Economy वैश्विक अर्थव्यवस्था : धीमी रफ्तार, बेहद खतरनाक

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के आंकड़े वैश्विक अर्थव्यवस्था के दोहरे दबाव का स्पष्ट प्रमाण हैं. इन परिस्थितियों में भारत को अत्यंत सतर्क और रणनीतिक कदम उठाने की आवश्यकता है. ऊर्जा के क्षेत्र में वैकल्पिक स्रोतों का विकास, निर्यात बाजारों का विस्तार और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देना आज समय की सबसे बड़ी मांग है. भारत को इस कठिन वैश्विक मौसम में अपने आर्थिक जहाज को सुरक्षित निकालने के लिए अपनी आंतरिक आर्थिक बुनियाद को फौलाद की तरह मजबूत करना होगा.
विकास दर में कमी कोई सामान्य घटना नहीं
वैश्विक वृद्धि दर 2.5 प्रतिशत रहने की आशंका
आयात पर निर्भर देशों की स्थिति और भी भयावह
भारत के लिए खड़ी हो सकती हैं गंभीर चुनौतियां
महेन्द्र तिवारी
07 अगस्त 2026
New Delhi : वैश्विक अर्थव्यवस्था (Economy) वर्तमान में एक ऐसे दोराहे पर खड़ी है जहां अनिश्चितता ही एकमात्र निश्चितता प्रतीत होती है. अंतर्राष्ट्रीय (International) मुद्रा कोष (monetary Fund) द्वारा जुलाई 2026 में जारी नवीनतम विश्व आर्थिक आउटलुक अपडेट ने वैश्विक विकास और भविष्य की आर्थिक संभावनाओं पर एक गंभीर विमर्श को जन्म दिया है. वर्ष 2026 के लिए वैश्विक विकास दर के अनुमान को घटाकर केवल तीन प्रतिशत किया जाना कोई सामान्य या छोटी घटना नहीं है. यह आंकड़ा इसी साल अप्रैल में जारी किए गये तीन दशमलव एक प्रतिशत के अनुमान से कम है. यद्यपि संस्था को वर्ष 2027 में विकास दर के तीन दशमलव चार प्रतिशत तक पहुंचने की उम्मीद है, लेकिन यह सुधार भी महामारी से पहले के वर्षों या 2024 और 2025 के औसत से काफी नीचे रहने वाला है. यह गिरावट किसी अचानक आयी भयानक मंदी का संकेत तो नहीं देती, लेकिन इस बात की स्पष्ट चेतावनी अवश्य है कि विश्व (World) अर्थव्यवस्था की अंतर्निहित वृद्धि क्षमता लगातार कमजोर हो रही है. इस परिदृश्य को और भी अधिक चिंताजनक बनाने का काम विश्व बैंक का आकलन करता है.
विकास दर में गिरावट
विश्व बैंक (Bank) का अनुमान अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से भी अधिक निराशावादी है. विश्व बैंक ने 2026 के लिए वैश्विक वृद्धि दर मात्र दो दशमलव पांच प्रतिशत रहने की आशंका जतायी है. इन दोनों प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों (Financial institutions) के अनुमानों में यह अंतर इस बात को दर्शाता है कि वैश्विक स्तर पर वर्तमान आर्थिक जोखिमों का प्रभाव अत्यंत गहरा और दीर्घकालिक होने वाला है, जो विकासशील और विकसित देशों की संरचनात्मक जड़ों को हिला रहा है. इस आर्थिक सुस्ती और विकास दर में गिरावट के पीछे कई जटिल और बहुआयामी कारण छिपे हैं. इनमें सबसे प्रमुख कारण मध्य पूर्व में जारी गहराता भू राजनीतिक संघर्ष और इसके परिणामस्वरूप उत्पन्न हो रहा भारी ऊर्जा संकट है.
