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Social issue लोक बोली में गालियां परंपरा या प्रवृत्ति ?


डा. विजय गर्ग
02 अगस्त 2026
भाषा (Language) किसी भी समाज (Society) की संस्कृति, इतिहास, जीवन शैली और सामूहिक चेतना का दर्पण होती है. लोक बोली (Folk dialect) तो विशेष रूप से आम जनजीवन की भावनाओं, अनुभवों, हास्य, लोकाचार और सामाजिक संबंधों को अपने भीतर समेटे रहती है. इसी लोक बोली का एक पक्ष गालियां भी हैं. प्रश्न यह है कि क्या गालियां वास्तव में हमारी लोक परंपरा का हिस्सा हैं या समय के साथ विकसित हुई एक ऐसी प्रवृत्ति, जिसे अब सामान्य मान लिया गया है? भारत (India) के अनेक क्षेत्रों में लोकगीतों (Folk songs) , विवाह (Marriage) समारोहों, नाट्य (Theatrical) प्रस्तुतियों और कुछ पारंपरिक रस्मों के दौरान हंसी-मजाक के रूप में तीखे या व्यंग्यात्मक शब्दों का प्रयोग होता रहा है. इनका उद्देश्य किसी व्यक्ति का अपमान करना नहीं, बल्कि वातावरण को हल्का-फुल्का और मनोरंजक बनाना होता था. ऐसे शब्द एक सीमित सांस्कृतिक संदर्भ में ही स्वीकार किए जाते थे और सामाजिक मर्यादा का ध्यान रखा जाता था।

समय के साथ परिस्थितियां बदल गयी हैं. आज गालियां केवल विशेष अवसरों तक सीमित नहीं रहीं. वे सामान्य बातचीत, सोशल मीडिया (Social Media) , फिल्मों (Films), वेब सीरीज़ (Web Series) , ऑनलाइन गेमिंग और लोकप्रिय गीतों का हिस्सा बनती जा रही हैं. कई बार उन्हें आधुनिकता, बेबाकी या प्रभावशाली व्यक्तित्व का प्रतीक भी मान लिया जाता है. इसका प्रभाव विशेष रूप से बच्चों और युवाओं की भाषा पर दिखाई देता है, जो सुनी हुई भाषा को सहज रूप से अपनाने लगते हैं. गालियों का सबसे चिंताजनक पक्ष यह है कि उनमें से अनेक महिलाओं, परिवार और रिश्तों को अपमानित करने वाली होती हैं. ऐसी भाषा केवल किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे सामाजिक ताने-बाने का भी अनादर करती है. जब अपमानजनक शब्द सामान्य संवाद का हिस्सा बन जाते हैं, तो समाज में संवेदनशीलता, सम्मान और शिष्टाचार धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगते हैं.

कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि गालियां लोक जीवन की सहज अभिव्यक्ति हैं और भावनाओं को व्यक्त करने का माध्यम हैं. यह सही है कि क्रोध, निराशा या पीड़ा के क्षणों में लोग कठोर शब्दों का प्रयोग कर बैठते हैं. लेकिन, प्रभावी संवाद के लिए अपमानजनक भाषा आवश्यक नहीं है. समृद्ध भाषा हमें असहमति, आक्रोश और असंतोष व्यक्त करने के अनेक सभ्य और सार्थक तरीके प्रदान करती है. परिवार, विद्यालय और समाज भाषा के संस्कार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. बच्चे वही भाषा सीखते हैं जो वे अपने घर, मित्रों, शिक्षकों और डिजिटल माध्यमों से सुनते हैं. यदि घरों में सम्मानजनक संवाद को बढ़ावा दिया जाये और विद्यालयों (Schools) में भाषा के नैतिक पक्ष पर भी ध्यान दिया जाये, तो आने वाली पीढ़ियां अधिक संवेदनशील और संस्कारित भाषा का प्रयोग करेंगी. मीडिया (Media) और मनोरंजन (Entertainment) जगत की भी यह जिम्मेदारी है कि वे लोकप्रियता के नाम पर अशिष्ट भाषा को बढ़ावा न दें.

लोक संस्कृति का संरक्षण आवश्यक है, लेकिन परंपरा के नाम पर हर व्यवहार को स्वीकार करना उचित नहीं है. समाज समय के साथ बदलता है और उसकी भाषा भी विकसित होती है. इसलिए हमें लोक परंपराओं के सकारात्मक पक्षों—लोकगीतों, कहावतों, लोककथाओं और मानवीय मूल्यों—को सहेजना चाहिए, जबकि अपमानजनक और असम्मानजनक भाषा को पीछे छोड़ने का प्रयास करना चाहिए. अंततः, लोक बोली की वास्तविक सुंदरता उसकी सरलता, आत्मीयता और मानवीय संवेदनाओं में है, न कि गालियों में. गालियों को परंपरा का स्थायी अंग मानने के बजाय हमें ऐसी भाषा को बढ़ावा देना चाहिए जो सम्मान, सौहार्द्र और संवाद की संस्कृति को मजबूत करे. आखिरकार, किसी भी समाज की पहचान केवल उसकी संस्कृति से नहीं, बल्कि उसकी भाषा की मर्यादा से भी होती है.

(डा. विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्राचार्य हैं. विभिन्न विषयों पर सारगर्भित लेखन भी करते हैं.)

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