हाल शिक्षा का (1) : बाजार में बदल रहा ज्ञान का मंदिर… सीख रहे हैं या खरीद रहे हैं?
शिक्षा को फिर से उसके मूल उद्देश्य से जोड़ें. स्कूलों को केवल परीक्षा परिणामों का केंद्र न बनाकर, उन्हें विचार, संवाद और सृजन का मंच बनायें. सरकार, शिक्षण संस्थानों और समाज को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि शिक्षा सुलभ,समावेशी और मूल्य आधारित बनी रहे.
- ‘सेवा’ से ‘उत्पाद’ में बदलती जा रही है शिक्षा
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उपस्थिति कक्षा में, ध्यान ज्ञान के बाजार पर
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प्रभावित हो रहा है शिक्षक-छात्र संबंध भी
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संतुलन का अभाव सबसे बड़ी चुनौती
डा. विजय गर्ग
30 जून 2026
विद्यालय (School) अब केवल ज्ञान का मंदिर नहीं रह गया है, उसकी चौखट पर बाजार खड़ा दिखाई देता है. आकर्षक पैकेजिंग (Attractive packaging) में अपने विस्तार की असीम संभावनाओं के साथ. कभी शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति के सर्वांगीण विकास, नैतिकता और समाज निर्माण से जुड़ा था. अब धीरे-धीरे यह ‘सेवा’ से ‘उत्पाद’ (‘Service’ to ‘Product’) में बदलती जा रही है. इस परिवर्तन ने शिक्षा के मूल स्वरूप को चुनौती दी है. सवाल भी उठाया है कि क्या हम वास्तव में सीख रहे हैं, या खरीद रहे हैं? विद्यालयों के बाहर कोचिंग संस्थानों (Coaching Institutes), गाइड पुस्तकों (Guide Books), डिजिटल ऐप्स (Digital Apps) और निजी ट्यूशन (Private Tuition) का जाल फैल चुका है. यह पूरा तंत्र बच्चों और अभिभावकों को विश्वास दिलाता है कि बिना इन ‘अतिरिक्त साधनों’ के सफलता संभव नहीं. परिणामस्वरूप स्कूल में होने वाली पढ़ाई का महत्व घटने लगता है. छात्र कक्षा में उपस्थित तो रहते हैं, पर उनका ध्यान आमतौर पर उस ‘बाजार’ पर होता है जो तेज, आसान और सुनिश्चित सफलता का वादा करता है.
नया वर्ग विभाजन
बाजार की यह घुसपैठ केवल शैक्षणिक सामग्री (Educational Material) तक सीमित नहीं है. आज स्कूलों में ब्रांडेड यूनिफार्म (Branded Uniform), महंगे बैग (Expensive Bags), विशेष किताबें और अनिवार्य गतिविधियों के नाम पर अतिरिक्त शुल्क. ये सब मिलकर शिक्षा को महंगा (Making education Expensive) और असमान बना रहे हैं. शिक्षा का अधिकार (Right to Education) तो सबको है, लेकिन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा (Quality Education) अब धीरे-धीरे केवल उन लोगों तक सीमित होती जा रही है जो इसे खरीदने का सामर्थ्य (Purchasing Power) रखते हैं. इससे समाज में एक नया वर्ग विभाजन उत्पन्न हो रहा है. शिक्षा आधारित असमानता. डिजिटल क्रांति (Digital Eevolution) ने भी इस बाजार को मजबूत बनाया है. ऑनलाइन लर्निंग प्लेटफार्म (Online learning platform), एड-टेक कंपनियां (Ed-Tech Companies) और वर्चुअल क्लासेस (Virtual Classes) ने शिक्षा को तकनीकी रूप से उन्नत तो बनाया है, लेकिन इससे इसका व्यवसायीकरण भी बढ़ा है. विज्ञापन यह बताते हैं कि ‘स्मार्ट लर्निंग’ ही सफलता की कुंजी है, जबकि वास्तविकता यह है कि तकनीक केवल एक माध्यम है, लक्ष्य नहीं.
सिमट रहा मानवीय पहलू
इस परिदृश्य में सबसे अधिक प्रभावित होता है शिक्षक और छात्र (Student) का संबंध. शिक्षक (Teacher), जो कभी मार्गदर्शक और प्रेरणास्रोत (Guide and Source of Inspiration) हुआ करता था, अब प्रायः एक ‘सेवा प्रदाता’ के रूप में देखा जाने लगा है. वहीं छात्र, जिसे जिज्ञासु और खोजी (Curious and Inquisitive) होना चाहिए, वह अंकों और रैंकिंग के दबाव में अपनी मौलिकता खोने लगता है. शिक्षा का मानवीय पहलू धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है. यह भी सच है कि बाजार पूरी तरह नकारात्मक नहीं है. उसने शिक्षा में प्रतिस्पर्धा, नवाचार और संसाधनों की उपलब्धता को बढ़ाया है. लेकिन, जब बाजार का उद्देश्य केवल लाभ कमाना हो जाये और शिक्षा का उद्देश्य पीछे छूट जाये, तब समस्या उत्पन्न होती है. संतुलन का अभाव ही सबसे बड़ी चुनौती है.
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सीखना एक प्रक्रिया है
आवश्यकता इस बात की है कि हम शिक्षा को फिर से उसके मूल उद्देश्य से जोड़ें. स्कूलों को केवल परीक्षा परिणामों का केंद्र (Exam Results Hub) न बनाकर, उन्हें विचार, संवाद और सृजन का मंच (A Platform For Ideas, Dialogue & Creation) बनायें. सरकार, शिक्षण संस्थानों और समाज को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि शिक्षा सुलभ,समावेशी और मूल्य आधारित बनी रहे.अभिभावकों को भी इस भ्रम से बाहर निकलना होगा कि अधिक खर्च का अर्थ बेहतर शिक्षा है. बच्चों को उन्हें यह समझाना होगा कि सीखना एक प्रक्रिया है न कि कोई उत्पाद जिसे खरीदा जा सके. शिक्षकों को भी अपनी भूमिका को पुनः परिभाषित करना होगा. वे केवल पाठ पढ़ाने वाले नहीं, बल्कि जीवन के मार्गदर्शक हैं.
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