‘आतंक मुक्त’ दंडकारण्य : दौलत भी दबी है जंगलों में!
नोटबंदी काल में संगठन के पास 25-30 करोड़ रुपये थे जो बतौर लेवी संग्रहित किये गये थे. उनमें अधिकतर एक हजार के निरस्त नोट थे. उतनी बड़ी राशि को बैंक से बदलना आसान नहीं था. इसलिए उसके बड़े हिस्से से सोना खरीद लिया गया.

तापमान लाइव ब्यूरो
14 मई 2026
New Delhi : ‘लाल आतंक’ के खिलाफ अभियान में सुरक्षाबलों को न सिर्फ देशी-विदेशी हथियार हाथ लग रहे हैं, बल्कि नगदी और सोना (Cash & Gold) के रूप में जंगलों में दबी दौलत (Wealth Buried in the Forests) भी मिल रही है. पूर्व में क्या कुछ हासिल हुआ इसकी मुकम्मल जानकारी नहीं, मार्च 2026 और उसके बाद के महीने में नगद और सोना के रूप में तकरीबन 20 करोड़ 08 लाख 52 हजार रुपये की दौलत बरामद हुई है. मार्च 2026 में 20 दिनों के अंदर 8.2 किलो सोना और 6.5 करोड़ रुपये की प्राप्ति हुई है. उस वक्त सोना की कीमत 12 करोड़ 80 लाख रुपये आंकी गयी थी. पहली बार एक किलो सोना 11 मार्च 2026 को मिला था. फिर 31 मार्च 2026 को 7.2 किलो सोना मिला. उसी दिन 6.5 करोड़ रुपये नगद भी मिले. पुलिस का मानना है कि जंगलों में और भी कई जगहों पर हथियारों के साथ ऐसी दौलत दबी हो सकती है.
लेवी के रुपयों से सोना खरीद लिया
मार्च 2026 के बाद सुरक्षा बलों के ‘खोज अभियान’ में जमीन में दबे मिले 32 हथियार और 65 लाख 52 हजार नगद से पुलिस की उक्त समझ को मजबूती मिलती है. नक्सलियों (Naxalites) के पास हथियार और रुपये की उपलब्धता तो सामान्य बात है, सोना कहां से और कैसे आया, यह जानने की जिज्ञासा हर किसी की होगी. बताया जाता है कि प्रतिबंधित माओवादी (Maoist) संगठन में सोना संग्रह (Gold Collection) की समझ 2016 में नोटबंदी के वक्त बनी. एक आत्मसमर्पित शीर्ष माओवादी नेता के हवाले से मीडिया (Media) को जो जानकारी मिली, उसके मुताबिक नोटबंदी काल (Demonetization Period) में संगठन के पास 25-30 करोड़ रुपये थे जो बतौर लेवी संग्रहित किये गये थे. उनमें अधिकतर एक हजार के निरस्त नोट थे. उतनी बड़ी राशि को बैंक से बदलना आसान नहीं था. इसलिए उसके बड़े हिस्से से सोना खरीद लिया गया.
इन दो ने छिपाया था जंगलों में
हालांकि, एक करोड़ रुपये नक्सलियों के अभेद्य गढ़ माने जानेवाले गांवों के ‘अपने लोगों’ के जरिये बैंकों से बदलवाने की कोशिश की गयी. लेकिन, मुक्कमल कामयाबी नहीं मिली. कहते हैं कि कुछ नक्सल समर्थक दबंग ग्रामीणों ने घालमेल कर दिया. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक उस असफलता को देखते हुए 20 करोड़ रुपये का सोना खरीद अलग-अलग जगहों पर जमीन में गाड़ दिया गया. सोना की खरीद और जंगलों में उसके ‘भंडारण’ में ‘संगठन के दिमाग’ कहे जाने वाले कादरी सत्यनारायण रेड्डी उर्फ कोसा दादा (Kadri Satyanarayana Reddy alias Kosa Dada) और गुडसा उसेंडी उर्फ कट्टा राजचन्द्र रेड्डी उर्फ राजू दादा (Gudsa Usendi alias Katta Rajachandra Reddy alias Raju Dada) की अहम भूमिका थी. छतीसगढ़ के बस्तर (Baster) में नक्सलवाद की नींव (Foundation of Naxalism) रखनेवाले गुडसा उसेंडी उर्फ कट्टा राजचन्द्र रेड्डी उर्फ राजू दादा पर सात राज्यों ने 07 करोड़ का इनाम घोषित कर रखा था.
खरीदा गया था 20 करोड़ का सोना
वह तेलंगाना (Telangana) के करीमनगर (Karimnagar) जिले के तिगालागुट्टा पल्ली (Tigalagutta Palli) गांव का रहनेवाला था. केन्द्रीय समिति व केन्द्रीय क्षेत्रीय ब्यूरो का सदस्य और दंडकारण्य विशेष क्षेत्रीय समिति का सचिव था. कादरी सत्यनारायण रेड्डी उर्फ कोसा दादा हथियार निर्माण में पारंगत था. श्रीलंका (Srilanka) के लिट्टे (Ltte) से प्रशिक्षण ले रखा था. वह तेलंगाना के करीमनगर जिले के गोपालरावपल्ली गांव का रहनेवाला था. भाकपा (माओवादी) की केन्द्रीय समिति का सदस्य था. दोनों का तेलंगाना और आंध्र प्रदेश (Andhra Pradesh) के कई सर्राफा व्यवसायियों से संपर्क था. लेवी के रुपयों को सोना में बदलने का जिम्मा उन्हीं दोनों ने ले रखा था.
यह भी पढ़ें :
यक्ष प्रश्न है सुरक्षा बलों के लिए
दोनों 20 करोड़ रुपये लेकर तेलंगाना और आंध्र प्रदेश गये थे. पांच से दस प्रतिशत कमीशन देकर सोना खरीद लाये थे. पूरा सोना ईंट के रूप में 24 कैरेट का था. कुछ दिनों तक उसे साथ लेकर चलते थे. बाद में टुकड़ों में बांट कुछ जगहों पर उसे जमीन के नीचे दबा दिया गया. कहां कितना सोना दबा है, यह वही दोनों जानते थे. 22 सितम्बर 2025 को अबूझमाड़ में मुठभेड़ में दोनों की मौत हो गयी. तीसरा राजदार माओवादी (भाकपा) के तबके महासचिव नंबाला केशवराव उर्फ बसवराजू (Nambala Keshavrao alias Basavaraju) था. 21 मई 2025 को वह भी मारा गया. बहरहाल, जंगलों में दबी नक्सलियों की शेष दौलत कैसे उसके हाथ आयेगी, सुरक्षा बलों के लिए यक्ष प्रश्न बना हुआ है. वैसे, ‘खोज अभियान’ चल रहा है.
***


