Suprime Court : सजा माफी पर सवाल… जाना होगा फिर आनंद मोहन को जेल ?

मीडिया में जो बातें आयी हैं उनके मुताबिक सुनवाई के दौरान सर्वाेच्च अदालत ने कई बड़े सवाल उठाये. मसलन क्या जेल नियमावली में संशोधन किसी खास व्यक्ति को लाभ पहुंचाने के लिए किया गया? क्या बिहार सरकार ने कानून की मूल भावना से समझौता किया? क्या समय से पहले रिहाई का फैसला निष्पक्ष और कानूनी प्रक्रिया के तहत लिया गया?
– बदलाव किसी खास व्यक्ति को फायदा पहुंचाने के लिए किया गया?
– बिहार सरकार ने कानून की मूल भावना से समझौता किया?
– कानून में संशोधन पर तब काफी विवाद हुआ
– मामले को सर्वोच्च अदालत में ले गयीं उमा कृष्णैया
तापमान लाइव ब्यूरो
17 जुलाई 2026
New Delhi: विधायक बेटा चेतन आनंद को मंत्री नहीं बनाये जाने पर आसमान सिर पर उठा सत्तारूढ़ जदयू को सांसत में डाल रखे पूर्व सांसद आनंद मोहन (Anand Mohan) की समय पूर्व जेल से रिहाई (Release from Prison) के मामले को लेकर बिहार की राजनीति (Politics of Bihar) फिर गरमा गयी है. सर्वाेच्च अदालत (Suprime Court) ने बिहार सरकार से तीखे सवाल पूछते हुए यह जानना चाहा है कि क्या जेल नियमों में बदलाव किसी खास व्यक्ति को फायदा पहुंचाने के लिए किया गया था? सवाल इसलिए भी गंभीर हैं कि बिहार सरकार (Bihar Goverment) ने अप्रैल 2023 में जेल में बदलाव कर आनंद मोहन की रिहाई का रास्ता साफ कर दिया था. आनंद मोहन 1994 में गोपालगंज (Gopalganj) के तत्कालीन जिलाधिकारी जी. कृष्णैया (G. Krishnaiah) की हत्या के मामले में दोषी थे. निचली अदालत से उन्हें फांसी की सजा (Sentence to Death) मिली थी. पटना उच्च न्यायालय (Patna High Court) ने उसे आजीवन कारावास (life Imprisonment) में बदल दिया था. कालांतर में सर्वाेच्च अदालत ने भी उसे संपुष्ट कर दिया था.
कानून मेंद संशोधन
बिहार जेल नियमावली (Bihar Jail Manual) के तहत उम्रकैद की सजा पाये कैदियों को बीस साल की अवधि जेल में गुजारने के बाद आमतौर पर माफी मिल जाती है. परन्तु, यह नियम आनंद मोहन के मामले में लागू नहीं होता था. इसलिए कि जेल नियमावली 2012 के नियम 481(1) (ए) में ड्यूटी पर तैनात लोक सेवक की हत्या के दोषियों को समय पूर्व रिहाई या माफी का प्रावधान नहीं था. उम्रकैद की सजा मिली, तो ताउम्र जेल में ही रहना था. दिलचस्प बात यह कि नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार ने ही ऐसा नियम बनाया था और फिर उसी ने उस नियम में संशोधन (Amendment to the Rule) कर इस प्रतिबंध को हटा दिया. इसका त्वरित लाभ आनंद मोहन को मिल गया. सहरसा (Sarhasa) जेल में तकरीबन 16 साल की सजा काटने के बाद 27 अप्रैल 2023 को ‘सजा माफी’ के तहत उनकी रिहाई हो गयी.
फैसला सुरक्षित रख लिया
आनंद मोहन की रिहाई (Anand Mohan’s Release) और जेल नियमों में बदलाव (Changes to Jail Rules) को लेकर तब काफी काफी विवाद हुआ. दिवंगत जिलाधिकारी जी. कृष्णैया की विधवा उमा कृष्णैया (Uma Krishnaiah) ने उनकी रिहाई को सर्वाेच्च अदालत में चुनौती दी. मामले की सुनवाई पूरी होने के बाद शीर्ष अदालत ने गुरुवार को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया. मीडिया में जो बातें आयी हैं उनके मुताबिक सुनवाई के दौरान सर्वाेच्च अदालत ने कई बड़े सवाल उठाये. मसलन क्या जेल नियमावली में संशोधन किसी खास व्यक्ति को लाभ पहुंचाने के लिए किया गया? क्या बिहार सरकार ने कानून की मूल भावना से समझौता किया? क्या समय से पहले रिहाई का फैसला निष्पक्ष और कानूनी प्रक्रिया के तहत लिया गया?
सर्वोच्च अदालत ने यह भी कहा
इन सवालों के साथ सर्वाेच्च अदालत ने यह भी कहा कि किसी लोक सेवक की हत्या (public servant Murder) को ‘दुर्लभतम’ अपराध नहीं मानना समाज में गलत संदेश दे सकता है. बहरहाल, इन सवालों ने बिहार सरकार की मंशा और फैसले दोनों को कठघरे में खड़ा कर दिया है. अब सवाल यह कि क्या आनंद मोहन को फिर जेल जाना पड़ जायेगा? सर्वाेच्च अदालत ने अभी उनकी रिहाई रद्द नहीं की है. लेकिन, अंतिम सुनवाई में अदालत यह मानती है कि नियमों में बदलाव या रिहाई का फैसला कानून के विपरीत था, तो उनकी रिहाई निरस्त हो सकती है. ऐसी स्थिति में आनंद मोहन को दोबारा जेल जाकर शेष सजा काटनी पड़ सकती है.
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क्यों अहम है यह मामला?
मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह सिर्फ आनंद मोहन तक सीमित नहीं है. सर्वाेच्च अदालत का फैसला यह भी तय करेगा कि क्या कोई राज्य सरकार नियम बदलकर किसी विशेष सजायाफ्ता को समय से पहले रिहा कर सकती है या ऐसे फैसलों पर न्यायिक कसौटी और सख्त होगी. सबकी नजर अब सर्वाेच्च अदालत के फैसले पर है. वही तय करेगा कि आनंद मोहन की आजादी बरकरार रहेगी या उन्हें फिर जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ जायेगा?

