Major issue समझिये ‘जेन-जी’ को : जंतर मंतर पर बवाल! विदेशों से जुड़े तार ?

यह ‘जेन- जी’ आखिर है क्या? इस शब्द की उत्पत्ति कहां, क्यों और कैसे हुई? इसका वैश्विक इस्तेमाल अब किस मकसद से और कैसे हो रहा है? इन तमाम सुलगते सवालों का दो किस्तों के आलेख में बेबाक विश्लेषण किया है देश के जाने- माने लेखक- पत्रकार एवं कवि अनिल विभाकर ने. प्रस्तुत है दूसरी और अंतिम किस्त…
जंतर- मंतर पर दिखे कुछ संदिग्ध विदेशी नागरिक
भारत को अस्थिर व खंडित करने की साजिश
अनेक एनजीओ संचालक भी सक्रिय थे आंदोलन में
उजागर हो गया असली राजनीतिक मकसद
अनिल विभाकर
12 अगस्त 2026
बंगलादेश (Bangladesh) और नेपाल (Nepal) के बाद ‘जेन – जी’ (Gen-Z) का तीसरा प्रायोगिक आंदोलन ‘कोकरोच जनता पार्टी’ (Cockroach Janata Party) के बैनर तले भारत (India) में हुआ. नयी दिल्ली (New Delhi) के जंतर-मंतर (Jantar Mantar) से शुरू इस ‘जेन जी आंदोलन’ में भी जमकर हिंसा और उपद्रव हुए. शांतिपूर्ण प्रदर्शन के नाम पर 20 जुलाई 2026 को जंतर-मंतर से लेकर संसद (Parliament) के समीप तक जैसी अराजकता दिखी उसका समर्थन कोई नहीं कर सकता. ‘ जेन – जी ‘ की यह उग्र भीड़ यदि संसद में घुसने में सफल हो जाती तो उस दिन अनर्थ हो जाता. कहने की जरूरत नहीं कि नीट पेपर लीक (NEET paper leak) की आड़ में दिल्ली में ‘ जेन जी ‘ ने कैसी अराजकता फैलायी. यह भी गौर करने की बात है कि राजधानी नयी दिल्ली में काकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का संस्थापक अभिजित दीपके (Abhijit Deepke) भी मोहम्मद यूनुस (Muhammad Yunus) की तरह उड़कर अमेरिका (America) से ही नयी दिल्ली आया. अभिजित दीपके जब दिल्ली पहुंचा तो हवाई अड्डे पर उसकी अगवानी करने गिनती भर ही लोग पहुंचे. जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक (Sonam Wangchuk) ने पहुंचकर समर्थन में अनशन शुरू किया तब भी वहां अपेक्षित भीड़ नहीं जुटी.
सामने आ गये तमाम छिपे चेहरे
फिर बात बनती नहीं देख इस आंदोलन के पीछे छिपे सारे चेहरे एक- एक कर सामने आने लगे. अरविन्द केजरीवाल (Arvind Kejriwal) , प्रशांत भूषण (Prashant Bhushan) , अरुंधती राय (Arundhati Roy) , योगेन्द्र यादव (Yogendra Yadav) , राकेश टिकैत (Rakesh Tikait) , पवन खेड़ा (Pawan Khera) , जेएनयू (JNU) के वामपंथी छात्र से लेकर वामपंथी दलों और कांग्रेस (Congress) से जुड़े संगठनों के नेताओं – कार्यकर्ताओं का पहुंचना वहां शुरू हो गया.वहां आतंकवाद निरोधक कानून के तहत जेल में वर्षों से बंद शर्जील इमाम (Sharjeel Imam) और उमर खालिद (Umar Khalid) के समर्थन में नारे गूंजने लगे. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) के खिलाफ भद्दी – भद्दी गालियों की बौछार होने लगी. जेन -जी आंदोलनकारियों ने जम्मू – कश्मीर (Jammu and Kashmir) में धारा 370 और 35 ए की वापसी की मांग शुरू कर दी. इन आंदोलनकारियों के बीच जंतर-मंतर पर कुछ अमेरिकी और अन्य देशों के संदिग्ध नागरिक भी देखे गये.
भारत को खंडित करने पर आमादा
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्थिति की गंभीरता भांप इसमें सीधे हस्तक्षेप नहीं किया होता तो हालात इतने भयावह हो जाते कि संभाले नहीं संभलते.तब भारत को नेपाल तथा बंगलादेश बनाने का सपना देख रहे लोगों की बांछें खिल उठतीं. यह कहना गलत नहीं होगा कि ‘जेन जी ‘ के नाम पर दुनिया में अब तक जो भी आंदोलन हुए उसके पीछे अमेरिका और उसके डीप स्टेट का हाथ है. भारत को खंडित और अस्थिर करने पर आमादा है अमेरिका. इसलिए उसने ‘जेन जी ‘ का इस्तेमाल कर बंगलादेश में भारत समर्थक शेख हसीना सरकार का तख्तापलट कराया. भारत के पड़ोसी नेपाल में तख्तापलट और उपद्रव के पीछे भी ‘जेन जी ‘ और अमेरिका ही थे. अमेरिका का मकसद नेपाल को चीन के प्रभाव से मुक्त कर अमेरिका समर्थक भारत विरोधी सरकार बनाना था जिसमें वह सफल रहा. बंगलादेश में भी उसका मकसद भारत समर्थक शेख हसीना (Sheikh Hasina) सरकार को अपदस्थ कर अमेरिका समर्थक सरकार ही बनाना था. भारत में भी नीट पेपर लीक की आड़ में कथित ‘जेन जी’ आंदोलन में निसंदेह अमेरिका का ही हाथ है.
