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ताराचंद धानुका : मानते हैं लोग…सीमांचल का गांधी

राजनीति में गहन सक्रियता से ताराचंद धानुका ने सीमांचल में अपना कद इतना ऊंचा बना लिया कि कश्मीर के प्रधानमंत्री बख्शी गुलाम मुहम्मद, अटलबिहारी वाजपेयी, नेपाल के प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोईराला, चंद्रशेखर के साथ ही अन्य अनेक नामचीन हस्तियों के चरण ठाकुरगंज स्थित उनके घर पर पड़े. विनोबा भावे के साथ तो उनके आत्मीय संबंध थे ही.

निधि चौधरी
06 मार्च 2026
Thakurganj : ताराचंद धानुका (Tarachand Dhanuka) बिहार के उतर-पूर्व सीमांचल (Seemanchal) की एक ऐसी शख्सियत हैं जिनके जीवन का हर पन्ना पीढ़ियों के लिए पाठशाला है. तकरीबन 27 वर्षों से कैंसर (Cancer) जैसी प्राणघातक बीमारी को नियंत्रण में रख मौत को मजाक बना रखे 85 वर्षीय इस जुनूनी जननेता को इलाकाई लोग ‘सीमांचल का गांधी’ (Gandhi of Seemanchal) मान तदनुरूप मान- सम्मान देते हैं तो उसका आधार संघर्ष, सेवा और समाज के प्रति संपूर्ण समर्पण है, राष्ट्रीयता की आकंठ भावना है. ताराचंद धानुका का सीमांचल में जहां वास है यानी जो कर्मभूमि है, उसी को भारत के ‘चिकन नेक’ (Chicken Neck) की पहचान मिली हुई है. उस सीमावर्ती क्षेत्र में कभी नक्सलवाद और अलगाववाद ने जडें़ जमा रखी थी. उसे समूल समाप्त करने में इस राष्ट्रभक्त कर्मयोगी की अहम भूमिका रही. सामाजिक कार्यों की उपलब्धियां तो चमकदार हैं ही, इस मामले में उनकी लोकप्रियता का अंदाज इससे भी लगाया जा सकता है कि 1978 से ही वह भारत-नेपाल मैत्री संघ (India-Nepal Friendship Association) की किशनगंज (Kishanganj) शाखा के अध्यक्ष पद पर विराजमान हैं.

ताराचंद धानुका का जन्म महाभारत के पात्र भीम की तरह हुआ था. अर्थात जन्म लेते ही वह भूमि पर गिर पड़े थे. पारिवारिक अभावग्रस्तता में संघर्ष भरा उनके जीवन का शून्य से शिखर तक का सफर बहुत अनोखा है. अविस्मरणीय व अनुकरणीय भी है. बचपन से ही उनमें नेतृत्व की असीम क्षमता थी. जीवन का लक्ष्य निष्काम कर्मयोग था. स्वर्गीय बलदेव दास अग्रवाल के पौत्र एवं रामेश्वर लाल अग्रवाल के पुत्र ताराचंद धानुका का जन्म 1941 में भारत के उस हिस्से में हुआ था जो वर्तमान में बंगलादेश (Bangladesh) में है. 1944 के साम्प्रदायिक दंगों के दरमियान परिस्थितियां ऐसी हो गयीं कि पिता रामेश्वर लाल अग्रवाल को घर-बार सब छोड़ परिवार के संग वहां से निकल जाना पड़ा. हालात से पार पाने के लिए नेपाल (Nepal) के भद्रपुर (Bhadrapur) स्थित ससुराल में रहने आ गये. उस दौरान परिवार की आर्थिक स्थिति काफी खराब हो गयी थी. कुछ साल बाद वतन में वास की चाह ने उन्हें हिन्दुस्तान आने को विवश कर दिया. फिर भद्रपुर से आ सभी पौआखाली में बस गये.

पढ़ाई-लिखाई की बात करें, तो विषम परिस्थितियों में भी ताराचंद धानुका में इसकी ललक ऐसी थी कि स्कूल घर से काफी दूर रहने के बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. रात विद्यालय के वर्ग कक्ष में ही बितानी पड़ती थी. वहीं दो बेंच जोड़कर सो जाया करते थे. दोनों वक्त का भोजन उन्हें समाजसेवी गणपत राय अग्रवाल के यहां बड़े प्रेम से मिल जाया करता था. कुशाग्रता ऐसी थी कि छठी कक्षा में ही उन्होंने दसवीं तक के व्याकरण की किताब लिख दी थी. यह देख उनके शिक्षक दंग रह गये थे. वह पढ़ाई के साथ-साथ काम भी करते थे. वक्त ऐसा कठिन था कि पढ़ाई का खर्च वहन करने के लिए उन्हें फेरी लगा रूमाल तक बेचने को बाध्य होना पड़ा था. उसी दौरान वह रेलवे के खंभांे पर पेंट का काम भी करते थे. इसके लिए उन्हें प्रति खंभा 50 पैसे मिलते थे. एक बार ऐसा हुआ कि किसी व्यक्ति ने चार आने का साबुन का खाली बक्शा उन्हें उधार देने से मना कर दिया. वक्त ऐसा बदला कि सीमांचल के नौनिहालों के लिए करोड़ों की राशि खर्च कर उन्होंने आधुनिक सुविधा संपन्न विद्यालय बनवा दिया है.

