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Tradition रहस्य : क्यों लिखते हैं… चिता की राख पर 94 अंक

यह परंपरा केवल 94 अंक लिख देने भर की नहीं है, यह काशी की उस गहरी आध्यात्मिक सोच का संकेत है, जिसमें जीवन, कर्म और मोक्ष तीनों एक सूत्र में बंधे माने जाते हैं.

परंपरा केवल 94 अंक लिख देने भर की नहीं

आम बात है घाट के आसपास रहने वालों के लिए

गीता और प्राचीन मान्यताओं पर आधारित है परंपरा

अंक 94 मुक्ति-संकेत या मोक्ष का प्रतीक

तापमान लाइव ब्यूरो
01 अगस्त 2026
Varanasi : इसे अंधविश्वास (Superstition) कहें या आस्था , सनातनी (Sanatani) मान्यताओं में काशी (Kashi) के श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार के बाद चिता (Funeral pyre) की राख पर 94 अंक लिखने की परम्परा है. आखिर इस परम्परा का आध्यात्मिक (Spiritual ) महत्व क्या है? यहां यह जानने का प्रयास करते हैं. इसकी जानकारी रखने वाले बताते हैं कि यह परंपरा केवल 94 अंक लिख देने भर की नहीं है, यह काशी की उस गहरी आध्यात्मिक सोच का संकेत है, जिसमें जीवन, कर्म और मोक्ष तीनों एक सूत्र में बंधे माने जाते हैं. काशी की एक पहचान मोक्ष नगरी (Moksh Nagari) की भी है. यहां गंगा (Ganga) के किनारे मणिकर्णिका घाट (Manikarnika Ghat) पर सदियों से अंतिम संस्कार होते आ रहे हैं.

नहीं बुझती कभी चिता की आग

इस महाश्मशान (Mahashmashan) के बारे में बताया जाता है कि राजा हरिशचंद्र (Raja Harishchandra) के समय से लेकर आज तक चिताओं की अग्नि कभी नहीं बुझी है. इधर के दिनों में यही घाट एक और रहस्यमयी परंपरा को लेकर मीडिया (Media) की चर्चा में है कि इस महाश्मशान में क्यों चिता की राख पर 94 अंक लिखा जाता है. परम्परा की बात करें, तो मणिकर्णिका घाट पर जब भी किसी का दाह संस्कार होता है और चिता ठंडी पड़ जाती है, तब राख को गंगा में प्रवाहित करने से पहले पुजारी या स्थानीय लोग उस राख पर 94 अंक लिख देते हैं. घाट के आसपास रहने वालों के लिए यह आम बात है, लेकिन जो लोग पहली बार ये देखते हैं, वे इसे काफी रहस्यमय मानते हैं.

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प्राचीन मान्यताओं पर आधारित परम्परा

जानकारों के मुताबिक यह परंपरा गीता (Geeta) और प्राचीन मान्यताओं पर आधारित है. कहा जाता है कि मृत्यु के बाद मनुष्य का मन पांचों इंद्रियों को अपने साथ ले जाता है. मन को जोड़कर यह संख्या कुल छह हो जाती है. हिंदू दर्शन (Hindu Philosophy) में मनुष्य के जीवन को 100 कर्मों का फल माना गया है. इनमें से 94 कर्म ऐसे होते हैं, जिन पर मनुष्य का नियंत्रण होता है- जैसे उसके नैतिक, सामाजिक, धार्मिक और व्यवहारिक कर्म. ये ही उसके जीवन की दिशा तय करते हैं. बाकी 6 कर्म जीवन, मृत्यु, यश, अपयश, लाभ और हानि ये सभी ईश्वर (God) के हाथ में माने जाते हैं और मनुष्य उन्हें बदल नहीं सकता है.


तो यह है वैज्ञानिक रहस्य!

मीडिया रिपोर्ट में दी गयी जानकारी के अनुसार दाह संस्कार के समय चिता की अग्नि को इन 94 नियंत्रित कर्मों को प्रतीकात्मक रूप से समाप्त करने वाला माना जाता है. इसी कारण राख पर 94 लिखा जाता है. यह इस बात का संकेत होता है कि व्यक्ति अपने सांसारिक कर्मों और बंधनों से मुक्त हो चुका है. शेष 6 कर्म अब ईश्वर की इच्छा पर छोड़ दिये जाते हैं. कुछ विद्वान अंक 94 को मुक्ति-संकेत या मोक्ष का प्रतीक भी मानते हैं. अंतिम क्रिया में पुजारी जब पानी से भरी मटकी फोड़ते हैं, तो यह मृतक के दुनिया से संबंध टूटने का इशारा होता है.

(यह आस्था और विश्वास की बात है. मानना और न मानना आप पर निर्भर है.)

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