खर्च कर रहा अरबों डालर
नरेन्द्र मोदी सरकार अमेरिका को फूटी आंख नहीं सुहा रही. इस सरकार को अपदस्थ करने के लिए वह अरबों डालर खर्च कर रहा है. इस समय भारत में सौ से ज्यादा ऐसे एनजीओ हैं जिन्हें अमेरिका से बड़ी मात्रा में वित्तीय मदद मिलती है. दर्जनों एनजीओ और अन्य देशविरोधी शक्तियों पर जार्ज सोरोस अरबों डॉलर खर्च कर रहा है सो अलग. जंतर-मंतर पर काकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में वे सभी एनजीओ चलाने वाले सक्रियता से शामिल थे जिन्हें विदेशों से वित्तीय पोषण मिल रहा है. ‘जेन जी ‘ और कोकरोचों के आंदोलन में शामिल लोगों के लिए जंतर-मंतर पर जोमैटो और अन्य फूड डिलिवरी ऐप से विदेशों से मुफ्त में पिज्जा, बर्गर और तरह – तरह के स्वादिष्ट व्यंजन आ रहे थे.
अराजकता ही अराजकता
बंगलादेश, नेपाल और भारत में ‘जेन जी ‘ के आंदोलनों में एक बात सामान्य थी. वह थी अराजकता. तीनों आंदोलनों में अराजकता ही अराजकता देखने को मिली. इसे देखकर तो यही कहा जा सकता है कि ‘जेन जी ‘ अराजक युवकों का वह वर्ग है जिसे अमेरिका अपने हित के लिए संचालित कर रहा है. जंतर-मंतर पर ‘जेन – जी’ का आंदोलन नीट पेपर लीक के विरोध में हुआ. यह सही है कि नीट पेपर लीक एक बहुत गंभीर मुद्दा है. सरकार को शिक्षा और परीक्षा प्रणाली पारदर्शी और दुरुस्त करनी ही चाहिए. यह बहुत जरूरी है मगर यह केवल बारह वर्ष में उत्पन्न समस्या नहीं है. इससे पहले की गैर भाजपा सरकारों में भी पेपर लीक होते रहे हैं जिसके विरोध में ‘जेन जी’ और छात्रों ने सड़कों पर उतर कभी इस तरह उत्पात नहीं मचाया.
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सिर्फ बहाना था वह आंदोलन का
पेपर लीक इस बार ‘जेन जी ‘ के लिए आंदोलन का सिर्फ बहाना भर था. पंजाब में, जहां अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (Aam Aadmi Party) की सरकार है , वहां भी पेपर लीक हुआ. कांग्रेस शासित कर्नाटक (Karnataka) और केरल (Kerala) में भी पेपर लीक की घटनाएं हुईं. झारखंड (Jharkhand) में भी लगातार पेपर लीक की घटनाएं हो रही हैं जहां हेमंत सोरेन की सरकार है. कांग्रेस उसमें साझीदार है. मगर झारखंड, पंजाब और केरल में काकरोच जनता पार्टी ने इसके विरोध में आंदोलन करना जरूरी नहीं समझा. काकरोच जनता पार्टी के नेता तो अब सुप्रीम कोर्ट का आदेश – निर्देश भी नहीं मान रहे. इसके नेता एक तरफ तो यह कहते हैं कि प्रदर्शन में हिंसा करने वाले भाजपा (BJP) और आरएसएस (RSS) के गुंडे थे. मगर इन गुंडों पर कार्रवाई का सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) का आदेश मानने से न सिर्फ इनकार दिया बल्कि इसके विरोध में फिर से सड़क पर उतरने की धमकी दे रहे हैं. काकरोच नेता आखिर भाजपा – आर एस एस के गुंडों को क्यों बचाना चाहते हैं ? इसका अर्थ यह है कि काकरोच नेता न तो सुप्रीम कोर्ट को मानते, न संविधान को और न ही केन्द्र सरकार को. इससे ऐसा लगता है कि काकरोच नेता कहीं विदेशी मोहरे तो नहीं ?
उजागर हो गया मकसद
दरअसल अब ‘ जेन- जी ‘ आंदोलन का असली राजनीतिक मकसद उजागर हो गया है. यह उजागर हो गया कि उनके लिए नीट पेपर लीक और छात्र हित सिर्फ बहाना है. निशाना तो कुछ और है. जो विपक्षी दल काकरोच जनता पार्टी को समर्थन देने सामने आये , जनता में उनकी विश्वसनीयता नहीं है. देश की जनता चुनावों में उन्हें लगातार नकार रही है. इसलिए विपक्षी दल इस आंदोलन को समर्थन देकर अपना पुनर्जीवन और देश को नेपाल एवं बगलादेश बनाना चाहते हैं. सरकार का विरोध करने में कोई हर्ज नहीं. विपक्षी दलों का यह लोकतांत्रिक अधिकार है. मगर देश का विरोध कहीं से उचित नहीं. अच्छी बात यह है कि नरेन्द्र मोदी सरकार ने तत्परता दिखाते हुए पेपर लीक रोकने के लिए कड़ा कानून बनाने की आवश्यक संवैधानिक प्रक्रिया पूरी कर ली. सप्ताह भर में ही यह कानून लागू भी हो गया. एक बात और, भारत तो बंगलादेश और नेपाल बनने से रहा. भाजपा नीत केंद्र की एनडीए सरकार को विपक्षी दल यदि अपदस्थ करना चाहते हैं तो वे चुनाव में उसे हराकर ऐसा कर सकते हैं. यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार है. मगर इसके लिए विपक्षी दलों को आत्मविश्लेषण और ईमानदारी से चिंतन करना होगा. उन्हें जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता कायम करनी होगी तभी यह संभव है. (समाप्त)

अनिल विभाकर देश के जाने-माने लेखक-पत्रकार एवं कवि हैं.
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