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सवा साल बन गया काल : ढह-ढनमना गया नक्सलवाद !

सुरक्षा बलों के लक्ष्य आधारित उग्रवाद निरोधक सघन अभियान में माओवादी संगठन को शुरुआती दौर में ही सबसे बड़ा झटका डेढ़ करोड़ के इनामी नंबाला केशवराव उर्फ बसवराजू के मुठभेड़ में मारे जाने से लगा. उस झटके को ‘नक्सल मुक्त भारत’ का पहला अध्याय माना गया. इधर, 22 फरवरी 2026 को ‘जनयुद्ध’ जारी रखने पर अडिग दुर्दांत नक्सली थिप्परी तिरुपति उर्फ देवजी उर्फ संजीव पल्लव के सुरक्षा बलों के समक्ष हथियार डाल देने को भारत में नक्सलवाद के ‘समापन अध्याय’ के तौर पर देखा और समझा जा रहा है.

महेश कुमार सिन्हा
07 मार्च 2026
New Delhi : वामपंथी उग्रवाद से रक्तरंजित मध्य और पूर्वी भारत के लगभग एक तिहाई हिस्से में ही कभी नक्सलवाद (Naksalavad) का दफन हो जायेगा, कानून का दबदबा फिर से कायम हो जायेगा, बारूदी गंध की जगह सुकून की सांसें मिलने लगेंगी, नक्सलियों (Naxalites)की खूंख्वारियत को दृष्टिगत रख ऐसी कल्पना शायद ही किसी ने की होगी. उग्रवाद प्रभावित आधा दर्जन राज्यों में विकास की नयी इबारतें लिखी जाने लगेंगी, शासन-प्रशासन (administration) के लिए यह अत्यंत कठिन दिखता था. लेकिन, वह सब अब धरातल पर साकार होता दिख रहा है. इस रूप में कि नक्सली हिंसा प्रभावित बड़े हिस्से पर सुरक्षा बलों ने अपना शिकंजा कस लिया है. क्रूरता आधारित ‘लाल आतंक’ का सिक्का बेखौफ चलाने का असीमित सामर्थ्य रखने वाले उग्रवादी संगठन की शक्ति एकबारगी इतनी क्षीण हो जायेगी, यह भी अकल्पनीय था.

सिर उठाने की संभावना नहीं

केन्द्रीय गृह मंत्री (Union Home Minister) अमित शाह (Amit Shah) की घोषणा के अनुरूप देश में 31 मार्च 2026 तक नक्सली हिंसा को समूल समाप्त कर देने को संकल्पित सुरक्षा बलों की अथक अनवरत आक्रामक कार्रवाइयों में संगठन के कई शीर्ष नेताओं के मारे जाने और एकाध को छोड़ शेष के हथियार डाल देने से माओवादियों (Maoists) का गढ़ लगभग ढह गया है. कमर इस कदर टूट गयी है कि उसके उखड़े पांव के फिर से जमने की बात दूर, सिर उठाने की भी कोई संभावना नहीं बच गयी है.नक्सलवाद उन्मूलन अभियान पहले भी चलते थे, पर उसमें सुरक्षा बलों को जवानों की मौत और हथियारों की लूट के रूप में भारी क्षति उठानी पड़ती थी. इधर के दिनों में दांव एकदम से उलट गया है. अगर-मगर रहित आक्रामकता से सुरक्षाबल भारी पड़ गये हैं. मौत-दर-मौत से माओवादियों का मनोबल गिर गया है. सांगठनिक ढांचा बिखर गया है. पुलिस के समक्ष काफी संख्या में हथियार समर्पित कर देने से संगठन के शस्त्रागार खाली पड़ गये हैं. सबसे बड़ी बात यह कि जनाधार भी सिमट-सिकुड़ गया है.

