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NEET ‘Club’ : लड़ाई जीततीं लड़कियां, शिखर पर रहते लड़के

पिछले कई नीट सत्रों के आंकड़ों को एक साथ देखने पर, एक संरचनात्मक पैटर्न सामने आता है, न कि सिर्फ एक साल का इत्तेफाक. पिरामिड के निचले हिस्से में लड़कियां हावी हैं. वे संख्या में अधिक पंजीकरण कराती हैं, अधिक संख्या में परीक्षा देती हैं और पूर्ण संख्या के साथ-साथ, हाल के वर्षों में थोड़ी अधिक दर से भी, योग्य घोषित की जाती हैं.

– लड़कियों की सफलता 56 प्रतिशत से अधिक
– 55.1 प्रतिशत लड़के ही सफल हो पाये
– पिरामिड के निचले हिस्से में लड़कियां हावी
– पिरामिड के शिखर पर लड़के हावी

डा. विजय गर्ग
19 जुलाई 2026

New Delhi: 16 जुलाई 2026 को जब राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) ने नीट- यूजी 2026 (NEET-UG 2026) के नतीजे घोषित किये, तो मुख्य आंकड़ों ने भारत की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा (The largest medical entrance exam) की एक जानी-पहचानी कहानी को दोहराया. लड़कियों ने फिर लड़कों को पीछे छोड़ दिया. लेकिन, जब इन आंकड़ों की गहराई में जायें, तो एक और लगातार चलने वाली कहानी सामने आती है. मेरिट सूची के शीर्ष पर यानी 720 में से 690 से ज्यादा अंक पाने वाले छात्रों के छोटे-से चुनिंदा समूह में लड़के लगातार हावी रहते हैं. यह विरोधाभास-लड़कियां लड़ाई जीतती हैं, लड़के शिखर जीतते हैं- कई वर्षों से लगातार दोहराया जा रहा है. इस साल के नतीजे इसके कारणों को समझने का नया मौका देते हैं.

आंकड़ों में परिणाम

इस साल लगभग 20 लाख उम्मीदवार नीट-यूजी 2026 में बैठे. उन सब ने देश भर के 551 शहरों और 14 विदेशी स्थानों के 05 हजार 440 केंद्रों पर परीक्षा दी. इनमें से 11 लाख 21 हजार उम्मीदवार अंडरग्रेजुएट मेडिकल (Undergraduate Medical), डेंटल (Dental), आयुष (Ayush) और सहायक स्वास्थ्य कार्यक्रमों (Allied health programs) में प्रवेश के लिए योग्य घोषित किये गये. लड़कियां इस योग्य समूह का बड़ा हिस्सा बनीं, जो कुल सफल उम्मीदवारों का 58 प्रतिशत से अधिक थीं. योग्यता दर में लैंगिक अंतर, भले ही इस मुख्य आंकड़े से कम है, फिर भी स्पष्ट और लगातार दिखाई दिया. परीक्षा देने वाली लड़कियों में से 56.8 प्रतिशत योग्य घोषित की गयीं, जबकि लड़कों की दर 55.1 प्रतिशत रही. पूर्ण संख्या में योग्य हुई लड़कियां (06 लाख 54 हजार 049) योग्य हुए लड़कों (04 लाख 67 हजार 134) से कहीं ज्यादा थीं. यह अंतर जितना अधिक पास दर के कारण है, उतना ही लड़कियों की बड़ी संख्या में भागीदारी के कारण भी है.

