Vishleshan : बांकीपुर में बंटाधार … गढ़ नहीं, गुरूर हारा !

विश्लेषणों में यह तथ्य सामने आया कि भाजपा के पारंपरिक समर्थक सामाजिक समूहों के बड़े हिस्से का साथ उसे मिला, लेकिन उन्हीं सामाजिक समूहों के युवाओं के बीच प्रशांत किशोर की स्वीकार्यता अपेक्षाकृत अधिक दिखी. इसे भाजपा के लिए खतरनाक संकेत के रूप में रेखांकित किया जा सकता है.
बिहार की राजनीति में खड़ा हुआ बहुत बड़ा सवाल
भाजपा के लिए खतरनाक संकेत है यह
बूथ प्रबंधन बेहद कमजोर व निराशाजनक रहा
व्यक्तिगत ब्रांड ने पछाड़ दिया संगठन को
अविनाश चन्द्र मिश्र
07 अगस्त 2026
पटना (Patna) के बांकीपुर उपचुनाव (Bankipur by-election) के परिणाम को सिर्फ जीत – हार की दृष्टि से देखना और मानना राजनीतिक (Political) भूल होगी. इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि तीन दशक से अधिक समय से भाजपा (BJP) के शहरी क्षेत्र के इस अपराजेय गढ़ में जन सुराज (Jan Suraj) के सूत्रधार प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) की जीत ने बिहार (Bihar) की राजनीति में बहुत बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. यह कि क्या भाजपा के पारंपरिक शहरी समर्थक राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व के नाम पर मतदान करने के बजाय जन सरोकार से जुड़े मुद्दों पर आधारित विकल्प तलाशने लगे हैं? बांकीपुर भाजपा के लिए एक सीट ही नहीं, भरोसे का क्षेत्र रहा है. इसलिए उसने इसे अपना मजबूत गढ़ समझ चुनाव के लिहाज से सुरक्षित मान लिया था. पर, आठ चुनावों में मिली लगातार जीत जनित अहंकार के मद्देनजर उम्मीदवारी जिस किसी को भी मिलेगी, जीत उसकी होगी ही, जैसा गुरुर भी समा गया था.
सबक भी मिल गया
इसी गुरुर ने स्थानीय स्तर पर संगठन को सुस्त – सुसुप्त कर दिया. फलस्वरूप जिस सीट को पार्टी अपना स्वाभाविक गढ़ मानती थी, वहां उपचुनाव वह उतनी आक्रामकता से नहीं लड़ पायी, जितनी प्रशांत किशोर के रूप में बड़ी चुनौती उसके सामने थी. यही उपचुनाव में उसके धूल चाट जाने का बड़ा कारण बन गया. साथ में सबक भी मिल गया कि गढ़ चाहे जितना भी मजबूत हो, किसी का स्थायी नहीं होता. बांकीपुर में उपचुनाव भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन (Nitin Navin) द्वारा अपनी पुश्तैनी सीट खाली कर देने के कारण हुआ. भाजपा इस उपचुनाव को अपने विधायक की जगह भरने के नजरिये से देख रही थी. चुनावी रणनीति भी उसकी कमोबेश उसी समझ पर आधारित थी.
घातक हो गया भाजपा के लिए
प्रशांत किशोर ने इसे अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता का सवाल बना दिया. यही निर्णायक साबित हुआ. परंपरागत अर्थ में उपचुनाव ‘एनडीए (NDA) बनाम महागठबंधन (Mahagathbandhan) ‘ या फिर ‘भाजपा बनाम राजद ‘ का नहीं रहा, ‘भाजपा बनाम प्रशांत किशोर’ का बन गया. इतना ही नहीं, प्रशांत किशोर ने मुकाबले को ‘त्रिकोणीय’ से निकाल ‘पुरानी राजनीति बनाम नया विकल्प’ का रूप दे दिया. इससे उन मतदाताओं को विकल्प मिल गया जो भाजपा को हराना तो चाहते थे, लेकिन राजद (RJD) को वोट देने को तैयार नहीं थे. यही ‘तीसरा विकल्प’ भाजपा के लिए घातक साबित हो गया.
