विधानसभा चुनाव : नेतृत्व की हनक में हाथ से निकल गया डुमरांव

राजकिशोर सिंह
12 अगस्त 2025
Dumraon : हर कोई वाकिफ है कि 2020 के विधानसभा चुनाव (Assembly Elections) में जदयू (JDU) 115 उम्मीदवार उतार सिर्फ 43 सीटों पर ही जीत हासिल कर पाया था. 2015 में महागठबंधन (Grand Alliance) में था तब उसके 101 उम्मीदवार थे. जीत 71 सीटों पर हुई थी. 2020 में एनडीए (NDA) का हिस्सा था. 14 अधिक सीटों पर लड़ने के बाद भी 2015 की तुलना में 28 सीटें कम हो गयीं. ऐसा क्यों हुआ, इसका जमीनी विश्लेषण शायद उसने कभी नहीं किया. किया भी होगा तो उसे सार्वजनिक नहीं किया. प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष प्रचारित यही किया गया कि लोजपा (LJP) की पीठ पर हाथ रख भाजपा (BJP) ने खेल बिगाड़ दिया. पीठ पर भाजपा का हाथ था या नहीं, यह नहीं कहा जा सकता.
सच इतना भर ही नहीं
पर, इतना जरूर हुआ कि लोजपा ने चुन- चुन कर जदयू उम्मीदवारों के खिलाफ अपना उम्मीदवार उतार उसकी सेहत खराब कर दी. लेकिन, जदयू के आंसू बहाने वाले हालात का सच इतना भर ही नहीं है. चुनावी राजनीति की गहन जानकारी रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार महेश कुमार सिन्हा की समझ है कि लोजपा के चलते कुछ सीटों पर जदयू की हार अवश्य हुई, पर कुछ ऐसी भी सीटें थीं जो नीतीश कुमार (Nitish Kumar) की ठसक के चलते हाथ से निकल गयीं. खुद को भाजपा से बड़ा दिखाने के दंभ में जदयू ने 115 सीटें तो अपने हिस्से में रख ली, पर उतनी संख्या में उसके पास दमदार उम्मीदवार नहीं थे. कहीं- कहीं थे भी तो उनकी और स्थानीय समीकरणों की अनदेखी कर अशक्त उम्मीदवार उतार उसने हार गले लगा ली.
चौंकाऊ निर्णय जदयू का
ऐसा दक्षिण और पूर्वी बिहार में अधिक हुआ. इसका एक उदाहरण बक्सर (Buxar) जिले का डुमरांव विधानसभा क्षेत्र भी है. एनडीए में डुमरांव की सीट जदयू के हिस्से में रहती है. दो बार उसकी जीत भी हुई. 2010 में दाउद अली (Dawood Ali) की और 2015 में ददन सिंह यादव उर्फ ददन पहलवान (Dadan singh Yadav Urph Dadan PahalaWan) की. 2020 में ददन सिंह यादव उर्फ ददन पहलवान जदयू से छिटक गये. चौंकाऊ निर्णय के तहत जदयू की उम्मीदवारी अंजुम आरा (Anjum Ara) को मिल गयी. कहते हैं कि एनडीए के दूसरे घटक दलों को यह रास नहीं आया. आंतरिक विरोध जदयू में भी हुआ. लेकिन, नेतृत्व के स्तर पर उस विरोध को सुना नहीं गया. चुनाव का परिणाम आशंका के अनुरूप निकला.

यह रही हार की बड़ी वजह
महागठबंधन में सीट भाकपा-माले (CPI-ML) के हिस्से में गयी. कुशवाहा समाज के अजीत कुमार सिंह (Ajit Kumar Singh) को उम्मीदवार बना उसने बड़ी आसानी से जीत हासिल कर ली. अजीत कुमार सिंह को मिले 71 हजार 320 मतों के मुकाबले जदयू की अंजुम आरा 46 हजार 905 मत ही बटोर पायीं. यानी 24 हजार 415 मतों से पिछड़ गयीं. शाहाबाद के वरिष्ठ पत्रकार नरेन्द्र सिंह का मानना है कि एनडीए समर्थक सामाजिक समूहों, विशेष कर राजपूत मतों में बिखराव तो अंजुम आरा की हार की बड़ी वजह रही ही, बाहरी होने के कारण भी संभावना संवर नहीं पायी.
टूट गया अभिमान
अंजुम आरा गोपालगंज (Gopalganj) की रहने वाली हैं. पटना उच्च न्यायालय (Patna High Court) में वकालत करती हैं. राजनीति में पांव जमाने की काबिलियत कूट- कूट कर भरी हुई है. परन्तु, चुनाव के दृष्टिकोण से 2020 में न डुमरांव उनको जानता था और न वह डुमरांव को जानती थीं. पहले से उन्हें कुछ मालूम था भी या नहीं यह नहीं मालूम, जदयू नेतृत्व ने अप्रत्याशित ढंग से डुमरांव से उनकी उम्मीदवारी घोषित कर दी. निर्णय जिस भी हालत में लिया गया हो, विश्लेषकों के मुताबिक डुमरांव के सामाजिक व राजनीतिक समीकरण के अनुरूप नहीं था. फलतः जदयू नेतृत्व का अभिमान टूट गया, अंजुम आरा का अरमान धरा रह गया.
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