Jogiya Case : दहला दिया दिनारा … बिहार फिर ‘हिंसा – प्रतिहिंसा’ की राह ?

हत्यारोपित को दंड अब न्यायालय देगा. हत्या का आरोप साबित हो जाये , तो कठोर दंड मिलना चाहिए. इतना कठोर कि फिर कोई ऐसा अमानवीय दुस्साहस नहीं कर पाये. लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले कानून के राज में न्याय का यही तकाजा है. प्रतिशोधात्मक सामूहिक हिंसा और आगजनी का वह नग्न तांडव नहीं जो गुस्साये गांव वालों, विशेष कर चंदेश्वर चौधरी के बिरादरी वालों ने उस दिन कानून हाथ में ले अजीत तिवारी के घर पर किया.
सामाजिक ताने-बाने के भी बिखर जाने का खतरा
बकाये को लेकर दोनों पक्षों के हैं दावे – प्रतिदावे
इस बात का भी था खुन्नस अजीत तिवारी को
सामूहिक हिंसा का लंबा दौर देख और भोग चुका है बिहार
अविनाश चन्द्र मिश्र
11 अगस्त 2026
रोहतास (Rohtas) जिले के जोगिया गांव (Jogia village) में मजदूर (Labor) की हत्या और प्रतिशोध में भड़की हिंसा व आगजनी को सिर्फ आपराधिक वारदात के रूप में देखा गया, सरकार के स्तर पर गंभीरता नहीं दिखायी गयी, तो वह बहुत बड़ी शासनिक भूल होगी. इसलिए कि मजदूर की हत्या में जो ‘सामंती बेखौफी’ और प्रतिशोध की कार्रवाई में जो उग्रता व आक्रामकता दिखी उसने विधि- व्यवस्था के सवाल को पीछे छोड़ सामाजिक ताने-बाने के भी बिखर जाने का खतरा उत्पन्न कर दिया है. इस रूप में कि इसमें प्रतिशोधात्मक हिंसा की वही खतरनाक मानसिकता दिखी जिसमें हत्या का जवाब हत्या और हिंसा का जवाब हिंसा से देने की आग सुलगती है. हत्या- प्रतिहत्या और प्रति प्रतिहत्या… हिंसा- प्रतिहिंसा और प्रति प्रतिहिंसा!
बड़ी मुश्किल से त्राण मिला था
इस विनाशकारी अभिशाप को लगभग ढ़ाई दशक तक झेल चुके बिहार को दिनारा के दानवों ने फिर से दहला दिया है. इतिहास गवाह है कि अंतहीन सा बन गये उस हिंसक दौर से बिहार को बड़ी मुश्किल से त्राण मिला था . यह अकाट्य है कि हत्या जिस किसी की भी हो, जिस रूप में भी हो, समाज के लिए वह सबसे गंभीर अपराध माना जाता है. लेकिन, उससे भी अधिक भयावह स्थिति तब पैदा हो जाती है, जब अपराध पर फैसला अदालतों के बजाय बंदूकों, लाठियों और हिंसा पर उतारू भीड़ के जरिये होने लगता है. यही प्रतिहिंसा है जिसे सभ्य समाज के लिए सबसे बड़ा खतरा माना गया है. जोगिया गांव में उस दिन इसका वीभत्स रूप दिखा.