अनुमानों से कहीं अधिक
दुनिया के इस संवेदनशील हिस्से में तनाव लगातार बढ़ रहा है. इसका सीधा असर तेल की वैश्विक आपूर्ति, समुद्री परिवहन और माल ढुलाई के बीमा की भारी लागत पर पड़ रहा है. होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण और संकरे समुद्री व्यापारिक मार्गों पर यदि कोई भी बड़ा व्यवधान उत्पन्न होता है, तो अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हो सकती है. कच्चे तेल (Crude oil) के महंगा होने का सीधा अर्थ यह है कि पूरी दुनिया में उत्पादन, विनिर्माण और परिवहन की लागत तेजी से बढ़ जायेगी. जो देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पूरी तरह से आयात पर निर्भर हैं, उनके लिए यह स्थिति और भी भयावह होगी. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने इस गंभीर खतरे को भांपते हुए 2026 के लिए वैश्विक महंगाई दर का अनुमान बढ़ाकर चार दशमलव सात प्रतिशत कर दिया है, जो पिछले अनुमानों से कहीं अधिक है. महंगाई का यह भारी दबाव दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों (Central banks) को अपनी ब्याज दरों में कटौती करने से रोकेगा, जिससे बाजार में तरलता घटेगी और औद्योगिक विकास की गति और भी धीमी हो जायेगी .
निवेश की सतर्क रणनीति
आर्थिक विकास को बाधित करने वाला दूसरा सबसे बड़ा और खतरनाक कारक वैश्विक व्यापार का विखंडन है. पिछले कुछ दशकों में दुनिया ने जिस निर्बाध वैश्वीकरण और खुले व्यापार को देखा था, वह अब बहुत तेजी से पीछे छूटता जा रहा है. अमेरिका (America) और चीन (China) जैसी बड़ी आर्थिक शक्तियों के बीच चल रहा तनाव अब केवल कूटनीतिक बयानों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह नये शुल्कों, कठोर व्यापारिक प्रतिबंधों और अलग-अलग व्यापारिक गुटों के निर्माण के रूप में सामने आ रहा है. इस खींचतान के कारण वैश्विक आपूर्ति शृंखला न केवल बहुत महंगी हो गयी है, बल्कि उसकी प्रभावशीलता और गति भी काफी घट गयी है. अब बहुराष्ट्रीय कंपनियां (Multinational companies) अपने नये कारखाने (Factories) लगाने या पूंजी निवेश करने के लिए केवल उन देशों को नहीं चुन रही हैं जहां श्रम या उत्पादन लागत सबसे कम है. इसके बजाय वे अब उन देशों को प्राथमिकता दे रही हैं जो राजनीतिक रूप से उनके लिए पूरी तरह सुरक्षित हैं और जहां उनके देशों के मित्रवत संबंध हैं. निवेश की इस नयी और सतर्क रणनीति के कारण दुनिया भर में माल बनाने की कुल लागत में भारी वृद्धि हो रही है. जब लागत बढ़ेगी तो स्वाभाविक रूप से इसका असर वैश्विक व्यापार की कुल गति पर पड़ेगा, जो अंततः पूरी दुनिया की आर्थिक वृद्धि को नीचे की ओर खींचेगा.
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कृत्रिम बुद्धिमत्ता का जोखिम
इन पारंपरिक भू राजनीतिक और व्यापारिक जोखिमों के अलावा, एक नया और बेहद आधुनिक जोखिम कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई के बाजार से उभर कर सामने आ रहा है. पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका और कुछ अन्य विकसित अर्थव्यवस्थाओं में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की तकनीक को लेकर अभूतपूर्व और अकल्पनीय उत्साह देखा गया है. इस तकनीक के विकास में दुनिया भर से अरबों डॉलर का अंधाधुंध निवेश किया गया है, जिसने अमेरिकी शेयर बाजार (Ameriki share bazar) और वहां की आर्थिक वृद्धि को एक बहुत बड़ा सहारा दिया है. लेकिन अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने इस अति उत्साह के प्रति बहुत गंभीरता से आगाह किया है. चिंता का मुख्य विषय यह है कि यदि कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़ी कंपनियों के शेयरों का मूल्य और उनकी संपत्तियों का मूल्यांकन उनकी वास्तविक आय की तुलना में बहुत अधिक हो गया है, तो यह एक बड़े आर्थिक बुलबुले का रूप ले सकता है. इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि यह नयी तकनीक स्वयं किसी संकट का मूल कारण है. असली खतरा निवेशकों की उन अत्यधिक आशावादी उम्मीदों के टूटने में छिपा है. यदि निवेशकों को उनके भारी भरकम निवेश पर मनमुताबिक वित्तीय रिटर्न नहीं मिला, तो शेयर बाजार में भारी बिकवाली शुरू हो सकती है. ऐसी किसी भी तकनीकी गिरावट का असर केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह पूरी दुनिया के शेयर बाजारों और निवेश की धारणा को बुरी तरह से झकझोर कर रख देगा, जिससे पूंजी का प्रवाह रुक सकता है.
