Seemanchal Politics : तसलीम परिवार… विरासत पर तकरार, लौटेगा सियासी इकबाल?

तसलीम उद्दीन परिवार के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल पुराना जनाधार वापस पाना नहीं, बल्कि नयी पीढ़ी के मतदाताओं के बीच अपनी प्रासंगिकता साबित करना भी है. तसलीम उद्दीन के निधन के बाद सीमांचल की राजनीति में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव सांसद असदुद्दीन ओवैसी और उनकी पार्टी एआईएमआईएम का बढ़ता प्रभाव है.
सीमांचल : बढ़ रही धीरे- धीरे पंचायत चुनाव की सरगर्मी
वीरानी में सुबक रही तसलीम उद्दीन की विरासत
सब के सब पैदल हो गये सीमांचल की सियासत में
अच्छे दिन की वापसी सिर्फ पारिवारिक एकता से संभव नहीं
अशोक कुमार
06 अगस्त 2026
Purnea: बिहार (Bihar) में पंचायत चुनाव (Panchayat Elections) कब होगा, अनिश्चितता बनी हुई है. तब भी सीमांचल (Seemanchal) में इस चुनाव को लेकर सरगर्मी बढ़ रही है. विशेष कर जिला परिषद (District Council) के चुनाव को लेकर. कस्बाई नुक्कड़ों से लेकर गांवों की चौपालों और स्थानीय राजनीतिक गलियारों तक में संभावित उम्मीदवारों, राजनीतिक समीकरणों और गठजोड़ों पर चर्चाएं होने लगी हैं. मौजूदा सांसद (MP) – विधायक (MLA) और विधान पार्षद (MLC)जहां अधिकाधिक समर्थकों को जनप्रतिनिधि निर्वाचित करा अपने राजनीतिक प्रभाव को जमीनी मजबूती देने की रणनीति बनाने में मशगूल हैं, वहीं कभी सत्ता के केंद्र में रहे राजनीतिक परिवार (Political family) भी इस चुनाव के जरिये अपनी खोयी जमीन वापस पाने की कवायद करते दिख रहे हैं. यहां राजनीतिक परिवार का मतलब ‘सीमांचल के गांधी’ (The Gandhi of Seemanchal) की पहचान रखने वाले दिवंगत पूर्व मंत्री तस्लीम उद्दीन (Taslim Uddin) के परिवार से है
बचा नहीं पाये विरासत
इसे विडम्बना ही कहा जायेगा कि अररिया (Araria) और किशनगंज (Kishanganj) की राजनीति को ताउम्र मनमाफिक हांकने वाले तसलीम उद्दीन की विरासत आज वीरानी में सुबक रही है. बदनसीबी ऐसी कि इस विरासत को आगे बढ़ाने वाले उनके दोनों पुत्र पूर्व सांसद सरफराज आलम (Sarfaraz Alam) और पूर्व विधायक शाहनवाज आलम (Shahnawaz Alam) राजनीतिक तौर पर आज उस मुकाम पर नहीं रह गये हैं, जहां तसलीम उद्दीन उन्हें छोड़ गये थे. हैरान करने वाली बात यह कि अलग- अलग समय में दोनों मंत्री भी रहे, इसके बाद भी पिता की विरासत को बचा नहीं पाये. दोनों के बड़े भाई हैं- मोहम्मद मोकीम उद्दीन (Mohammad Moqeem Uddin) . तसलीम उद्दीन के जीवनकाल में उनकी राजनीतिक इच्छा दमित रही. पिता दिवंगत हुए तो वह इच्छा जागृत हो उठी. फिर पिता की राजनीतिक विरासत के लिए तीनों भाइयों के बीच ऐसी जंग छिड़ी कि सब कुछ बिखर गया. देर सबेर सब के सब सियासत में पैदल हो गये.