बकाये को लेकर तरह – तरह की बातें
जोगिया गांव दिनारा (Dinara) थाना क्षेत्र की भुई पंचायत में है. आरोप है कि 05 अगस्त 2026 को सुबह- सुबह गांव के दबंग छवि के बड़े भूस्वामी अजीत तिवारी (Ajit Tiwari) के दलान पर बकाया रकम मांगने गये मजदूर चंदेश्वर चौधरी (Chandeshwar Chaudhary) को गोली मार दी गयी. गोली किसने मारी, इसका आधिकारिक खुलासा अभी नहीं हुआ है. लाश सुरतापुर के समीप नहर में फेंक दी गयी. नोनिया (Noniya) बिरादरी के चंदेश्वर चौधरी जोगिया के बगल के मिल्की मनिहारी (Milky Manihari) गांव के थे. वह गांव भी भुई पंचायत का ही हिस्सा है. जोगिया और मिल्की मनिहारी गांवों के बीच लगभग एक किलोमीटर का फासला है. ऐसा कहा जाता है कि सौ – सवा सौ बीघा के जोतदार अजीत तिवारी के परिवार के वह ‘पुश्तैनी बनिहार’ थे. बेटा भी वहीं मजदूरी करता था. बकाये को लेकर तरह – तरह की बातें की जा रही हैं.
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खुन्नस इस बात का भी
चंदेश्वर चौधरी के पुत्र दीपक चौधरी (Deepak Chaudhary) का सोशल मीडिया (Social Media) पर बयान आया कि तकरीबन तीन लाख रुपया अजीत तिवारी के यहां बाकी था. दूसरी तरफ अजीत तिवारी के करीबी इतनी ही कुछ रकम चंदेश्वर चौधरी के यहां बाकी रहने की बात करते हैं. सच क्या है, नहीं कहा जा सकता.बकाये के इस दावे – प्रतिदावे से संदेह कुछ और भी पैदा होता है. यह कि दलान के मलवे में दिखीं खाली- भरी बोतलों से तो इसका तार नहीं जुड़ा है? सच खंगाल संदेह का निवारण पुलिस ही कर पायेगी. चर्चा है कि अजीत तिवारी को खुन्नस मुख्य रूप से इस बात का था कि चंदेश्वर चौधरी का बेटा उनका काम छोड़ किसी दूसरे के यहां करने लग गया था.
तब एक और अनर्थ हो जाता
लगभग 60 वर्षीय चंदेश्वर चौधरी को गोली मार दिये जाने की खबर उस सुबह साथ गये चचेरे भाई केदार चौधरी (Kedar Chaudhary) के जरिये मिल्की मनिहारी गांव में फैली. आगे- पीछे सोचे- समझे बगैर सैंकड़ों की संख्या में उत्तेजित- आक्रोशित लोगों ने अजीत तिवारी के घर पर धावा बोल दिया. इस बीच पुलिस भी वहां पहुंच गयी. सोशल मीडिया में जो दृश्य दिख रहे हैं उसके मुताबिक पुलिस (Police) की मौजूदगी में दरवाजा तोड़ हमलावर अजीत तिवारी के दलान में घुस गये और सब कुछ तोड़- फोड़ कर उसमें आग लगा दी.उपद्रवियों के आगे पुलिस वहां बेवस दिखी. पर, उन्हें हवेली के अंदर नहीं घुसने देने में वह कामयाब जरूर रही. कहते हैं कि हवेली में उस वक्त अजीत तिवारी की पत्नी और दो पुत्रियां थीं. उन्मादी घर के अंदर घुस जाते तो फिर दूसरा अनर्थ हो जाता. पहला अनर्थ चंदेश्वर चौधरी की हत्या के रूप में हो चुका था.
पुलिस अधीक्षक का कड़ा रुख
खैर, रोहतास के पुलिस अधीक्षक (SP) रौशन कुमार ने कड़ा रुख अख्तियार किया तो स्थिति नियंत्रित हो गयी. पुलिस की चुस्ती इस रूप में भी दिखी कि चंदेश्वर चौधरी की हत्या के दूसरे ही दिन यानी 06 अगस्त 2026 को हत्यारोपित भूस्वामी अजीत तिवारी और उनके पुत्र को उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के गाजीपुर (Ghazipur) से गिरफ्तार कर लिया गया. अजीत तिवारी की निशानदेही पर सुरतापुर गांव (Surtapur Village) के पास नहर से चंदेश्वर चौधरी का शव भी बरामद हो गया. पुलिस ने कहीं कोई लापरवाही नहीं दिखायी, त्वरित कार्रवाई की. हत्यारोपित को दंड अब न्यायालय देगा. आरोप साबित हो जाये, तो कठोर दंड मिलना चाहिए. इतना कठोर कि फिर कोई ऐसा अमानवीय दुस्साहस नहीं कर पाये. लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले कानून के राज में न्याय का यही तकाजा है. प्रतिशोधात्मक सामूहिक हिंसा और आगजनी का वह नग्न तांडव नहीं जो गुस्साये गांव वालों, विशेष कर चंदेश्वर चौधरी के बिरादरी वालों ने उस दिन कानून हाथ में ले अजीत तिवारी के घर पर किया.
रक्तरंजित अनुभव
कानून (Law) की नज़र में उन सबने भी कानून तोड़ने का वैसा ही अपराध किया जैसा कथित रूप से सामंती हनक में अजीत तिवारी ने किया था. आरोपों के मद्देनजर अजीत तिवारी के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई हुई. पिता – पुत्र दोनों को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दिया गया. वैसी ही कानूनी कार्रवाई अजीत तिवारी के घर पर हिंसा करने – करवाने वालों के खिलाफ होनी चाहिए, चाहे वह जिस किसी भी तबके के हों. कानून यही कहता है. अमन पसंद समाज की समझ में राजनीतिक दबाव में यदि वैसा नहीं हुआ, पुलिस की कार्रवाई एकतरफा हुई, सरकार ने सामूहिक हिंसा को नजरंदाज कर दिया, तो प्रति प्रतिशोध की जो आग भड़केगी वह केवल एक गांव या एक थाना क्षेत्र में धधक कर शमित नहीं हो जायेगी. इसकी तपिश संपूर्ण राज्य की कानून-व्यवस्था को झुलसा देगी. ऐसी हिंसा का ऐसा ही रक्तरंजित अनुभव रहा है.
गहरा रही आशंका
बिहार (Bihar) ने सामूहिक हिंसा (Collective violence) का लंबा दौर देखा है, भोगा है. 1985 से 2005 के बीच व्यक्तिगत दुश्मनी, जातीय हिंसा और वर्चस्व की लड़ाई ने कई जिलों को हिंसा की आग में झोंक रखा था. पटना (Patna), रोहतास (Rohtas) , भोजपुर (Bhojpur) , जहानाबाद (Jehanabad) , अरवल (Arwal), औरंगाबाद (Aurangabad) और गया (Gaya) जैसे जिले निजी सेनाओं के आतंक , नक्सली (Naxalite) हिंसा और प्रतिशोधात्मक हत्याओं के कारण वर्षों सुबकते रहे. एक हत्या के बाद दूसरी , फिर तीसरी… और देखते-देखते पूरा इलाका खून -खराबे की आशंकाओं में घिर भयाक्रांत हो उठता था. विगत दो दशकों से स्थिति कमोबेश सामान्य है. पर, दिनारा की सामूहिक हिंसा के बाद प्रतिशोध का वही दौर चल पड़ा, तो वह बिहार को फिर ‘हिंसा – प्रतिहिंसा’ (Violence and Retaliation) की खूनी राह धरा दे सकता है. आशंका ऐसी गहरा रही है.

अविनाश चन्द्र मिश्र समकालीन तापमान के संपादक हैं.
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