चुनावी रणनीति तैयार करनी होगी. युवाओं, शहरी मतदाताओं और नये सामाजिक समूहों के बीच प्रभाव बढ़ाना होगा. पार्टी आत्ममंथन करती है और संगठनात्मक सुधार लाती है, तो यह हार उसकी भविष्य की जीत का आधार बन जा सकती है. इसके बरक्स गुटबाज़ी, बयानबाज़ी और नेतृत्व पर अविश्वास बढ़ता रहा, तो यह बड़ा राजनीतिक नुकसान साबित हो जा सकता है. फैसला राजद नेतृत्व को करना है. वह इस परिणाम को एक सामान्य चुनावी हार मानकर आगे बढ़ेगा या इसे संगठन को नये सिरे से खड़ा करने का अवसर बनायेगा. उसकी राजनीति का अगला अध्याय बहुत कुछ इसी पर निर्भर करेगा.

अविनाश चन्द्र मिश्र समकालीन तापमान के संपादक हैं.
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