जहां आंकड़े पलट जाते हैं

यह कोई एक बार की बात नहीं है. कई वर्षों से नीट पंजीकरण (NEET Registration) में लड़कियों की संख्या लड़कों से अधिक रही है. हाल के वर्षों में उनकी योग्यता दर भी लड़कों से थोड़ा आगे रही है. नीट-यूजी 2025 में, 13 लाख 01 हजार लड़कियों ने परीक्षा दी थी, जबकि लड़कों की संख्या 09 लाख 65 हजार थी. 2022 में योग्य हुई लड़कियों की संख्या (05 लाख 63 हजार 902) योग्य हुए लड़कों (04 लाख 29 हजार160) से काफी अधिक थी, जबकि पंजीकृत उम्मीदवारों में भी लड़कियां लड़कों से 02 लाख 50 हजार से अधिक थीं. लेकिन जब रैंक सूची के शीर्ष की ओर ध्यान दें, तो तस्वीर बदल जाती है. इस साल 138 उम्मीदवारों ने 690 अंक की सीमा पार की. इनमें से 26 ने 690 से अधिक अंक हासिल किये, जबकि 17 राज्य टॉपरों ने 700 का आंकड़ा पार किया. देश के दो सबसे ज्यादा अंक 720 में से 715 पंजाब (Panjab) के आर्यन गुप्ता (Aryan Gupta) और हरियाणा (Hariyana) के पांशुल बंसल (Panshul Bansal) ने संयुक्त रूप से हासिल किये. दोनों ही लड़के थे. इस बेहद चुनिंदा समूह में से 93 प्रतिशत पहली बार नीट देने वाले छात्र थे और 99 प्रतिशत की उम्र 17 से 19 वर्ष के बीच थी.

लड़कों का दबदबा

यह दर्शाता है कि परीक्षा के शिखर पर युवा, पहली-कोशिश वाले छात्रों का ही बोलबाला है. इस बेहद ऊंचे स्तर पर यह समूह लड़कों की ओर झुका हुआ प्रतीत होता है. यह रुझान पिछले वर्षों से भी मेल खाता है. नीट यूजी 2025 में, देश के टॉपर (Country’s topper) राजस्थान (Rajasthan) के महेश कुमार (Mahesh Kumar) ने 686 अंक हासिल किये थे. सबसे ऊंची रैंक वाली लड़की दिल्ली की अविका अग्रवाल (Avika Agarawal) ने ऑल इंडिया रैंक में 05वां स्थान हासिल किया था. एक शानदार प्रदर्शन. लेकिन, फिर भी शीर्ष पर तीन लड़कों से पीछे. 2024 में उस समय की रिपोर्टों ने स्पष्ट रूप से नोट किया था कि सबसे ऊंची रैंकें हासिल करने में लड़के लड़कियों से आगे रहे, भले ही 67 छात्रों ने एक जैसे पर्सेंटाइल स्कोर के साथ संयुक्त रूप से एआईआर वन हासिल किया था. 2023 में देश भर की शीर्ष तीन रैंकें लड़कों को मिलीं और 2022 में शीर्ष 50 रैंक धारकों में से केवल 16 लड़कियां थीं. भले ही उस साल योग्य हुए सभी उम्मीदवारों में लड़कियों की संख्या अधिक थी.

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इत्तेफाक नहीं, पैटर्न

पिछले कई नीट सत्रों के आंकड़ों को एक साथ देखने पर, एक संरचनात्मक पैटर्न सामने आता है, न कि सिर्फ एक साल का इत्तेफाक. पिरामिड के निचले हिस्से में लड़कियां हावी हैं. वे संख्या में अधिक पंजीकरण कराती हैं, अधिक संख्या में परीक्षा देती हैं और पूर्ण संख्या के साथ-साथ, हाल के वर्षों में थोड़ी अधिक दर से भी, योग्य घोषित की जाती हैं. पिरामिड के शिखर पर लड़के हावी हैं. 690 से अधिक अंक पाने वाले बेहद कम छात्रों में या सबसे ऊंची ऑल-इंडिया रैंकें हासिल करने वालों में, लगभग हर साल इस दशक में लड़कों का हिस्सा असमान रूप से अधिक रहा है. कई शिक्षा विशेषज्ञों और कोचिंग उद्योग के संचालककों का मानना है कि इसके पीछे कई संभावित कारण हैं.

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(डा. विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्राचार्य हैं. विभिन्न विषयों पर सारगर्भित लेखन भी करते हैं.)
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