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युवा मतदाता बड़ा कारक
विश्लेषणों में यह तथ्य सामने आया कि भाजपा के पारंपरिक समर्थक सामाजिक समूहों के बड़े हिस्से का साथ उसे मिला, लेकिन उन्हीं सामाजिक समूहों के युवाओं के बीच प्रशांत किशोर की स्वीकार्यता अपेक्षाकृत अधिक दिखी. इसे भाजपा के लिए खतरनाक संकेत के रूप में रेखांकित किया जा सकता है. युवाओं के रुख़ में बदलाव संभवतः इस वजह से आया कि शहरी युवा केवल राष्ट्रवाद, हिन्दुत्व और पार्टी की बड़ी पहचान से संतुष्ट नहीं हैं. उनके सामने रोजगार (Employment) , प्रतियोगी परीक्षाएं , शिक्षा, अवसर और भविष्य जैसे सीधे सवाल हैं. यह माना जा सकता है कि नीट पेपर लीक (NEET paper leak) के मुद्दे पर हुए आंदोलन ने भी इस वर्ग में सरकार और व्यवस्था के प्रति असंतोष को राजनीतिक रूप दिया. इसका असर उपचुनाव पर भी पड़ा.
अधिक उत्साह दिखाया
कम मतदान भी भाजपा की उम्मीदों पर तुषारापात का एक बड़ा कारण रहा. बांकीपुर में इस बार लगभग 34.30 प्रतिशत मतदान हुआ. नौ माह ही पूर्व हुए 2025 के विधानसभा चुनाव में 41.39 प्रतिशत मतदान हुआ था. यानी 2025 के चुनाव की तुलना में तकरीबन 07 प्रतिशत मतदाताओं ने मतदान नहीं किया. ऐसा कह सकते हैं कि इनमें अधिसंख्य एनडीए समर्थक सामाजिक समूहों के रहे होंगे. सवाल अब यह कि ऐसे प्रतिबद्ध मतदाता घर से निकल मतदान केंद्रों पर नहीं पहुंचे तो उसकी वजह क्या थी ? भाजपा की ताकत उसका मजबूत संगठन और बूथ प्रबंधन रहा है. लेकिन, इस उपचुनाव में बूथ प्रबंधन बेहद कमजोर व निराशाजनक रहा. परिणामतः भाजपा समर्थक पारंपरिक मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा मतदान केंद्र तक नहीं पहुंच सका. दूसरी ओर प्रशांत किशोर के समर्थकों ने अपेक्षाकृत अधिक उत्साह दिखाया. इससे कम मतदान प्रतिशत का पूरा गणित उलट गया.
भाजपा के समक्ष चेहरे की समस्या
नितिन नवीन बांकीपुर में भाजपा के स्थापित चेहरा थे. उनकी जगह बेहद सरल – सामान्य कार्यकर्ता नीरज कुमार सिन्हा (Neeraj Kumar Sinha) को मैदान में उतारा गया. वह उस स्तर की व्यक्तिगत पहचान स्थापित नहीं कर सके जिसकी इस प्रतिष्ठामूलक मुकाबले में आवश्यकता थी. उधर चुनावी रणनीतिकार की बड़ी पहचान रखने वाले प्रशांत किशोर खुद मैदान में थे. इससे मुकाबला भाजपा का संगठन बनाम प्रशांत किशोर का व्यक्तिगत ब्रांड बन गया. व्यक्तिगत ब्रांड ने बड़ी आसानी से संगठन को पछाड़ दिया. बहरहाल, बांकीपुर की हार से यह निष्कर्ष निकाल लेना जल्दबाजी होगी कि बिहार में भाजपा का जनाधार समाप्त हो गया है. प्रशांत किशोर बिहार की राजनीति में तीसरा विकल्प बन गये हैं.
बदलती राजनीतिक मानसिकता
उपचुनाव सामान्य विधानसभा चुनाव (Assembly Elections) से अलग होता है. उम्मीदवार, मतदान प्रतिशत, स्थानीय मुद्दे और प्रत्याशी की व्यक्तिगत लोकप्रियता का असर इसमें अधिक होता है. इसके बावजूद इसे एक क्षेत्र की बात कह खारिज कर देना भाजपा के लिए खतरनाक होगा. करीब 19 हजार मतों से हार कोई मामूली फिसलन नहीं होता है. तब भी बांकीपुर में भाजपा इसलिए नहीं हारी कि उसका जनाधार एकदम से खिसक गया है.उसकी हार अति-आत्मविश्वास, मजबूत उम्मीदवार का न होना, कम मतदान, युवा मतदाताओं में असंतोष, प्रशांत किशोर की सघन सक्रियता और सबसे महत्वपूर्ण भाजपा विरोधी मतदाताओं को राजद से अलग तीसरा विकल्प मिल जाने की वजह से हुई है. ऐसे में बांकीपुर के परिणाम को शहरी बिहार की बदलती राजनीतिक मानसिकता के तौर पर देखा जा सकता है.

अविनाश चन्द्र मिश्र समकालीन तापमान के संपादक हैं.
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