डिजिटल दौर में सूने पड़ते बुक स्टॉल, स्वंय को बदल लें तो…
रेलवे स्टेशनों पर पत्रिकाओं और अखबारों की बिक्री में लगातार गिरावट आयी है. बच्चों की कॉमिक्स, ज्ञानवर्धक पत्रिकाएं और लोकप्रिय उपन्यास, जो कभी सबसे अधिक बिकते थे, अब सीमित संख्या में ही खरीदे जाते हैं. कई छोटे स्टेशनों पर बुक स्टॉल बंद हो चुके हैं, जबकि बड़े स्टेशनों पर भी उनकी रौनक पहले जैसी नहीं रही.
– कर रहे हैं संघर्ष पहचान बनाने के लिए
– पत्र-पत्रिकाओं की बिक्री में लगातार गिरावट
– तब भी उम्मीद बची हुई है
– अपना अलग आकर्षण है पन्नों की सरसराहट का
डा. विजय गर्ग
16 जुलाई 2026
एक समय था जब भारतीय रेलवे स्टेशनों पर बुक स्टॉल (Book stall) यात्रियों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र हुआ करते थे. ट्रेन (Train) का इंतजार हो या लंबी यात्रा, लोग एक उपन्यास (Novel), पत्रिका (Magazine), अख़बार (Newspaper) या बच्चों की किताब (Children’s Book) खरीदना नहीं भूलते थे. रेलवे स्टेशनों के पुस्तक स्टॉल केवल किताबें बेचने की जगह नहीं थे, बल्कि वे पढ़ने की संस्कृति (Reading culture) को बढ़ावा देने वाले छोटे-छोटे ज्ञान केंद्र भी थे. आज वही बुक स्टॉल डिजिटल युग की तेज रफ्तार में अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. स्मार्टफोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने लोगों के समय बिताने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है. पहले यात्रा के दौरान लोग किताबें पढ़ते थे, लेकिन अब अधिकांश यात्री मोबाइल फोन (Mobile Phone) पर वीडियो (Vedio) देखते हैं, सोशल मीडिया (Social Media) स्क्रॉल करते हैं या ऑनलाइन गेम (Online game) खेलते हैं. ई-पुस्तकों और डिजिटल समाचार माध्यमों ने भी मुद्रित पुस्तकों और पत्रिकाओं की मांग को प्रभावित किया है.
सीमित खरीददारी
रेलवे स्टेशनों पर पत्रिकाओं और अखबारों की बिक्री में लगातार गिरावट आयी है. बच्चों की कॉमिक्स (Comics), ज्ञानवर्धक पत्रिकाएं (Informative Magazines) और लोकप्रिय उपन्यास (Popular Novels), जो कभी सबसे अधिक बिकते थे, अब सीमित संख्या में ही खरीदे जाते हैं. कई छोटे स्टेशनों पर बुक स्टॉल बंद हो चुके हैं, जबकि बड़े स्टेशनों पर भी उनकी रौनक पहले जैसी नहीं रही. हालांकि, समस्या केवल डिजिटल माध्यमों की नहीं है. पुस्तकों की बढ़ती कीमतें, पढ़ने की घटती आदत, व्यस्त जीवनशैली और त्वरित मनोरंजन की बढ़ती उपलब्धता ने भी इस बदलाव को तेज किया है. नयी पीढ़ी का एक बड़ा वर्ग स्क्रीन पर पढ़ना अधिक सुविधाजनक मानता है. फिर भी उम्मीद पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है. आज भी अनेक यात्री यात्रा के दौरान पुस्तक पढ़ने का आनंद लेना पसंद करते हैं.
बढ़ सकता है आकर्षण
यदि रेलवे बुक स्टॉल (Railway Book stall) आधुनिक आवश्यकताओं के अनुसार स्वयं को बदलें, तो वे फिर से लोकप्रिय बन सकते हैं. पुस्तकों के साथ ई-बुक वाउचर, शैक्षिक सामग्री, प्रतियोगी परीक्षाओं की पुस्तकें, स्थानीय भाषा का साहित्य, बच्चों के लिए आकर्षक पुस्तकें और लेखकों के साथ संवाद जैसे कार्यक्रम यात्रियों को आकर्षित कर सकते हैं. भारतीय रेलवे भी स्टेशनों को केवल आवागमन का केंद्र नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों का स्थान बना सकती है. रीडिंग कॉर्नर (Reading Corner), मिनी लाइब्रेरी (Mini Library), पुस्तक प्रदर्शनियां (Book Exhibitions) और स्थानीय लेखकों की पुस्तकों को प्रमुख स्थान देकर पढ़ने की संस्कृति को पुनजीर्वित किया जा सकता है.
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पठन संस्कृति की विरासत
डिजिटल तकनीक (Digital Technology) और मुद्रित पुस्तकों (Printed Books) को एक-दूसरे का प्रतिस्पर्धाएं नहीं, बल्कि पूरक माना जाना चाहिए. स्क्रीन त्वरित सूचना दे सकती है, लेकिन पुस्तकें गहरायी से सोचने, कल्पनाशक्ति विकसित करने और एकाग्रता बढ़ाने का अवसर देती हैं. रेलवे बुक स्टॉल केवल व्यापारिक प्रतिष्ठान नहीं हैं. वे भारत की समृद्ध पठन संस्कृति की विरासत हैं. यदि समाज, प्रकाशक और रेलवे मिलकर इन्हें नये स्वरूप में विकसित करें, तो ये स्टॉल एक बार फिर यात्रियों की पहली पसंद बन सकते हैं. डिजिटल युग में भी किताबों की खुशबू और पन्नों की सरसराहट का अपना अलग ही आकर्षण है, जिसे किसी स्क्रीन से पूरी तरह प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता.
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