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हाल शिक्षा का (2) : बाजार में बदल रहा ज्ञान का मंदिर… तब भी कोचिंग की मजबूरी क्यों?

पैसे के दम पर खरीदी गयी डिग्रियां डिब्बों में बंद कागज के टुकड़ों जैसी हैं. इनसे कौशल और नैतिकता गायब है. यदि शिक्षा का उद्देश्य केवल पैसा कमाना रह गया, तो हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं जो आर्थिक रूप से समृद्ध तो हो सकती है, लेकिन मानसिक और चारित्रिक रूप से दरिद्र ही होगी.

शैक्षणिक संस्थान नहीं, कॉरपोरेट आफिस
स्कूलों ने खोल ली है चौखट के भीतर दुकानें
बाजार का प्रभाव बढ़ा, शिक्षा का पैमाना बदला
अधिकार नहीं, बनती जा रही है विलासिता

डा. विजय गर्ग
01 जुलाई 2026

धुनिकता के आवरण वाले स्कूलों में अब केवल पढ़ाई (Education) नहीं बिकती, बल्कि सुविधाओं का एक पूरा ‘पैकेज’ बिकता है. स्कूल (School) अब शैक्षणिक संस्थान कम और कॉरपोरेट ऑफिस (Corporate Office) ज्यादा नजर आते हैं. भारी-भरकम ‘डोनेशन’ और ‘डेवलपमेंट फीस’ के नाम पर अभिभावकों (Guardian) की जेबों पर डाका डाला जा रहा है. अधिकांश स्कूलों ने अब अपनी चौखट के भीतर ही दुकानें खोल ली हैं. जूते, मौजे, टाई से लेकर कापियों तक, सब कुछ स्कूल द्वारा निर्धारित दुकान से ही लेना अनिवार्य है, जो बाजार भाव से कहीं अधिक महंगी होते हैं. ‘एनुअल फंक्शन’ और ‘स्पोर्ट्स डे’ अब प्रतिभा निखारने के बजाय स्कूल की भव्यता (Grandeur of the school) दिखाने के विज्ञापन बन गये हैं.

संकुचित होता स्वरूप

जैसे-जैसे बाजार का प्रभाव बढ़ा है, शिक्षा का मूल स्वरूप (Fundamental Nature of Education) संकुचित होता गया है. आज की शिक्षा का पैमाना ‘बच्चे ने क्या सीखा’ से बदलकर ‘बच्चे ने कितने प्रतिशत अंक पाये’ पर टिक गया है. शिक्षा अब व्यक्तित्व के चहुंमुखी विकास के बजाय एक रैंक-बनाने वाली मशीन’ बनकर रह गयी है. एक शिक्षक (Teacher), जिसका कार्य अध्यापन (Teaching) था, अब उन्हें मार्केंटिंग, डेटा एंट्री और फीस कलेक्शन जैसे गैर-शैक्षणिक कार्यों में उलझा दिया गया है. जब शिक्षक ही बोझ तले दबा होगा, तो शिक्षा की गुणवत्ता (Quality of education) का गिरना स्वाभाविक है. विडंबना देखिये कि स्कूल की भारी फीस भरने के बाद भी बच्चा ‘कोचिंग’ (Coaching) जाने को मजबूर है. यह इस बात का प्रमाण है कि स्कूल के भीतर की शिक्षा छात्र की जरूरतों को पूरा करने में अक्षम साबित हो रही है.

बाजारीकरण का समाज पर प्रभाव

यह ‘बाजारीकरण’ (Marketization) समाज में एक गहरी खाई पैदा कर रहा है. शिक्षा अब अधिकार नहीं, बल्कि ‘विलासिता’ बनती जा रही है. जब शिक्षा एक उत्पाद (Education as a Product) बन जाती है, तो छात्र (Student) एक ग्राहक (Customer) बन जाता है. ग्राहक को संतुष्ट करना तो आसान है, लेकिन एक नागरिक को शिक्षित (Educated) करना कठिन. पैसे के दम पर खरीदी गयी डिग्रियां डिब्बों में बंद कागज के टुकड़ों जैसी हैं. इनसे कौशल और नैतिकता (Skill and Ethics) गायब है. यदि शिक्षा का उद्देश्य केवल पैसा कमाना (Earning money) रह गया, तो हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं जो आर्थिक रूप से समृद्ध (Economically prosperous) तो हो सकती है, लेकिन मानसिक और चारित्रिक रूप से दरिद्र ही होगी.

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डिग्रियां तो होंगी, ज्ञान नहीं

समय आ गया है कि हम रुककर सोचें. क्या हम अपने बच्चों को केवल एक ‘उपभोक्ता’ बनाना चाहते हैं या एक सजग इंसान? सरकार (Government), समाज (Society) और अभिभावकों (Guardians) को मिलकर इस बाजारीकरण के खिलाफ आवाज उठानी होगी. स्कूल की चौखट से बाजार को बाहर धकेलना जरूरी है ताकि भीतर की शिक्षा को फिर से फैलने और पनपने का अवसर मिल सके. शिक्षा का उद्देश्य ‘करियर’ बनाना जरूर हो, लेकिन इसका आधार ‘चरित्र’ होना चाहिए. यह निर्णय हमें लेना है कि हम अपने स्कूलों को बाजार का विस्तार बनने देंगे या ज्ञान का केंद्र (Center of knowledge) बनाये रखेंगे. यदि शिक्षा भीतर से सिमटती रही और बाजार बाहर से बढ़ता गया, तो हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ेंगे जहां डिग्रियां तो होंगी, पर ज्ञान का अभाव होगा. (समाप्त)

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(डा विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्राचार्य हैं. विभिन्न विषयों पर सारगर्भित लेखन भी करते हैं.)
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