आंख में भर लो पानी : मर गयी है जमीर… समाज और सरकार की!

उद्देश्य किसी व्यक्तित्व को छोटा-बड़ा दिखाना नहीं है. …अंतिम यात्रा और विदाई में समाज और सरकार की भूमिका-संवेदना का आकलन करते हुए यह जानने की कोशिश करेंगे कि समाज किन मापदंडों पर नायक तलाशता है ? किसे और किस आधार पर प्रेरणा पुंज बनाता है? समाज के आदर्श क्या हैं? लोग कितने कृतज्ञ या कृतघ्न हैं?

विभेष त्रिवेदी
28 फरवरी 2026
Patna: दरभंगा राज की अंतिम महारानी कामसुंदरी देवी देश-दुनिया को अलविदा कह महायात्रा पर निकल गयीं. दरभंगा (Darbhanga) में सनातनी परंपराओं के तहत उनका श्राद्धकर्म संपन्न हो गया. पर, एक सवाल अब भी बार-बार मन को झकझोर रहा है. क्या हमने महारानी (Maharani) को वैसी अंतिम विदाई दी है, जिसकी वह हकदार थीं? क्या वर्तमान पीढ़ी को पता है कि महारानी कामसुंदरी देवी (Kaamsundri Devi) कितनी बड़ी शख्सियत थीं? हमें तो यह भी नहीं बताया गया कि बिहार में आजादी से पहले अघोषित औद्योगिक क्रांति लाने में, पीड़ित मानवता की सेवा करने में और शिक्षा का अलख जगाने में दरभंगा महाराज (Darbhanga Maharaj) का ऐतिहासिक योगदान रहा है. देश की आजादी के साथ ही खानदानी राज के पोषक और भ्रष्ट हो चुके राजनेता एवं इतिहासकार सभी राजे-रजवाड़ों को जुल्मी, जालिम और शोषक साबित करने की साजिश में जुट गये. हमें तो साहित्य, सिनेमा और सियासत ने यही बताया कि सभी राजा अत्याचारी थे.
समाज को वारिस समझा
बहुत कम लोगों को पता है कि जब विरासत सौंपने का समय आया, उद्योग, रोजगार और रेल मार्ग का जाल बिछाने वाले दरभंगा राज के महाराजा कामेश्वर सिंह (Maharaja Kameshwar Singh) ने खानदान नहीं, समाज को वारिस समझा. इस कहानी में आगे आप तीन शख्सियतों की अंतिम यात्रा पर गौर करेंगे, तो पता चलेगा कि जमाने से महारानी कामसुंदरी देवी नहीं उठीं, उनसे पहले तो मानवता की नजरों से कृतघ्न जमाना उठ चुका था ! महान शख्सियतें मरती नहीं हैं. राजा हों या फकीर, सिर्फ उनकी नश्वर काया जमाने से उठती है, कीर्ति काया अमर होती है. महारानी तो महल के प्राचीर के अंदर 83 वर्षों तक तिल-तिल कर मरती रहीं. कभी देशभक्ति, त्याग और कर्तव्यपथ से डिगीं नहीं. जीवन को साधना बनाया और दीपक की बाती की तरह अनवरत जलते हुए दरभंगा राज की गौरवशाली विरासत, परंपरा और स्मृतियों को आलोकित करती रहीं.
जिसे विरासत संभालनी थी…
ऐसी शख्सियतें कभी मरती नहीं हैं. दरअसल वह समाज मर चुका है, जिसके हाथों में महाराजा कामेश्वर सिंह (वसीयत के माध्यम से) दरभंगा राज की विपुल संपदाओं का एक तिहाई स्वामित्व सौंप गये. इस ऐतिहासिक तथ्य को झुठलाया नहीं जा सकता है कि महाराजा कामेश्वर सिंह ने अपने जीवित भतीजों को विरासत में फूटी कौड़ी नहीं दी. जिस समाज और सरकार को विरासत संभालनी थी, वह नालायक निकली. लोकतंत्र के नाम पर देश की डालों पर फैले भ्रष्ट, वंशवादी अमर बेल जनता का खून-पसीना चूस रहे हैं. राजनेताओं की निकम्मी औलादों के जयकारे लगाते-लगाते हमारे समाज की जमीर मर गयी है. मरा हुआ समाज, फिरंगी महारानी की मौत पर महीनों सात-सात आंसू बहाने वाला मीडिया और बेटा-बेटी, बहुओं के लिए कुर्सी-कुर्सी खेल रहे राजनेता भला महारानी कामसुंदरी देवी को सम्मानपूर्ण विदाई देने की फुर्सत कैसे निकाल पाते?
