Jogiya Case : दर्द दिनारा का… रास्ता न्याय का या प्रतिशोध का ?

अपराध, अपराधी और उसकी जाति के बीच का फर्क मिट गया है. आरोपित को उसकी पूरी जाति का प्रतिनिधि बना दिया गया है तो पीड़ित को पूरे समुदाय का. यही राजनीति का दोगलापन है. अपराध व्यक्ति करता है. सामूहिक सजा उसकी पूरी जाति को देने की मानसिकता प्रतिशोध खड़ा कर देती है.
सामाजिक सद्भाव के लिए गंभीर चुनौती
प्रतिशोध खड़ा कर देती है यह मानसिकता
ऐसा ही कुछ हो रहा है जोगिया के मामले में
कानून ही है हिंसा और प्रतिहिंसा का जवाब
अविनाश चन्द्र मिश्र
14 अगस्त 2026
रोहतास (Rohtas) के दिनारा (Dinara) थाना क्षेत्र के जोगिया (Jogiya) गांव में हुई हिंसा और प्रतिहिंसा कानून – व्यवस्था के सवाल को पीछे छोड़ तुच्छ राजनीति (Politics) और उग्र जातीय गोलबंदी का मुद्दा बनती जा रही है. समाधान इसका कानून के दायरे में होना चाहिए, तो गांव की सडकों – गलियों में फरिया लेने का द्विपक्षीय ताव दिखाया जा रहा है. खतरे की बात यह कि दुष्परिणाम की चिंता किये बिना इस ताव पर राजनीति की रोटी भी सेंकी जा रही है. असर इस रूप में परिलक्षित है कि गांव का विवाद दो पक्षों के बीच नहीं रह, संपूर्ण सामाजिक सद्भाव के लिए गंभीर चुनौती बनता प्रतीत हो रहा है. इस वजह से और भी कि हिंसा-प्रतिहिंसा की व्याख्या दोनों पक्ष अपने- अपने ढंग से कर रहे हैं. एक पक्ष प्रतिशोध बता रहा है तो दूसरा सामंती (Feudal) व जातीय उत्पीड़न की बात कर रहा है. विवाद में राजनीति इसी राह प्रवेश कर गयी है.
सभ्य समाज के लिए दुर्भाग्य
अपराध (Crime) , अपराधी और उसकी जाति (Caste) के बीच का फर्क मिट गया है. आरोपित को उसकी पूरी जाति का प्रतिनिधि बना दिया गया है तो पीड़ित को पूरे समुदाय का. यही राजनीति का दोगलापन है. अपराध व्यक्ति करता है. सामूहिक सजा उसकी पूरी जाति को देने की मानसिकता प्रतिशोध खड़ा कर देती है. यह स्थापित तथ्य है कि जातीयता बिहार (Bihar) की राजनीति का मूल तत्व है. इधर के वर्षों में अपराध, पुलिस (Police) की कार्रवाई और स्थानीय विवादों तक को जातीय नजरिये से देखने और उबलने की बढ़ी प्रवृत्ति ने समाज और सरकार, दोनों की चिंता बढ़ा रखी है. इसे सभ्य समाज के लिए दुर्भाग्य कहा जायेगा कि जोगिया की हिंसा और प्रतिहिंसा के मामले में भी सत्ताकांक्षी राजनीतिक दल और उसके नेता घटना के तथ्य, पुलिस की जांच और न्यायिक प्रक्रिया शुरू होने से पहले यह तय कर बैठे कि कौन आरोपित किस जाति का है और किसके पक्ष में आवाज उठानी है कि चुनाव (Election) में उसका अधिकाधिक लाभ मिल सके.