पढ़ाई-लिखाई का दौर खत्म हुआ तब ताराचंद धानुका व्यापार (Business) में रम गये. फिर नेतृत्व के जन्मजात गुण ने राजनीति की ओर कदम बढ़वा दिया. व्यापार के साथ राजनीति में भी पांव जम गये. राजनीति की शुरुआत उन्होंने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (Praja Socialist Party) से की थी. उस दौरान समाजवादी नेता एन जी गोरे से भी उनके आत्मीय संबंध रहे. ताराचंद धानुका ने मुखिया से लेकर लोकसभा तक का चुनाव लड़ा. चुनावों में भाग्य और कुर्सी ने उनके साथ जम कर आंख मिचौली खेली. एक बार वह ठाकुरगंज (Thakurganj) से विधायक का चुनाव मात्र 179 मतों से हार गये. तब उन्होंने कभी चुनाव नहीं लड़ने का फैसला कर लिया. लेकिन, अगले ही चुनाव में कार्यकर्ताओं और शुभचिंतकों की मांग पर अपने बेटे गोपाल कुमार अग्रवाल को उम्मीदवार बना दिया. उन्हें शानदार जीत मिल गयी. गोपाल कुमार अग्रवाल वर्तमान में भी ठाकुरगंज के विधायक हैं.

राजनीति में गहन सक्रियता से ताराचंद धानुका ने सीमांचल में अपना कद इतना ऊंचा बना लिया कि कश्मीर के प्रधानमंत्री बख्शी गुलाम मुहम्मद, अटलबिहारी वाजपेयी, नेपाल के प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोईराला, चंद्रशेखर के साथ ही अन्य अनेक नामचीन हस्तियों के चरण ठाकुरगंज स्थित उनके घर पर पड़े. विनोबा भावे के साथ तो उनके आत्मीय संबंध थे ही. अपने जीवन काल में ताराचंद धानुका ने सीमांचल की गंगा जमुनी तहजीब बचाये रखने और आम जन के अधिकारों के लिए कई छोटे-बड़े आंदोलन किये. लाठियां और गोली तक खायी. गरीबों को दी गयी भूदान, लालकार्ड और बिहार सरकार की जमीन पर भू-माफियाओं ने कब्जा कर लिया तो उन्होंने उसके खिलाफ बहुत बड़ा आंदोलन चलाया. हजारों एकड़ जमीन माफिया मुट्ठी से मुक्त करा असली हकदारों को दिलवायी. किसानों को उनकी फसलों का उचित मूल्य दिलाने के लिए भी आंदोलन किया. इन आंदोलनों की वजह से ताराचंद धानुका को कई बार जेल की भी यात्रा करनी पड़ी. वहां भी उन्होंने कैदियों के हित के लिए आंदोलन किया और उनके रहन-सहन में सुधार करवाया.

आंदोलन के दरमियान ताराचंद धानुका एक बार तीन माह तक जेल में रहे तो मन-मिजाज आध्यात्मिक हो गया. अध्यात्म की किताबों में वक्त गुजरने लगा. आचार्य विनोबा भावे, डाॉ राममनोहर लोहिया, पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर एवं अटलबिहारी वाजपेयी तथा नेपाल के गिरिजा प्रसाद कोईराला जैसे दिग्गज नेताओं से उनकी नजदीकियां रहीं. आंदोलन के दौरान जब वह किशनगंज जेल में थे तो अन्य लोगों के अलावा डाॉ राममनोहर लोहिया भी उनसे मिलने गये थे. हजारीबाग के चंदवारा कैंप जेल में लोकनायक जयप्रकाश नारायण (Loknayak Jaiprakash Narayan) से उनकी मुलाकात हुई थी. बाद में वह ठाकुरगंज भी आते रहे. देश में आपातकाल के समय भारत व नेपाल के विभिन्न क्षेत्रों में भूमिगत रह कर्पूरी ठाकुर, नानाजी देशमुख, जार्ज फर्नांडिस आदि नेताओं के साथ निभायी गयी उनकी भूमिका अहम रही. इसी कारण भारत सरकार द्वारा उनके परिवार वालों को घर से निकाल वहां पुलिस तैनात कर दी गयी थी और आपातकाल के खिलाफ आंदोलन में सक्रिय रहने के कारण उन पर राष्ट्र विरोधी धाराएं लगा दी गयी थीं.

