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बात अभद्रता की : को बड़ छोट कहत अपराधू!

अविनाश चन्द्र मिश्र
19 सितम्बर 2025

ह लगभग स्थापित हो चुका है कि पथभ्रष्ट हो गयी देश की राजनीति की प्रकृति बदल गयी है. राजनीतिक दलों की प्रतिस्पर्धा में शत्रुता समा गयी है. शिष्टता व नैतिकता लुप्त हो गयी है. आलोचनाओं में अभद्रता का समावेश हो गया है. आम कार्यकर्ताओं की बात छोड़िये, शीर्ष स्तर पर भी जनसरोकारों की जगह, नेताओं का व्यक्तिगत मामला विरोध का मुद्दा बन जाया करता है. ऐसे मामलों को लेकर एक-दूसरे को कितना बेपरद किया जाये, इसी की प्रतिद्वंद्विता चल रही है. कौन किसको कितना जलील कर सकता है, इसकी होड़ मची है. झूठ-फरेब गढ़ना, अनर्गल आरोप लगाना, कीचड़ उछालना और दुष्प्रचार करना व कराना राजनीति का मूल चरित्र बन गया है. भाषा की मर्यादा भूल गये राजनीतिज्ञों के आचरण भी काफी बदल गये हैं. निहायत निम्नस्तरीय हो गये हैं. कर्म और वचन, दोनों से गंभीरता गायब हो गयी है. व्यक्तित्व बौना हो गया है. क्षरण इस रूप में भी आया है कि पहले जो अशोभनीय व अप्रिय नारे मंच के नीचे कार्यकर्ता उछालते थे, अब मंच पर शीर्ष नेतृत्व उछालने लगे हैं. हास्यास्पद स्थिति यह कि तालियां भी बजाने लगे हैं. इससे अधिक निर्लज्जता की बात और क्या हो सकती है!

राजनीति (Politics) में आयी यह विकृति भविष्य की भयावह तस्वीर (picture) पेश करती है. चिंता की सबसे बड़ी बात यह कि तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग, जिसमें पत्रकार (Journalist) भी शामिल माने जाते हैं, खुद की वैचारिकता से संबद्ध विकृति को स्थापित करने के लिए तमाम तरह के किन्तु-परन्तु ढूंढ उसे शब्दों से अलंकृत कर देते हैं. इससे अमर्यादित आचरण का उत्साहवर्धन हो जाता है. ऐसा किसी एक दल का नहीं, सभी दलों का हाल करीब-करीब समान है. कहीं खुली उदंडता है, तो कहीं छद्म लोकलाज का आवरण लिये धृष्टता है. को बड़ छोट कहत अपराधू! हाल का मामला दरभंगा (Darbhanga) में कांग्रेस नेता (Congress Leader) राहुल गांधी (Rahul Gandhi) और राजद नेता (RJD Leader) तेजस्वी प्रसाद यादव (Tejashwi Prasad Yadav) की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ (Voter’s Rights Yatra) से संबद्ध एक मंच से प्रधानमंत्री (Prime Minister) नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) को भद्दी गालियां देने का है. एक तबके का तर्क है कि खुले मंच से जिसने गाली बकी, कांग्रेस से उसका किसी भी रूप में कोई जुड़ाव नहीं है. हो सकता है सच यही हो, पर गाली देने वाला कांग्रेस का कार्यकर्ता था या नहीं, यह कोई मतलब नहीं रखता है.

सवाल यहां यह है कि जब वह नरेन्द्र मोदी को गाली बकने लगा तब मंच पर मौजूद दर्जनाधिक कांग्रेसियों में से किसी ने ऐसा करने से उसे रोका क्यों नहीं? इससे आगे देखिये, देश भर में इसकी आलोचना हुई. सामान्य से लेकर प्रबुद्ध वर्ग तक ने इस निकृष्टता की भर्त्सना की. परन्तु, कांग्रेस और राजद समेत महागठबंधन (Grand Alliance) के तमाम बड़े नेताओं ने मुंह में दही जमाये रखा. किसी के मुंह से निंदा का एक शब्द नहीं निकला. राहुल गांधी एकदम से मौन रह गये. तेजस्वी प्रसाद यादव का मुंह खुला तो उन्होंने नरेन्द्र मोदी द्वारा पूर्व में कहे ‘कांग्रेस की विधवा’, ‘कांग्रेस की जर्सी गाय’, ‘पचास करोड़ की गर्लफ्रेंड’ आदि का उल्लेख कर उन्हें ही ‘खलनायक’ के तौर पर पेश कर दिया. नरेन्द्र मोदी के साथ ऐसा यह कोई पहला घृणित मामला नहीं है. प्रधानमंत्री का पद संभालने से पहले की बात छोड़ दें, भाजपा (BJP) के शीर्ष नेतृत्व ने जो तथ्य संग्रह कर रखा है उसके मुताबिक कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) और राहुल गांधी समेत विपक्ष के छोटे-बड़े तमाम नेताओं ने प्रधानमंत्री के तौर पर नरेन्द्र मोदी के ग्यारह वर्षीय शासनकाल में एक सौ ग्यारह बार उनके खिलाफ अपशब्दों और गालियों का प्रयोग किया, अपमानजनक टिप्पणियां की. इस मामले में मुख्य रूप से वंशवाद की थाली में मिले जनाधार पर कूद-फांद रहे नामदारों ने बुजुर्गियत का ख्याल नहीं रखा. सरकार की नीतियों व कार्यक्रमों को लेकर आलोचना की जगह ‘तुम-तड़ाक’ की भाषा का इस्तेमाल किया.

महत्वपूर्ण बात यह कि दलितों और पिछड़ों के बीच राजनीति की खोई जमीन तलाशने को व्याकुल एक नामदार उन्हें उनका हक दिलाने का हुंकार तो भर रहे हैं, पर देश के शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व के तौर पर जमे अत्यंत पिछड़ा वर्ग के नरेन्द्र मोदी उन्हें फूटी आंखों नहीं सुहा रहे हैं. यह उनकी राजनीति का हिस्सा है. पर, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में शालीनता, शुचिता और मर्यादा की बात दूर, बेधड़क की जा रही अपमानजनक टिप्पणियों में नैतिकता का भी ख्याल नहीं रख रहे हैं. दरभंगा में इसकी हद पार हो गयी. इतिहास बताता है कि नरेन्द्र मोदी पर जब-जब अपशब्दों का हमला हुआ, उसका इस्तेमाल उन्होंने विपक्ष के खिलाफ ही कर भरपूर फायदा उठा लिया. बिहार विधानसभा (Bihar Assembly) के चुनाव में दरभंगा का गाली-प्रकरण वैसा ही कुछ करिश्मा दिखा दे तो वह अचरज की कोई बात नहीं होगी. ऐसा इसलिए भी कि ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’ जैसे नकारात्मक नारे के साथ संपन्न ‘वोटर अधिकार यात्रा’ का आम मतदाताओं पर असर तनिक भी नहीं दिखा. कांग्रेस के तामझाम और बड़े-बड़े नेताओं की मौजूदगी का आकर्षण यात्रा खत्म होते ही विलुप्त हो गया. चुनाव में इसका कुछ प्रभाव दिखता भी तो वैसी संभावना को दरभंगा के गाली प्रकरण ने धो-पोंछ कर रख दिया.