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Bada Mudda ऑर्केस्ट्रा : मुस्कुराहटों में घुलते जिन्दगी के दर्द

डॉ विजय गर्ग
01 अगस्त 2026
ब भी किसी शादी, मेले, सांस्कृतिक आयोजन या उत्सव में ऑर्केस्ट्रा (Orchestra) का कार्यक्रम होता है, तो मंच पर रंग-बिरंगी रोशनी, मधुर संगीत (Music) , आकर्षक नृत्य (Dance) और दर्शकों की तालियां एक ऐसा माहौल बना देती हैं, जिसे देखकर लगता है कि मंच पर प्रस्तुति देने वाले कलाकारों (Artists) का जीवन भी उतना ही आनंदमय और रंगीन होगा. लेकिन, वास्तविकता इससे काफी अलग है. इस चमकदार दुनिया के पीछे अनगिनत संघर्ष, चुनौतियां और त्याग छिपे होते हैं, जिनसे अधिकांश दर्शक अनजान रहते हैं. ऑर्केस्ट्रा केवल मनोरंजन (Entertainment) का माध्यम नहीं है, बल्कि यह हजारों कलाकारों, गायकों, वादकों, तकनीशियनों, ध्वनि विशेषज्ञों, प्रकाश व्यवस्था करने वाले कर्मचारियों और नृत्य कलाकारों की आजीविका का आधार भी है. अनेक छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में यह रोजगार का एक महत्वपूर्ण स्रोत है. फिर भी इस क्षेत्र से जुड़े अधिकतर कलाकारों को असंगठित कार्य व्यवस्था, अनियमित आय और सीमित सामाजिक सुरक्षा जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है.

मंच पर कलाकार हमेशा मुस्कुराते हुए दिखाई देते हैं. दर्शकों का मनोरंजन करना उनका पेशा है, इसलिए वे अपनी व्यक्तिगत परेशानियों को मंच पर नहीं आने देते. कई बार आर्थिक संकट (Economic crisis) , पारिवारिक समस्याएं या स्वास्थ्य (Health) संबंधी कठिनाइयों के बावजूद उन्हें लगातार प्रदर्शन करना पड़ता है. यही एक पेशेवर कलाकार की पहचान भी है, लेकिन इसके पीछे का मानसिक और शारीरिक दबाव अक्सर दिखाई नहीं देता. ऑर्केस्ट्रा में काम करने वाले अधिकतर कलाकारों की आय नियमित नहीं होती. विवाहों और त्योहारों के मौसम में काम अधिक मिलता है, जबकि अन्य महीनों में कार्यक्रम कम हो जाते हैं. इससे उनकी आय में भारी उतार-चढ़ाव आता है. कई कलाकारों को भुगतान में देरी का सामना करना पड़ता है और कभी-कभी तय पारिश्रमिक भी पूरा नहीं मिल पाता. ऐसे में परिवार का खर्च चलाना और बच्चों की शिक्षा (Education) जैसी आवश्यकताओं को पूरा करना कठिन हो जाता है.

ऑर्केस्ट्रा में महिला कलाकारों (Female artists) का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन उन्हें कई अवांछित चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. देर रात तक कार्यक्रम, लंबी यात्राएं, असुरक्षित वातावरण और सामाजिक पूर्वाग्रह उनके कार्य को कुछ अधिक कठिन बना देते हैं. केवल उनके पेशे के आधार पर उनके चरित्र का आकलन करना या उन्हें सम्मान की दृष्टि से न देखना समाज (Society) की एक गंभीर समस्या है. यह समझना आवश्यक है कि मंच पर प्रस्तुति देना भी एक सम्मानजनक पेशा है. हर कलाकार अपनी मेहनत, अभ्यास और प्रतिभा के बल पर दर्शकों का मनोरंजन करता है और उसे उसी सम्मान का अधिकार है, जो किसी अन्य पेशेवर को मिलता है.

एक सफल प्रस्तुति के पीछे घंटों का अभ्यास, शारीरिक फिटनेस, संगीत की समझ और निरंतर मेहनत होती है. कलाकारों को नये गीत, नयी नृत्य शैलियां और बदलती दर्शक पसंद के अनुसार स्वयं को लगातार तैयार करना पड़ता है. कई कलाकार सीमित संसाधनों में भी अपनी कला को जीवित रखने का प्रयास करते हैं.‌ लगातार यात्राएं, अनियमित दिनचर्या, देर रात तक काम, पर्याप्त विश्राम का अभाव और लगातार बेहतर प्रदर्शन का दबाव कलाकारों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है. यदि उचित स्वास्थ्य सुविधाएं और सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध न हों, तो यह स्थिति और कठिन हो जाती है.

समाज को कलाकारों के प्रति अपनी सोच बदलने की आवश्यकता है. केवल मंच पर उनका प्रदर्शन देखकर निर्णय नहीं किया जाना चाहिए. वे भी परिवार, सपनों और जिम्मेदारियों वाले सामान्य नागरिक हैं. सम्मानजनक व्यवहार, सुरक्षित वातावरण और संवेदनशील दृष्टिकोण ही उनके आत्मविश्वास को मजबूत कर सकते हैं.यदि ऑर्केस्ट्रा और सांस्कृतिक (Cultural) उद्योग को मजबूत बनाना है, तो कलाकारों के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए जाने चाहिए…
-उचित और समय पर पारिश्रमिक सुनिश्चित किया जाये.

  • सुरक्षित कार्यस्थल और शिकायत निवारण व्यवस्था विकसित की जाये.
  • स्वास्थ्य बीमा और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का विस्तार किया जाये.
  • कलाकारों के कौशल विकास और प्रशिक्षण के अवसर बढ़ाये जायें.
    -सांस्कृतिक कार्यक्रमों में कार्यरत कलाकारों के अधिकारों की रक्षा के लिए स्पष्ट नियम बनाए जायें.

किसी भी समाज की सांस्कृतिक समृद्धि उसके कलाकारों से होती है. संगीत, नृत्य और लोक संस्कृति हमारी पहचान का हिस्सा हैं. यदि कलाकार सम्मान, सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के साथ काम कर सकें, तो वे समाज को और बेहतर सांस्कृतिक विरासत दे सकते हैं. ऑर्केस्ट्रा की दुनिया वास्तव में चमक, चुनौती और संघर्ष का संगम है. मंच पर दिखाई देने वाली मुस्कान के पीछे वर्षों की मेहनत, अनुशासन, (Discipline) संघर्ष और अनेक त्याग छिपे होते हैं. इसलिए आवश्यक है कि हम कलाकारों को केवल मनोरंजन का साधन न समझें, बल्कि उनके श्रम, प्रतिभा और मानवीय गरिमा का भी सम्मान करें. जब समाज, सरकार और सांस्कृतिक संस्थाएं मिलकर कलाकारों के लिए सुरक्षित, सम्मानजनक और बेहतर वातावरण बनायेंगी, तभी इस चमकदार दुनिया की वास्तविक रोशनी उन लोगों के जीवन तक भी पहुंचेगी, जो अपने हुनर से दूसरों के जीवन में खुशियां भरते हैं.

(डा विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्राचार्य हैं. विभिन्न विषयों पर सारगर्भित लेखन भी करते हैं.)

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