व्यापार और राजनीति के साथ-साथ ताराचंद धानुका पत्रकारिता के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे हैं. 1983 में उन्होंने ‘रवि उदय’ (Ravi Uday) हिंदी साप्ताहिक में सम्पादक एवं ‘जनसत्ता’ दैनिक में बतौर संवाददाता काम किया. उसके माध्यम से सीमांचल की समस्याओं को उजागर किया. भारतीय जीवन बीमा निगम में भी उन्होंने बहुत मेहनत की और अच्छा खासा मुकाम हासिल किया. स्थानीय लोग बताते हैं कि ताराचंद धानुका बहुत अच्छे भजन गायक भी थे. एक उम्दा कलाकार भी. इसे उन्होंने क्षेत्रीय भाषा की फिल्म में एक स्कूली शिक्षक के रूप में बखूबी निभाया. इस फिल्म को लोगों ने खूब सराहा. ताराचंद धानुका ने क्षेत्र में कई मंदिरों का निर्माण करवाया. खासकर राम जानकी मंदिर, जो ताराबाड़ी में है. सिर्फ मंदिर ही नहीं, कहते हैं कि कई मजार भी उनके द्वारा बनवाये गये. यही इस सीमांचल की गंगा जमुनी तहजीब (Ganga Jamuni Tehzeeb) है. बिना किसी सरकारी मदद के उन्होंने सीमांचल में सैकड़ांे नलकूप और कुएं का निर्माण करवाया. एक संस्था के साथ मिल सैकड़ों पोलियो ग्रस्त रोगियों का निःशुल्क ऑपरेशन करवाया.

इतना ही नहीं, ताराचंद धानुका ने खुद विवाह भी दिव्यांग स्त्री से किया, जो काफी सुशील और गुनी हैं. उन्होंने ठाकुरगंज उच्च विद्यालय की जर्जर स्थिति में सुधार करवाया. ठाकुरगंज डिग्री कॉलेज की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. कई मदरसों का निर्माण करवाया. कई श्मशान घाटों का निर्माण इनके ही प्रयास से हुआ. इन सबसे अलग सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि सीमांचल में आजादी के बाद कई राजनेताओं ने राज किया, परंतु एक अदद सीबीएसई (CBSE) से मान्यता प्राप्त विद्यालय के लिए सीमांचल का यह हिस्सा तरसता रहा. जीवन भर की पूंजी लगा कर करोड़ों रुपये की लागत से ‘ताराचंद धानुका एकेडमी’ बनवा कर उन्होंने सीमांचल के नौनिहालों को बेहतर भविष्य की राह दे दी है. इन समाज उपयोगी कार्यों के लिए ताराचंद धानुका कई बार सम्मानित हुए हैं. भारत- नेपाल मैत्री संघ के मंच पर नेपाल के प्रधानमंत्री एवं राष्ट्रपति द्वारा सम्मान के साथ ही नेपाल के उपप्रधानमंत्री विजय कुमार गच्छदार द्वारा भी सम्मानित होने का गौरव उन्हें प्राप्त हुआ है.

निष्काम कर्मयोग में विश्वास रखने वाले ताराचंद धानुका का कहना है कि शिक्षित और साक्षर में बहुत अंतर होता है. शिक्षा मनुष्य को परिस्थितियों के साथ समायोजन करना ही नहीं सिखाती अपितु उसमें अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण करने की क्षमता का विकास भी करती है. सिर्फ डिग्री धारण कर लेना मात्र ही शिक्षा नहीं है. ‘जब तुम आये तो जग हंसा तुम रोये, पर जीवन मे ऐसा कर्म करो कि जब तुम जाओ तो तुम हंसो और जग रोये.’ इस बात को जीवन के हर क्षण याद रखते हुए ताराचंद धानुका ने सेवाभाव, त्याग, ईमानदारी का परिचय देते हुए सुरजापुरी शब्द को सीमांचल से ले जाकर राष्ट्रीय पटल पर रखने का महती कार्य किया. विषम परिस्थितियों में भी ईमानदारी से मेहनत कर खुद को फर्श से अर्श पर पहुंचाया. निःसंदेह यह पीढ़ियों के लिए प्रेरणादायक है.

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