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‘आप’ : पंजाब में दिखेगा बगावत का रंग

आम आदमी पार्टी के लिए मुश्किल वाली बात यह है कि राज्यसभा के सदस्यों ने ऐसे समय में पार्टी छोड़ी है जब अरविंद केजरीवाल पंजाब की सत्ता में वापसी की तैयारी में हैं. दिल्ली की सत्ता हाथ से फिसल जाने के बाद पंजाब से ही उम्मीद है. लेकिन, पंजाब की जीत पक्की करनेवाली टीम ने चुनाव से ठीक पहले पार्टी छोड़ उन्हें सकते में डाल दिया है.

महेश कुमार सिन्हा
05 मई 2026

राज्यसभा के आम आदमी पार्टी (Aam Aadmi Party) के सात सदस्यों ने पार्टी से नाता तोड़ भाजपा को अपना नया ठिकाना बना लिया. इनमें राघव चड्ढा (Raghav Chaddha) के अलावा संदीप पाठक, अशोक मित्तल, विक्रमजीत सिंह साहनी, हरभजन सिंह, राजेन्द्र गुप्ता और स्वाति मालीवाल शामिल हैं. 24 अप्रैल 2026 को इनके पार्टी छोड़ देने से आप की राजनीति में भूचाल आ गया है. लोग चकित हैं कि पार्टी सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) व मनीष सिसोदिया (Manish Sisodia) देखते रह गये और ये सभी राज्यसभा सदस्य उनसे दूर हो गये. इससे छवि तो प्रभावित हुई ही है, अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व व पार्टी के अस्तित्व पर गंभीर सवाल भी खड़े हो गये हैं. इस बगावत पर अरविंद केजरीवाल सिर्फ इतना ही कह पाये हैं. भाजपा (BJP) ने फिर से पंजाबियों के साथ धोखा किया.’ लेकिन, वह इस पर कुछ नहीं बोल पाये कि ऐसी स्थिति क्यों पैदा हो गयी कि पार्टी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अलग होकर भाजपा में शामिल हो गया. राघव चड्ढा ने सीधे तौर पर पूरी पार्टी को ‘भ्रष्ट और समझौतापरस्त’ बताया है. इसका भी जवाब अरविंद केजरीवाल नहीं दे पाये. इन सबसे मुंह चुरा पार्टी ‘ऑपरेशन लोटस’ को ढाल बना बगावत के कारणों पर पर्दा डालने के प्रयास में लगी हुई है.

कोई सामान्य बात नहीं

सामान्य तौर पर ऐसा माना जा रहा है कि राघव चड्ढा ने आम आदमी पार्टी को तोड़ दिया है. पर, अरविंद केजरीवाल को हैरानी में डाल रखा है संदीप पाठक और अशोक मित्तल की बगावत ने. संदीप पाठक पार्टी सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल के पुराने सहयोेगी थे. अशोक मित्तल (Ashok Mittal) पर भरोसा इतना था कि राघव चड्ढा की जगह उन्हें ही राज्यसभा में उपनेता बनाया गया था. विश्लेषकों की समझ में आम आदमी पार्टी फूटती तो कई बार रही है, टूटी पहली बार है. इस टूट को अभी पार्टी के बिखर जाने जैसी नहीं मानी जा सकती है. लेकिन, कमर टूट जाने जैसी यह जरूर है. आम आदमी पार्टी के राज्यसभा के दस सदस्यों में से सात का एक साथ पार्टी छोड़ देना कोई सामान्य बात नहीं है. यहां गौर करने वाली बात यह कि अब तक अरविंद केजरीवाल ही नेताओं को पार्टी से निकाला करते थे. शुरूआत इसकी पार्टी के संस्थापकों में शामिल योगेन्द्र यादव (Yogendra Yadav) और प्रशांत भूषण (Prashant Bhushan) से हुई थी. ऐसे और भी कई नाम हैं जो या तो हटा दिये गये या मजबूरन अलग हो गये. एक तरह से कहें, तो यह आम आदमी पार्टी की नियति जैसी हो गयी है. याद कीजिये, कभी कुमार विश्वास (Kumar Viswas), आशुतोष (Ashutosh), आशीष खेतान (Ashish Khaitan), शाजिया इल्मी (Shazia Ilmi) आदि आम आदमी पार्टी में बड़ी हैसियत रखते थे. संकटकाल में अरविंद केजरीवाल के बचाव में मोर्चा संभाल लेते थे. सबके सब ‘आप’ से अलग हो गये. आज स्थिति यह है कि अकेले संजय सिंह को ऐसा करना पड़ रहा है.

