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Bihar Politics : इमामगंज टू बांकीपुर … टिकाऊ नहीं होती उपचुनाव की चमक!

विष्णुकांत मिश्र
14 अगस्त 2026
Patna : प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) बड़ी पहचान वाले चुनावी रणनीतिकार हैं. 2014 से पहले उनकी ख्याति सिकुड़ी – सिमटी थी. 2014 के लोकसभा (Lok Sabha) चुनाव में भाजपा (BJP) के रणनीतिकार की भूमिका में रहे. विशेष कर गुजरात (Gujarat) के तब के मुख्यमंत्री (CM) नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) के. लोकसभा चुनाव में भाजपा को अकल्पित – अप्रत्याशित जीत मिली, नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री (PM) बन गये. इस जीत के मौलिक कारण जो रहे हों, चुनावी रणनीतिकार के रूप में प्रशांत किशोर को राष्ट्रीय फलक मिल गया. उस चुनाव के करीब सवा आठ साल बाद 02 अक्तूबर 2022 को जन सुराज (Jan Suraj) अभियान के तहत ‘बिहार (Bihar) बदलाव यात्रा’ के रूप में उन्होंने राजनीति में कदम रखा. फिर जिस अंदाज में चुनावी राजनीति में उनका प्रवेश हुआ, वह अपने आप में असाधारण था.

02 अक्तूबर 2024 को जन सुराज पार्टी (JSP) की स्थापना हुई और अगले ही माह नवंबर में चार विधानसभा क्षेत्रों के उपचुनाव (By-election) में उन्होंने अपने उम्मीदवार उतार दिये. फिर साल भर बाद ही 2025 के विधानसभा चुनाव (Assembly Eiections) में लगभग सभी निर्वाचन क्षेत्रों में उम्मीदवार खड़ा करने का महत्वाकांक्षी प्रयोग किसी नये राजनीतिक दल के लिए बेशक बेहद चौंकाऊ था. बात 2024 के चार उपचुनावों की, तो उसके नतीजों में संगठन और चुनावी प्रभाव के बीच दूरी दिखी. 2025 के विधानसभा चुनाव ने इस दूरी को और बढ़ा दिया. ऐसे में 2026 के बांकीपुर उपचुनाव (Bankipur By-election) में प्रशांत किशोर की जीत को समझने के लिए इन तीन चुनावी पड़ावों को एक साथ देखना आवश्यक है.

नवंबर 2024 के उपचुनाव उम्मीद की पहली किरण के रूप में जन सुराज पार्टी के लिए पहली वास्तविक चुनावी परीक्षा थी. उपचुनाव गया (Gaya) जिले के बेलागंज (Belaganj) एवं इमामगंज (Imamganj) , कैमूर (Kaimur) के रामगढ़ (Ramgarh) और भोजपुर (Bhojpur) जिले के तरारी (Tarari) विधानसभा क्षेत्रों में.हुए थे. चारो में जन सुराज पार्टी की हार हो गयी. लेकिन, इमामगंज और बेलागंज के परिणामों ने राजनीति का ध्यान जरूर खींचा. इमामगंज में डा. जितेंद्र पासवान जन सुराज पार्टी के उम्मीदवार थे. तीसरे स्थान पर अटक जरूर गये, पर 37 हजार 103 मत उन्हें मिले. यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण था कि उन्होंने सीधे तौर पर राजद (RJD) के चुनावी समीकरण को प्रभावित कर दिया था. चुनाव मैदान में उनकी मौजूदगी राजद की हार का बड़ा कारण बन गयी.

बेलागंज में जन सुराज के प्रत्याशी मोहम्मद अमजद को 17 हजार 285, रामगढ़ में सुशील कुमार सिंह को 06 हजार 513 और तरारी में किरण सिंह को 05 हजार 592 मत प्राप्त हुए थे. यानी चारो सीटों के चुनावी संदेश में समानता नहीं थी. कुछ क्षेत्रों में जन सुराज पार्टी की पकड़ नहीं दिखी, तो कुछ में पारंपरिक दलों के मतों में सेंध लगाने में वह सफल रही. विशेष रूप से इमामगंज का परिणाम उल्लेखनीय रहा. वहां जन सुराज को मिले 37 हजार से अधिक मत केवल संख्यात्मक उपलब्धि नहीं थी, उसने यह संकेत दिया कि कोई तीसरी शक्ति परम्परागत दलों के खिलाफ उफनते असंतोष या नये राजनीतिक विकल्प की आकांक्षा को संगठित कर परिणामों को अपने पक्ष में मोड़ ले सकती है.

लेकिन, 2025 के विधानसभा चुनाव ने तस्वीर बदल दी. उपचुनाव की चमक इस चुनाव में टिक नहीं पायी. इमामगंज में जन सुराज पार्टी के डा.अजीत कुमार को 11‌ हजार 912 मत ही मिल पाये जबकि उपचुनाव में डा. जितेंद्र पासवान को 37 हजार 103 मत मिले थे. यानी एक वर्ष में ही जन सुराज पार्टी के मतों में करीब 25‌ हजार की गिरावट आ गयी. बेलागंज में 2024 में मोहम्मद अमजद को 17 हजार 285 मत मिले थे, जबकि 2025 में मोहम्मद शहाबुद्दीन को महज 01 हजार 621 मत ही मिल पाये.

आमतौर पर ऐसा उलटफेर इस कारण होता है कि उपचुनाव में मतदाताओं का व्यवहार स्थानीय असंतोष, उम्मीदवार की व्यक्तिगत स्वीकार्यता, सत्ता-विरोध, कम मतदान, स्थानीय समीकरण और मुख्य मुकाबले से बाहर तीसरे विकल्प को लेकर प्रयोग की इच्छा से प्रभावित होता है. जबकि आम विधानसभा चुनाव में मतदाता सत्ता बनाने-बिगाड़ने का सवाल लिये रणनीतिक मतदान करते हैं. यही वजह रही कि 2024 के उपचुनाव परिणाम में जन सुराज की संभावना दिखी, लेकिन 2025 के सामान्य चुनाव ने उसकी संगठनात्मक सीमा सामने रख दी. यहीं से बांकीपुर उपचुनाव का महत्व शुरू होता है.

2025 के विधानसभा चुनाव में बांकीपुर में भाजपा के नितिन नवीन (Nitin Navin) ने 98 हजार 299 मत हासिल कर 51 हजार 936 मतों के अंतर से बड़ी जीत दर्ज की थी. जन सुराज की उम्मीदवार वंदना कुमारी को 07 हजार 717 मत ही मिल पाये थे. मतलब 2025 में इस विधानसभा क्षेत्र में जन सुराज की स्थिति उल्लेख करने लायक नहीं थी. एक साल बाद उसी बांकीपुर में प्रशांत किशोर मैदान में उतरे और उपचुनाव जीत गये. इसका अर्थ स्पष्ट है कि प्रशांत किशोर का व्यक्तिगत राजनीतिक प्रभाव जन सुराज के संगठनात्मक प्रभाव से कहीं बड़ा है. इसको इस रूप में भी समझा जा सकता है कि जन सुराज पार्टी अभी ‘पार्टी पहले, नेता बाद में’ वाली अवस्था में नहीं पहुंची है. अभी वह ‘नेता पहले, संगठन बाद में’ वाली अवस्था में है. इसके मद्देनजर बांकीपुर की जीत प्रशांत किशोर की व्यक्तिगत राजनीतिक पूंजी का प्रमाण है. इसे अभी जन सुराज के प्रभाव का प्रमाण नहीं माना जा सकता है.

विष्णुकांत मिश्र बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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