भारत पर गहरा प्रभाव
इन तमाम वैश्विक उथल पुथल का भारत (India) जैसी तेजी से उभरती और विशाल अर्थव्यवस्था पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ना तय है. एक ओर जहां भारत के लिए कई गंभीर चुनौतियां खड़ी हो रही हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ नये और बड़े अवसर भी जन्म ले रहे हैं. चुनौतियों की बात करें तो सबसे बड़ा संकट भारत की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा है. भारत अपनी जरूरत का एक बहुत बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है. यदि मध्य पूर्व के संघर्ष के कारण तेल की कीमतें उछाल मारती हैं, तो भारत का आयात बिल तेजी से बढ़ जायेगा. इससे देश का व्यापार घाटा बढ़ेगा और भारतीय रुपये पर भारी दबाव आयेगा. रुपये के कमजोर होने से घरेलू बाजार में ईंधन की कीमतें बढ़ेंगी, जिसका सीधा असर आम आदमी की जेब और खाद्य पदार्थों की महंगाई पर पड़ेगा. महंगाई बढ़ने की स्थिति में भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India) के लिए ब्याज दरों को कम करना लगभग असंभव हो जायेगा. महंगी ब्याज दरें देश के भीतर नये उद्योगों की स्थापना को रोकेंगी. इसके अतिरिक्त वैश्विक मांग कमजोर होने से भारत के निर्यात क्षेत्र को भी करारा झटका लगेगा. कपड़ा उद्योग, इंजीनियरिंग सामान और सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं की विदेशी मांग घट सकती है.
घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा
हालांकि, इस निराशाजनक वैश्विक परिदृश्य में भारत के लिए कुछ सुनहरे अवसर भी स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं. दुनिया के दो बड़े गुटों में बंटने और वैश्विक आपूर्ति शृंखला में आ रहे बदलावों का भारत बहुत समझदारी से लाभ उठा सकता है. पश्चिमी देशों की कई कंपनियां अब चीन पर अपनी निर्भरता कम करने की नीति अपना रही हैं. भारत अपने विशाल घरेलू बाजार और युवा कार्यबल के दम पर इन कंपनियों को अपनी ओर आकर्षित कर सकता है. इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उपकरण और फार्मास्यूटिकल्स के क्षेत्र में भारत एक बड़ा वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनकर उभर सकता है. निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के आंकड़े वैश्विक अर्थव्यवस्था के दोहरे दबाव का स्पष्ट प्रमाण हैं. इन परिस्थितियों में भारत को अत्यंत सतर्क और रणनीतिक कदम उठाने की आवश्यकता है. ऊर्जा के क्षेत्र में वैकल्पिक स्रोतों का विकास, निर्यात बाजारों का विस्तार और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देना आज समय की सबसे बड़ी मांग है. भारत को इस कठिन वैश्विक मौसम में अपने आर्थिक जहाज को सुरक्षित निकालने के लिए अपनी आंतरिक आर्थिक बुनियाद को फौलाद की तरह मजबूत करना होगा.

महेन्द्र तिवारी काफी चर्चित लेखक हैं.
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