संदर्भ विधानसभा चुनाव : लरिका ठाकुर, बूढ़ दीवान…

अविनाश चन्द्र मिश्र
23 दिसम्बर 2025
बिहार विधानसभा (Bihar Assembly) के 2025 का चुनाव (Election) परिणाम चौंकाऊ जरूर रहा, पर अकल्पनीय व अविश्सनीय नहीं. अप्रत्याशित और अभूतपूर्व तो बिल्कुल ही नहीं. चुनाव में सत्तारूढ़ एनडीए को 202 सीटों पर जबर्दस्त कामयाबी मिली. नीतीश कुमार के बहकते-लड़खड़ाते नेतृत्व में डगमगाती सत्ता को मिली नयी इस्पाती मजबूती के मद्देनजर इसे एनडीए (NDA) की बड़ी चुनावी उपलब्धि मानी जा सकती है. पर, इस बहुमत को अपूर्व कतई नहीं कहा जा सकता है. इसलिए कि नीतीश कुमार के ही नेतृत्व में एनडीए ने 2010 में 206 सीटों पर विजय पताका लहराया था. थोड़े ही अंतर से सही, वह इससे बड़ी जीत थी. लेकिन, दोनों जीत में बुनियादी फर्क है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता. 2010 का जनमत कुशल प्रशासक की प्रशंसनीय छवि वाले बदलाव के नायक नीतीश कुमार के भ्रष्टाचार रहित न्याय के साथ विकास आधारित सुशासन को मिला था. पहाड़ सरीखे उस जनमत में सुशासन (Good Governance) की सम्पुष्टि और आगे बनाये रखने की उत्कट जन आकांक्षा समाहित थी.
बदलाव की अकुलाहट थी
2025 में 2010 के बाद के दस वर्षों की ‘एको अहं द्वितीयो नास्ति…’ के वहम जनित राजनीतिक अस्थिरता के बीच जड़ जमा चुकी प्रशासनिक अकर्मण्यता व अराजकता के बाद भी नीतीश कुमार (Nitish Kumar) को प्रचंड बहुमत मिल गया, तो उसका आधार सुदूर गांवों तक फैली चमचमाती सड़कों का जाल और गलियों- मुहल्लों में इठलाती-इतराती बिजली की जगमगाहट नहीं, सत्ता में बदलाव का भरोसेमंद विकल्प नहीं रहना था. यह स्पष्ट तौर पर दिख रहा था कि प्रशासन तंत्र में शिष्टाचार बन गया भ्रष्टाचार, बदतर विघि-व्यवस्था और बढ़ती बेरोजगारी जैसे मुद्दों को लेकर एक बड़े तबके में बदलाव की अकुलाहट थी. लोककवि घाघ (Ghagh) का एक दोहा है- ‘लरिका ठाकुर, बूढ़ दीवान. ममिला बिगरै सांझ बिहान.’ यह कहें कि इस मामले में वैसा ही कुछ हुआ, तो वह कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी.
दूसरा कोई नहीं
जो कोई बदलाव के अभियान का नेतृत्व कर रहे थे, वे अनुभवहीन थे. उनमें गंभीरता, स्थिरता और परिपक्वता नहीं थी. इस कारण बदलाव की जन अकुलाहट बड़ी बेचैनी-बेकरारी में तब्दील नहीं हो पायी. गौर करने वाली बात यह भी रही कि बदलाव का अभियान चलाने वाले, ‘बदलाव की जरूरत क्यों’ को आमजन में विश्वास जमाने जैसे ढंग से व्याख्यायित नहीं कर पाये. उनकी इस असमर्थता-अक्षमता ने लोगों के मन में अच्छी तरह बैठा दिया कि दिमागी तौर पर संतुलित हों या असंतुलित, वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में नीतीश कुमार का विकल्प नीतीश कुमार ही हैं, दूसरा कोई नहीं. विकास के मामले में बिहार जहां है, उसे विस्तृत करने की बात दूर, वहीं बनाये रखने की काबिलियत बदलाव के लिए थोथी दलील परोसने वालों में नहीं है. विपक्ष, मुख्य रूप से महागठबंधन (Mahagathbandhan) का अक्षम-अशक्त नेतृत्व चुनावी दुर्गति के सदमे से उबरने के लिए ‘वोट चोरी’ के साथ ‘वोट खरीद’ का बेसुरा राग अलाप रहा है. अपनी नाकामियों को ढंकने के लिए नीतीश कुमार की चुनाव पूर्व की योजनाओं, कार्यक्रमों और लोकलुभावन घोषणाओं को ‘चुनावी बाजीगरी’ बता नतीजों को खारिज कर रहा है. लेकिन, इस संदर्भ में उसके पास कोई तार्किक जबाव नहीं है कि महागठबंधन ने भी तो मतदाताओं (Voters) को लुभाने वाले बड़े-बड़े वादे किये, हर परिवार के एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी देने की बात कही. लोगों का भरोसा उन वादों पर क्यों नहीं जमा? उन्हें ‘डपोरशंखी’ से तनिक भी ज्यादा महत्व क्यों नहीं दिया?
यह रहा बड़ा कारण
विपक्ष के वादों पर जनता का विश्वास नहीं जमने के और भी कारण हो सकते हैं, पर महागठबंधन के अंदर का विरोधाभास इसका बड़ा कारण रहा. यह निर्विवाद है कि बिहार की राजनीति में कांग्रेस (Congress) अप्रासंगिक हो चुकी है. इसके बाद भी राजद (RJD) ने उसे जरूरत से ज्यादा महत्व दे दिया. सीटों के बंटवारे, मुख्यमंत्री पद का चेहरा और उपमुख्यमंत्री के चयन में खींचतान ने माहौल बिगाड़ दिया. एक महत्वपूर्ण बात और है, महागठबंधन के मुख्य घटक राजद सामाजिक न्याय के बड़े पैरोकार के रूप में पिछड़ी जातियों में एकजुटता स्थापित करने का सूत्रधार रहा है. लेकिन, अब उन जातियों को एकजुट नहीं रख पा रहा है. सामाजिक न्याय उसके सिद्धांत में तो है ,पर व्यवहार में वैसा नहीं दिखता है. उसकी राजनीति में अन्य सामाजिक समूहों की उपेक्षा और यादवों को प्रमुखता की नीति समा गयी है. इससे गैर यादव पिछड़ी जातियों में स्वीकार्यता कम हो गयी है. राजद में कायम यही ‘यादव वर्चस्व’ ने तेजस्वी प्रसाद यादव की ‘बदलाव की चुनावी मुहिम’ की हवा निकाल उनके अरमानों पर पानी फेर दिया.

