‘छाती दबाना दुष्कर्म का प्रयास नहीं’ : आड़े हाथों लिया सर्वोच्च अदालत ने
09 जुलाई 2026 को पटना उच्च न्यायालय के न्यायाधीशी पूर्णेन्दु सिंह ने उक्त फैसला सुनाया था. उसमें कहा था कि अगर किसी व्यक्ति ने महिला की सलवार उतारी और उसकी छाती को दबाया, तो वह कृत्य भारतीय दंड सहिता की धारा 354 के तहत महिला की गरिमा भंग का अपराध हो सकता है, लेकिन इसे दुष्कर्म का प्रयास नहीं माना जा सकता. मामला बांका जिले के अमरपुर थाना क्षेत्र का था.
– सर्वोच्च अदालत का बिफरना गैरवाजिब नहीं
– सर्वोच्च अदालत में उठा फिर विवादित फैसले का मुद्दा
– उच्च न्यायालयों द्वारा बार-बार दिये जा रहे ऐसे आदेश
– ताजा मामला बांका के अमरपुर से जुड़ा हुआ है
तापमान लाइव ब्यूरो
16 जुलाई 2026
New Delhi: सर्वोच्च अदालत के इस कदर विफरने को गैरवाजिब नहीं कहा जा सकता. पूर्व में उसने एक-दो उच्च न्यायालयों के ऐसे ही फैसलों को तल्ख टिप्पणी के साथ खारिज कर दिया था, तो दूसरे उच्च न्यायालय द्वारा वैसा ही निर्णय दिये जाने पर उसका कुपित होना स्वाभाविक ही माना जायेगा. बात पटना उच्च न्यायालय (Patna High Court) के उस फैसले से जुड़ी है जो 09 जुलाई 2026 को उसने दुष्कर्म (Rape) के प्रयास के अपराध (Crime) में एक व्यक्ति को निचली अदालत से मिली सजा को रद्द करते हुए सुनाया था. सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) का ध्यान इस फैसले के उस अंश पर गया जिसमें कहा गया कि किसी महिला की सलवार उतारने के प्रयास और उसकी छाती दबाने को दुष्कर्म की कोशिश नहीं माना जा सकता. सर्वोच्च अदालत ने पटना उच्च न्यायालय के इस फैसले की आलोचना की और यौन अपराध से जुड़े मामलों की सुनवाई में न्यायिक संवेदनशीलता बनाये रखने का सख्त निर्देश दिया.
सख्त दिशा निर्देश जारी
सर्वोच्च अदालत ने देश की सभी अदालतों के लिए दिशा-निर्देश भी जारी किया. यौन अपराध (Sexual Offense) के मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता पर बनी नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी की कमेटी की रिपोर्ट को सर्वोच्च अदालत और देश के सभी उच्च न्यायालयों की वेबसाइटों पर अपलोड करने का आदेश दिया. राज्यों को भी निर्देशित किया कि वह सभी पुलिस थानों को नियम का पालन करने का निर्देश जारी करे, ताकि प्राथमिकी दर्ज करते वक्त और अभियोग पत्र दाखिल करते समय इन बातों को ध्यान में रखे. ‘लाइव लॉ’ की रिपोर्ट के मुताबिक बुधवार को प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायाधीश जॉयमाल्या बागची और वी मोहन की खंडपीठ के समक्ष यह मुद्दा उस स्वतः संज्ञान मामले की सुनवाई के दौरान उठा जिसे सर्वोच्च अदालत ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 17 मार्च 2025 के ऐसे ही एक विवादास्पद फैसले के बाद दर्ज किया था.
विस्तार से आदेश पारित होगा
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि एक नाबालिग लड़की का स्तन पकड़ना, उसके पायजामे का नारा खोलना और उसे पुलिया के नीचे घसीटने का प्रयास करना दुष्कर्म या दुष्कर्म का प्रयास नहीं माना जा सकता. हालांकि, उसने इन कृत्यों को गंभीर यौन हमला माना था. तब भी उसके इस आदेश पर देशभर में व्यापक आक्रोश फैल गया था. सर्वोच्च अदालत ने स्वतः संज्ञान लेते हुए उस फैसले को रद्द कर दिया था. उस दिन उसी मामले की सुनवाई के दौरान शोभा गुप्ता ने सर्वोच्च अदालत को बताया कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला रद्द किये जाने के बाद भी दूसरे उच्च न्यायालयों द्वारा इस तरह के आदेश बार-बार दिये जा रहे हैं. उन्होंने मुख्य रूप से पटना उच्च न्यायालय के उक्त आदेश का जिक्र किया. इस पर प्रधान न्यायाधीश (Chief Justice) सूर्यकांत (Suryakant) ने पर्याप्त और गहन शोध नहीं होने पर अफसोस जताया और कहा कि पटना उच्च न्यायालय के संबंधित फैसले पर खंडपीठ विस्तार से आदेश पारित करेगी.
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उच्च न्यायालय ने पलट दिया
09 जुलाई 2026 को पटना उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पूर्णेन्दु सिंह ने उक्त फैसला सुनाया था. उसमें कहा था कि अगर किसी व्यक्ति ने महिला की सलवार उतारी और उसकी छाती को दबाया, तो वह कृत्य भारतीय दंड सहिता (Indian Penal Code) की धारा 354 के तहत महिला की गरिमा भंग का अपराध हो सकता है, लेकिन इसे दुष्कर्म का प्रयास नहीं माना जा सकता. मामला बांका (Banka) जिले के अमरपुर थाना क्षेत्र का था. बांका के अपर सत्र न्यायाधीश (वन) ने आरोपित हिमांशु कुमार पाठक को दुष्कर्म के प्रयास और गैर कानूनी ढंग से बंधक बनाकर रखने संबंधी भारतीय दंड संहिता की धाराओं के तहत दोषी मान तीन साल के सश्रम कारावास (Rigorous imprisonment) की सजा सुनायी थी. सजायाफ्ता (Convicted) ने हिमांशु कुमार पाठक ने इस फैसले को पटना उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी. पटना उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के फैसले को पलट दिया.