खिसक गयी पैरों तले जमीन

आम आदमी पार्टी में बगावत के ‘नायक’ राघव चड्ढा नजर आ रहे हैं, लेकिन अरविंद केजरीवाल को बड़ा सदमा संदीप पाठक (Sandeep Pathak) ने दिया है. अशोक मित्तल की भूमिका को भी बहुत कुछ वैसा ही माना जा रहा है. स्वाति मालीवाल (Swati Maliwal) तो पहले ही साथ छोड़ चुकी थीं. राघव चड्ढा भी उनके अतिप्रिय थे, परंतु संदीप पाठक का साथ छोड़ देना अरविंद केजरीवाल के लिए सबसे अधिक पीड़ादायक रहा. इस रूप में कि अरविंद केजरीवाल तो आम आदमी पार्टी के चाणक्य हैं ही, उनके बाद यह जिम्मेदारी संदीप पाठक ही संभाल रहे थे. संदीप पाठक ने पंजाब (Panjab) में आम आदमी पार्टी की सरकार बनवाने में अहम भूमिका निभायी थी. पंजाब की सत्ता ही उनकी राज्यसभा की सदस्यता का आधार बनी थी. करीबी तो सभी रहे हैं, लेकिन अरविंद केजरीवाल को जब जेल जाना पड़ा था, उस बुरे दौर में संदीप पाठक ही उनका सहारा बने हुए थे. उस वक्त मनीष सिसोदिया (Manish Sisodia) और संजय सिंह (Sanjay Singh) भी जेल में थे. अरविंद केजरीवाल की पत्नी सुनीता केजरीवाल (Sunita Kejriwal) एक तरफ मोर्चा अवश्य संभाल रही थीं, राजनीतिक मोर्चे पर संदीप पाठक ही थे. बहरहाल, राज्यसभा के दो तिहाई सदस्यों का पार्टी छोड़कर चला जाना अरविंद केजरीवाल के लिए जेल जाने और दिल्ली की हार से भी बड़ा सदमा है. खासकर, संदीप पाठक के साथ छोड़ देने से उन्हें पैरों तले से जमीन खिसक जाने जैसा महसूस हो रहा होगा.

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अचानक नहीं हुई टूट

आम आदमी पार्टी के राज्यसभा में दस सदस्य हैं. सात पंजाब से और तीन दिल्ली से. पंजाब के छह अलग हो गये हैं. अब केवल संत बलवीर सिंह सींचेवाल (Sant Balbir Singh Seechewal) ही पार्टी में रह गये हैं. दिल्ली से संजय सिंह और एनडी गुप्ता बचे हैं. राघव चड्ढा ने कुछ दिन पहले कहा था- ‘घायल हूं, इसलिए घातक हूं.’ इसको उन्होंने चरितार्थ किया. वैसे, आम आदमी पार्टी में यह टूट अचानक नहीं हुई है. लंबे समय से इसके कई कारण बने हुए थे. पार्टी के लिए मुश्किल वाली बात यह है कि राज्यसभा के सदस्यों ने ऐसे समय में पार्टी छोड़ी है जब अरविंद केजरीवाल पंजाब की सत्ता में वापसी की तैयारी में हैं. दिल्ली की सत्ता हाथ से फिसल जाने के बाद पंजाब से ही उम्मीद है. लेकिन, पंजाब की जीत पक्की करनेवाली टीम ने चुनाव से ठीक पहले पार्टी छोड़ उन्हें सकते में डाल दिया है. इस पूरे घटनाक्रम को पंजाब में निराशाजनक दृष्टि से देखा जा रहा है. जनता खुद को ठगा महसूस कर रही है. लब्बोलुआब यह कि जिन वसूलों के दम पर आम आदमी पार्टी ने पंजाब में सत्ता हासिल की थी, उसकी चमक अब मिटती दिख रही है. इससे मुख्य विपक्षी दलों- कांग्रेस (Congress) और अकाली दल (Akali Dal) की स्वीकार्यता फिर से कायम हो जाने की संभावना आकार ले रही है. भाजपा भी उत्साहित है. पर, पंजाब में पकड़ मजबूत बनाना उसके लिए आसान नहीं होगा. आम आदमी पार्टी में सेंध लगाने के बावजूद जन स्वीकार्यता हासिल करना उसके लिए बड़ी चुनौती है. इन सबके मद्देनजर यह कहा जा सकता है कि पंजाब विधानसभा (Punjab Assembly) के चुनाव में खंडित जनादेश की स्थिति बन जा सकती है. वैसा हुआ, तो पंजाब राजनीतिक अस्थिरता और खरीद-फरोख्त का नया केन्द्र बन जा सकता है.

(महेश कुमार सिन्हा बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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