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इकबाल लौटने की दुआ
वर्तमान में स्थिति ऐसी है कि इस परिवार का कोई भी सदस्य सांसद या विधायक नहीं है. ऐसा भी नहीं कि सीमांचल में तसलीम उद्दीन का प्रभाव एकदम से खत्म हो गया है. विरासत के विवाद में बिखराव के बावजूद तसलीम उद्दीन क पुराने संपर्कियों और समर्थकों का एक बड़ा वर्ग अब भी मौजूद है, जो इस परिवार का इकबाल लौटने की दुआ करता है. सामान्य समझ भी है कि सरफाज आलम और शाहनवाज आलम आपसी कलह त्याग पुराने समर्थकों और कार्यकर्ताओं को फिर से जोड़ लें तो बड़ी सहजता से परिवार के अच्छे दिन लौट जा सकते हैं. इसके लिए पहल पूर्व सांसद सरफराज आलम को करनी होगी. इसलिए कि उनकी जन स्वीकार्यता अपेक्षाकृत अधिक मानी जाती है. वैसे, शाहनवाज आलम की अपनी अलग छवि है. इस दिशा में कदम उन्हें भी उठाना चाहिए.
संभव है राजनीतिक वापसी
तसलीम उद्दीन के लंबे समय तक सहयोगी रहे वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता पोलो झा (Polo Jha) भी सरफराज आलम और शाहनवाज आलम की एकजुता को परिवार के राजनीतिक पुनरुत्थान के लिए सबसे बड़ी जरूरत मानते हैं. उनका मानना है कि अगर दोनों भाई पारिवारिक मतभेदों से बाहर निकलकर एक साथ आते हैं और तसलीम उद्दीन के पुराने राजनीतिक सहयोगियों एवं कार्यकर्ताओं को फिर से अपने साथ जोड़ते हैं, तो जोकीहाट (Jokihat) विधानसभा क्षेत्र में इस परिवार की राजनीतिक वापसी संभव है. उनके अनुसार वैसा होता है, तो इसका असर अररिया संसदीय क्षेत्र की राजनीति पर भी पड़ सकता है. अररिया से तसलीम उद्दीन और उनके निधन के बाद सरफराज आलम राजद के सांसद रह चुके हैं.
बदल चुका है राजनीति का परिदृश्य
हालांकि, इन दावों और तर्को को राजनीतिक संभावना के रूप में ही देखा जा सकता है. चुनावी राजनीति में पुराने प्रभाव की वापसी केवल पारिवारिक एकता से नहीं, बल्कि संगठन, स्थानीय मुद्दों, उम्मीदवार की स्वीकार्यता और बदल चुके राजनीतिक समीकरणों पर भी निर्भर करेगी. आज की तारीख में सीमांचल की राजनीति का परिदृश्य काफी कुछ रबदल चुका है. नये राजनीतिक दलों का प्रभाव बढ़ा है, पुराने समीकरण टूटे हैं और मुस्लिम मतदाताओं के बीच भी राजनीतिक विकल्प पहले की तुलना में अधिक हैं.
एआईएमआईएम का बढ़ता प्रभाव
इस बदले परिदृश्य में तसलीम उद्दीन परिवार के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल पुराना जनाधार वापस पाना नहीं, बल्कि नयी पीढ़ी के मतदाताओं के बीच अपनी प्रासंगिकता साबित करना भी है. तसलीम उद्दीन के निधन के बाद सीमांचल की राजनीति में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव सांसद असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi) और उनकी पार्टी एआईएमआईएम (AIMIM) का बढ़ता प्रभाव है. इन चुनौतियों के बीच तसलीम उद्दीन के दोनों पुत्र एक साथ आते हैं तो उसे एक परिवार का समझौता नहीं , सीमांचल में एक पुराने राजनीतिक अध्याय की वापसी की शुरुआत मानी जा सकती है.

अशोक कुमार सीमांचल के वरिष्ठ पत्रकार हैं.
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