‘सामंती सोच’ का परिणाम…
सामान्य समझ में राजनीति का काम पीड़ितों- प्रभावितों को न्याय मिले, इसके लिए शासन- प्रशासन पर दबाव बनाना होता है. इस मूल दायित्व को दरकिनार कर राजनीति पीड़ित की जाति को वोट बैंक (Vote Bank) और आरोपित की जाति को राजनीतिक दुश्मन बनाने लगे तो फिर न्याय (Justice) पीछे छूट जाता है. जोगिया के मामले में ऐसा ही कुछ हो रहा है. राजद (RJD) के अघोषित सुप्रीमो एवं विधानसभा में नेता, प्रतिपक्ष तेजस्वी प्रसाद यादव (Tejashwi Prasad Yadav) ने मिल्की मनिहारी (Milky Manihari) गांव में दिवंगत मजदूर चंदेश्वर चौधरी (Chandeshwar Chaudhary) के शोकमग्न परिवारजनों से मुलाकात की और घटना को ‘सामंती सोच’ का परिणाम बताया. यह भी कहा कि एनडीए (NDA) सरकार में सामंती ताकतें फिर से पनप रही हैं और गरीब-निर्दोष लोगों का शोषण-उत्पीड़न हो रहा है. उनके इस कथन का सामाजिक सद्भाव पर कैसा असर पड़ सकता है, इसे समझने की जरूरत है. ‘सामंती सोच’ से जाति बोध नहीं होता , पर भाव वैसा ही कुछ निकलता है.
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एकजुटता की सीख
चंदेश्वर चौधरी की हत्या के बाद जोगिया और मिल्की मनिहारी गांवों के जो दृश्य सोशल मीडिया (Social Media) में आये हैं वे इस बात को दर्शाते हैं कि प्रतिशोधात्मक कार्रवाई को भाकपा – माले (CPI-ML) का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष समर्थन मिला हुआ था. घटना के दूसरे- तीसरे दिन पार्टी के छोटे-बड़े तमाम इलाकाई नेताओं ने जिस अंदाज में गांव के ‘शोषितों -पीड़ितों’ को एकजुटता की सीख दे रहे थे, विश्लेषकों की नजर में उसमें सामाजिक सद्भाव की बात कम, ‘प्रतिकार’ का भाव अधिक था. हो सकता है, ‘रणवीर सेना जिन्दाबाद’ और ‘ब्रह्मेश्वर मुखिया (Brahmeshwar Mukhiya) अमर रहें’ के नारों से गांव वालों को भयमुक्त रखने के लिए उन्होंने ऐसा किया हो. जोगिया गांव में रणवीर सेना (Ranvir Sena) से संबंधित नारे हत्यारोपित अजीत तिवारी (Ajit Tiwari) की गिरफ्तारी के बाद बक्सर (Buxar) और भोजपुर (Bhojpur) जिलों से आये लोगों ने लगाये थे.
‘सामाजिक बारूद’ ही कहा जायेगा
दशकों बाद इस तरह के ‘प्रतिबंधित और विवादित’ नारों का सार्वजनिक रूप से गूंजना दर्शाता है कि इस विवाद को जातीय लड़ाई में तब्दील करने की पुरजोर कोशिश की जा रही है. सत्ता को सवालों में घेरना विपक्ष का लोकतांत्रिक अधिकार है. कानून-व्यवस्था का बचाव सत्ता पक्ष की स्वाभाविक प्रक्रिया है. लेकिन, इसकी सीमा वहीं समाप्त हो जाती है जहां जातीय तनाव जैसे हालात दिखने लग जाते हैं. विपक्ष का कोई नेता न्याय की मांग करता है तो वह उचित है. लेकिन, अपने बयान में आरोपित के साथ संबद्ध समुदाय को कटघरे में खड़ा करता है तो उसे ‘सामाजिक बारूद’ ही कहा जा सकता है. आरोपित या पीड़ित की जाति को पूरे समुदाय की पहचान बना देना समस्या का समाधान नहीं, उसका विस्तार है. इसको दृष्टिगत रख जोगिया की हिंसा और प्रतिहिंसा का जवाब कानून से मिले, जाति या समुदाय से नहीं. आगे क्या होगा, कहना कठिन है, फिलहाल पुलिस की कार्रवाई में इसकी झलक दिख रही है.

अविनाश चन्द्र मिश्र समकालीन तापमान के संपादक हैं.
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