जब पैमाना घटिया हो…
ऐसा नहीं है कि जनता, सरकार और मीडिया किसी को विदाई देना नहीं जानते हैं. जब किसी शख्सियत की ऊंचाई मापने का पैमाना घटिया हो, समाज पूर्वाग्रह के दृष्टिदोष से ग्रसित हो, तो खोखले आदर्शों को पूजने लगता है. ब्रिटेन (Britain) की महारानी एलिजाबेथ (Queen Elizabeth) द्वितीय ने 96 वर्ष की आयु में 08 सितंबर 2022 को स्कॉटलैंड के बाल्मोरल कैसल में अंतिम सांस ली. दरभंगा की अंतिम महारानी (महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह की तीसरी पत्नी) कामसुंदरी देवी ने 94 वर्ष की आयु में 12 जनवरी 2026 को दरभंगा के राज परिसर स्थित अपने कल्याणी आवास में अंतिम सांस ली. महारानी के महाप्रयाण से ठीक पहले एक और शख्सियत की चर्चित अंतिम यात्रा का जिक्र जरूरी है. बिहार-झारखंड के प्रसिद्ध उद्यमी और रामकृपाल सिंह कंस्ट्रक्शन (Ramkripal Singh Construction) के चेयरमैन रामकृपाली सिंह (रामदीरी, बेगूसराय के मूल निवासी) ने 87 वर्ष की आयु में 28 दिसंबर 2025 की सुबह पटना के पारस अस्पताल में अंतिम सांस ली.
इतना एहसान फरामोश क्यों?
इस आलेख का उद्देश्य किसी व्यक्तित्व को छोटा-बड़ा दिखाना नहीं है. इन तीनों शख्सियतों की अंतिम यात्रा और विदाई में समाज और सरकार की भूमिका-संवेदना का आकलन करते हुए हम जानने की कोशिश करेंगे कि हमारा समाज किन मापदंडों पर नायक तलाशता है ? हम किसे और किस आधार पर अपना प्रेरणा पुंज बनाते हैं? हमारे आदर्श क्या हैं? हम कितने कृतज्ञ या कृतघ्न हैं? इतिहासकारों, जाति-धर्म व वोट के ठेकेदारों और साहित्यकारों ने महान राजे-रजवाड़ों ( मैं यह नहीं कह रहा कि सारे रजवाड़े महान थे या सारे हुक्मरान भ्रष्ट -नालायक हैं) को कितना बदनाम किया? हमारा समाज इतना एहसान फरामोश क्यों है?
आदर्श तय करने की मूर्खता
फिरंगी महारानी के निधन पर लंबे कसीदे काढ़ने वाले पत्रकारों को महारानी कामसुंदरी देवी पर लिखने की फुर्सत नहीं थी या उनकी जानकारी सतही है? इस पर प्रकाश डालना इसलिए जरूरी है कि अगर हम अपने आदर्श तय करने में मूर्खता, पक्षपात करते रहे तो आने वाली पीढ़ियां वंशवादी शासकों, साम्राज्यवादी अंग्रेजी हुकूमत के ही जयकारे लगाती रहेंगी. महारानी कामसुंदरी देवी का जब निधन हुआ, बिहार-झारखंड की शीर्ष कंस्ट्रक्शन कंपनी के मालिक रामकृपाल सिंह (Ramkripal Singh) उर्फ रामकृपाली सिंह (Ramkripali Singh) के श्राद्धकर्म का महाभोज मीडिया में सुर्खियां बटोर रहा था. हमारा उद्देश्य यह बताना नहीं है कि दरभंगा या रामदीरी के महाभोज में कुल कितने लाख लोगों को भोजन कराया गया, कितने हलवाई-कारीगर लगे, कितने तरह के व्यंजन बने और क्या-क्या दान किया गया? (जारी)

(विभेष त्रिवेदी बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
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