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Sawan Special : मोर, पपीहा और कोयल… सावन में गूंजते प्राकृतिक संगीत के तीन सुर

डा. विजय गर्ग
18 अगस्त 2026
सावन (Sawan) में प्रकृति का रूप ही बदल जाता है. आकाश में काले बादल छा जाते हैं, वर्षा की बूंदें धरती को भिगोने लगती हैं, मिट्टी से सोंधी खुशबू उठती है और गर्मी में मुरझाये पेड़-पौधे तथा सूखे खेत फिर से हरे- भरे हो जाते हैं. इस मनमोहक परिवर्तन के बीच मोर (Peacock) , पपीहा (Papiha) और कोयल (Cuckoo) की आवाजें सावन के प्राकृतिक संगीत के तीन विशिष्ट सुरों में बदल जाती हैं. ये पक्षी केवल सावन के प्राकृतिक दृश्य का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि उनकी आवाजें भारतीय (Indian) जीवन की भावनाओं, लोक-परंपराओं और स्मृतियों से भी गहराई से जुड़ी हुई हैं.

सावन के साथ मोर का संबंध बहुत पुराना और गहरा है. जब आकाश में बादल घिरते हैं और पहली फुहारें धरती को भिगोती हैं, तब मोर के बोल होने वाली वर्षा की सूचना देते हैं. अपने सुंदर पंख फैलाकर मोर का नृत्य सावन के सबसे मोहक दृश्यों में से एक है. काले बादलों की पृष्ठभूमि में नाचता हुआ मोर ऐसा प्राकृतिक (Natural) दृश्य प्रस्तुत करता है, जिसे जानने- समझने के लिए शब्दों की आवश्यकता नहीं होती. ऐसा लगता है मानो स्वयं प्रकृति वर्षा के आगमन का उत्सव मना रही हो. कवियों और कलाकारों ने पीढ़ियों से मोर को सुंदरता, उल्लास और सावन की खुशी के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है. मोर हमें भारत की समृद्ध जैव-विविधता की भी याद दिलाता है.

पपीहा, जिसे भारतीय साहित्यिक परंपरा में अक्सर ‘चातक’ से जोड़ा जाता है, का सावन से विशेष संबंध है. इसकी विशिष्ट पुकार वर्षा ऋतु से जुड़ी हुई है और पीढ़ियों से लोग इसकी आवाज को बारिश की प्रतीक्षा के साथ जोड़ते आये हैं. भारतीय लोक-साहित्य (Indian Folk Literature) और कविता (Poem) में पपीहे को अक्सर वर्षा की बेसब्री से प्रतीक्षा करने वाले पक्षी के रूप में चित्रित किया गया है. इससे जुड़ी सभी लोक-मान्यताएं वैज्ञानिक रूप से सही हों, यह आवश्यक नहीं है, लेकिन इस पक्षी की सांस्कृतिक छवि आज भी अत्यंत प्रभावशाली है.पपीहे की बार-बार सुनाई देने वाली पुकार पत्तों की सरसराहट और गिरती वर्षा की बूंदों के बीच प्रकृति के संगीत में एक और मधुर स्वर जोड़ देती है.

कोयल भारतीय कविता, लोकगीतों (Folk songs) और लोक-साहित्य में सबसे अधिक प्रसिद्ध गाने वाले पक्षियों में से एक है. इसकी मधुर कूक लंबे समय से सुंदरता, विरह, प्रेम और ऋतुओं (Seasons) के परिवर्तन से जुड़ी रही है. हालांकि, कोयल की आवाज वर्ष के अलग-अलग समय में भी सुनाई देती है, लेकिन बारिश, हवा और भीगे पत्तों की सरसराहट के साथ इसकी कूक और भी कर्णप्रिय लगती है. इसकी मधुर लय सावन के शांत और सुहावने वातावरण में सहज रूप से घुल जाती है. कई लोगों के लिए किसी पास के पेड़ से आती कोयल की कूक बचपन की यादों, गांव के जीवन, गर्मियों की दोपहरों और वर्षा की प्रतीक्षा के पलों को फिर से जीवंत कर देती है.

मोर, पपीहा और कोयल मिलकर सावन के प्राकृतिक संगीत को एक अनूठा स्वर देते हैं. मोर वर्षा के दृश्यात्मक उल्लास का प्रतीक है, पपीहा वर्षा की प्रतीक्षा और आशा का स्वर छेड़ता है, जबकि कोयल अपनी मधुर कूक से इस संगीत को और सुरीला बना देती है. इन पक्षियों की आवाजों के साथ वर्षा की टप-टप, पत्तों की सरसराहट, बहते पानी की कल-कल और दूर से आती बादलों की गर्जना मिलकर प्रकृति की एक अद्भुत सिम्फनी (Symphony) रचती हैं. मनुष्य द्वारा बनाये गये संगीत (music) के विपरीत प्रकृति के इस संगीत की कोई लिखित धुन नहीं होती. इसका ताल ऋतुओं, मौसम, जीव-जंतुओं की प्राकृतिक प्रवृत्तियों और पर्यावरण की ध्वनियों से बनता है. शायद यही बात सावन को इतना विशेष बनाती है. यह केवल धरती के रंग नहीं बदलता, बल्कि उसकी आवाजें भी बदल देता है.

सावन में पक्षियों की ये मधुर आवाजें हमें यह भी याद दिलाती हैं कि वन्यजीवों के लिए स्वस्थ पर्यावरण (Environment) कितना आवश्यक है. पक्षियों को घोंसले बनाने, भोजन खोजने और आश्रय पाने के लिए पेड़ों तथा प्राकृतिक आवासों की आवश्यकता होती है. आर्द्र भूमि, घास के मैदान, कृषि क्षेत्र और जंगल असंख्य पक्षियों तथा अन्य जीवों के लिए महत्वपूर्ण आश्रय हैं. तेजी से बढ़ता शहरीकरण, पेड़ों की कटाई, प्रदूषण, बढ़ता शोर और प्राकृतिक आश्रयों का विनाश धीरे-धीरे उन आवाजों को शांत कर सकता है, जो हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा हैं द. यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियां भी सावन में मोर का नृत्य देखें, कोयल की कूक सुनें और पपीहे की पुकार का आनंद लें, तो हमें उनके प्राकृतिक आश्रयों की रक्षा करनी होगी.

(डा. विजय गर्ग सेवानि/वृत्त प्राचार्य हैं. विभिन्न विषयों पर सारगर्भित लेखन भी करते हैं.)

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