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अंदरूनी कलह भी बड़ा कारक

इस कल्पनातीत विषम हालात के चलते नक्सलवाद भारी दबाव में आ गया है. तुर्रा यह कि ‘जनयुद्ध’ जारी रखने या उससे विरत हो जाने को लेकर उभरा अंदरूनी कलह भी गंभीर समस्या बन गयी है. मुठभेड़ों में तजुर्बेकार लड़ाकों की मौत और आत्मसमर्पण के अटूट क्रम से माओवादी संगठन नेतृत्वविहीन-सा हो गया है. इस जमीनी हकीकत को इस रूप में बड़ी आसानी से समझा जा सकता है कि भाकपा (CPI) (माओवादी) के सर्वोच्च नेतृत्व निकाय-पोलित ब्यूरो में पहले 12 सदस्य होते थे, वर्तमान में 02 हैं. उनमें एक किसी काम के नहीं, सिर्फ नाम के हैं. इसी तरह शीर्ष नेतृत्व निकाय-केन्द्रीय समिति में कभी 45 सदस्य हुआ करते थे, आज की तारीख में मात्र 02 रह गये हैं. वही दो जो पोलित ब्यूरो के भी सदस्य हैं. नक्सलियों की संख्या भी अब 300 के आसपास रह गयी है. 31 मार्च 2026 आते-आते यह संख्या शून्य हो जाये तो वह चौंकने वाली कोई बात नहीं होगी.

नक्सलवाद का ‘समापन अध्याय

लगभग छह दशकों से देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बना नक्सलवाद आखिर सुरक्षा बलों की सवा साल की कार्रवाई में ही कैसे ढह-ढनमना गया, रोमांच भरी इसकी कहानी कुछ यूं है. मध्य और पूर्वी भारत के विशाल आदिवासी अंचल में सुरक्षा बलों के लक्ष्य आधारित उग्रवाद निरोधक सघन अभियान में माओवादी संगठन को शुरुआती दौर में ही सबसे बड़ा झटका डेढ़ करोड़ के इनामी नंबाला केशवराव उर्फ बसवराजू (Nambala Keshavrao alias Basavaraju) के मुठभेड़ में मारे जाने से लगा. उस झटके को ‘नक्सल मुक्त भारत’ (naxal free india) का पहला अध्याय माना गया. इधर, 22 फरवरी 2026 को ‘जनयुद्ध’ जारी रखने पर अडिग दुर्दांत नक्सली थिप्परी तिरुपति उर्फ देवजी उर्फ संजीव पल्लव (Thipperi Tirupati alias Devji alias Sanjeev Pallav) के सुरक्षा बलों के समक्ष हथियार डाल देने को भारत में नक्सलवाद के ‘समापन अध्याय’ के तौर पर देखा और समझा जा रहा है.

एकबारगी सिहर उठा संगठन

संगठन के रणनीतिकार की पहचान रखने वाले थिप्परी तिरुपति देवजी के साथ एक और बड़ा माओवादी चेहरा मल्ला राजी रेड्डी उर्फ संग्राम उर्फ सागर ने भी आत्मसमर्पण कर दिया. वैसे,संगठन की रीढ़ नक्सली कमांडर इन चीफ माडवी हिड़मा उर्फ संतोष (Madvi Hidma alias Santosh) के कुछ माह पूर्व मारे जाने से टूट गयी थी. माओवादियों के लिए दुर्भाग्य यह भी रहा कि माडवी हिड़मा की मौत के सदमे से संगठन उबरा नहीं था कि शीर्ष नक्सली गणेश उईके उर्फ राजेश तिवारी उर्फ चमरू दादा और पतिराम मांझी उर्फ अनल दा की भी वैसी ही गति हो गयी. अलग-अलग तारीख में दोनों को मुठभेड़ में मार गिराया गया. नंबाला केशवराव उर्फ बसवराजू माओवादी संगठन का महासचिव और पोलित ब्यूरो का सदस्य था. माओवादी संगठन में महासचिव सर्वोच्च ओहदा होता है. सुरक्षा बलों ने 21 मई 2025 को छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) के अबूझमाड़ में 27 नक्सलियों के साथ नंबाला केशवराव उर्फ बसवराजू को मार गिराया. महासचिव की इस ढंग से हुई मौत से संगठन सिहर गया. तब से थिप्परी तिरुपति उर्फ देवजी अघोषित रूप से संगठन की कमान संभाल रहा था. (जारी)

(महेश कुमार सिन्हा बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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