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आंख में भर लो पानी : शैक्षणिक विकास … कैसे भुला दें राज-योगदान को ?

ईमानदारी से इतिहास लेखन हो तो नयी पीढ़ी को पता चलेगा कि दरभंगा राज और तिरहुत रेल कंपनी के माध्यम से ही बिहार में अघोषित रूप से औद्योगिक क्रांति का सूत्रपात हुआ था. आज हर चुनाव में सरकार बिहार में चीनी मिल की स्थापना का झूठा भरोसा देती है. बिहार में अधिकांश चीनी मिलें बंद होने, किसानों की बदहाली और झूठे वादों की चर्चा शुरू होती है तो सभी राजनीतिक दल कठघरे में नजर आते हैं.

विभेष त्रिवेदी
06 मार्च 2026
Patna : जब समाज ही दृष्टिदोष से ग्रसित है तो सरकार से कौन पूछेगा कि दरभंगा राज (Darbhanga Raj) की आखिरी महारानी कामसुंदरी देवी (Maharani Kamsundari Devi) को सम्मानपूर्ण अंतिम विदाई क्यों नहीं दी गयी? यह उसी दरभंगा राज की महारानी थीं, जिसने 1962 में चीनी हमले के दौरान देश को युद्ध का खर्च उठाने के लिए 600 किलो सोना, 3 निजी हवाई जहाज दान किया. उसी समय दरभंगा राज का निजी एयरपोर्ट (Airport) भी सेना को सौंप दिया गया. आज मिथिला क्षेत्र के सांसद (MP) उसी दरभंगा एयरपोर्ट से दोबारा उड़ान शुरू कराने की वाहवाही लूटने की कोशिश में हैं. देश की आजादी की लड़ाई से लेकर चीन से लड़ाई तक, दरभंगा राज ने जितना सहयोग किया, उस पर एक किताब लिखी जा सकती है. आज नेता और सरकार देश के किसी इलाके में 40-50 किलोमीटर रेल मार्ग के निर्माण पर अपनी पीठ थपथपाती है, जबकि घोषणा, सर्वे, डीपीआर, आवंटन और निर्माण की प्रक्रिया में कम से कम दो दशक बीत जाते हैं.

दरभंगा राज की तिरहुत रेल कंपनी (Tirhut Railway Company) ने निजी कोष से एक साल के रिकार्ड समय में (1873-74 में ) बरौनी (Baraunee) के बाजितपुर से दरभंगा तक रेल लाइन का निर्माण कराया. गौरतलब है कि उस जमाने में आज की तरह अत्याधुनिक तकनीक, शक्तिशाली क्रेन व मशीनें नहीं थीं. महज एक हजार कारीगरों ने यह कमाल कर दिखाया था. यह बिहार में एक नये युग का आगाज था. जब आप इस रेल मार्ग का उद्देश्य जानेंगे तो सिर श्रद्धा से झुक जायेगा. तत्कालीन महाराजा लक्ष्मणेश्वर सिंह (Maharaja Laxmaneshwar Singh) ने निजी लाभ व सुविधा के लिए नहीं, बल्कि पीड़ित मानवता की सेवा और लाखों लोगों की जान बचाने के लिए रेल लाइन का निर्माण कराया था. बिहार में भयानक सूखा-अकाल आया था. भूख से बिलबिलाते लोग मर रहे थे, परन्तु नदियों के जाल से घिरे उत्तर बिहार में सड़क मार्ग के अभाव में अनाज पहुंचाना असंभव था.

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अनाज और जीवन रक्षक सामान की आपूर्ति के लिए और लोगों को रोजगार देने के लिए महाराजा ने रेलमार्ग का निर्माण कराया था. उसके बाद तिरहुत रेल कंपनी की क्षमता, अनुभव का लाभ उठाते हुए ब्रिटिश हुकूमत (British rule) ने उत्तर बिहार में इसी कंपनी के माध्यम से रेल मार्ग का जाल बिछाया. अगर ईमानदारी से इतिहास लेखन हो तो नयी पीढ़ी को पता चलेगा कि दरभंगा राज और तिरहुत रेल कंपनी के माध्यम से ही बिहार (Bihar) में अघोषित रूप से औद्योगिक क्रांति का सूत्रपात हुआ था. आज हर चुनाव में सरकार बिहार में चीनी मिल की स्थापना का झूठा भरोसा देती है. बिहार में अधिकांश चीनी मिलें बंद होने, किसानों की बदहाली और झूठे वादों की चर्चा शुरू होती है तो सभी राजनीतिक दल कठघरे में नजर आते हैं.

दरभंगा राज ने लोहट और सकरी में चीनी मिल, मुक्तापुर में रामेश्वर जूट मिल, हायाघाट में अशोक पेपर मिल, कोलकाता में वाल्फोर्ड ट्रांसपोर्ट कंपनी और थैकर्स एंड स्प्रंक स्टेशनरी कंपनी की स्थापना कर न सिर्फ हजारों लोगों को रोजगार दिया, बल्कि बाढ़- सुखाड़ वाले आपदाग्रस्त क्षेत्र में तरक्की का पहला अध्याय लिखा. नागरिक उड्डयन (Nagarik Uddayan) के क्षेत्र में देश में पहली यात्री विमान सेवा आरंभ करने का श्रेय दरभंगा राज को ही जाता है. न्यूजपेपर एंड पब्लिकेशन प्राइवेट लिमिटेड की स्थापना कर ‘दी इंडियन नेशन’(Indian Nation) , ‘आर्यावर्त’ (Aryavarta) और मैथिली पत्रिका ‘मिथिला मिहिर’ (Mithila Mihir) का इसने प्रकाशन किया. शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में दरभंगा राज का ऐतिहासिक योगदान रहा. जब जितना सामर्थ्य रहा, समाज और देश को दान-सहायता देने में इस राजपरिवार ने कोताही नहीं बरती.

दरभंगा में ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय, दरभंगा मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल और दरभंगा हवाई अड्डा जैसे संस्थान दरभंगा राज द्वारा दान दी गयी भूमि और महलों में संचालित हो रहे हैं. देश के शैक्षणिक विकास में भी दरभंगा राज का ऐतिहासिक योगदान रहा है. पटना विश्वविद्यालय और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से लेकर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय तक, देश के शीर्ष शिक्षण संस्थानों की स्थापना और विकास में दरभंगा राज ने अपनी तिजोरी खोल दी. (जारी)


(विभेष त्रिवेदी बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

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