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नीट छात्रा-प्रकरण : तब भी उम्मीद नहीं

 

सीबीआई नीट छात्रा की मौत का रहस्य खोल पाती है या नहीं, यह वक्त बतायेगा. इस मामले में बिहार पुलिस का किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पाना भी कम गंभीर सवाल नहीं है. हालांकि, पुलिस के अनुसंधान में भटकाव का बड़ा कारण परिजनों के बदलते विरोधाभासी बयान रहे. तब भी मामले में दिखी उसकी सुस्त और लीपापोती वाली कार्यशैली से इस धारणा को मजबूती मिली कि शासन-प्रशासन तथ्यों को छिपाना चाहता था. इस कारण पुलिस ने मामले को दूसरा रूप दे दबा देने का पूरा उपक्रम किया.

अविनाश चन्द्र मिश्र
22 फरवरी 2026

टना में कुकुरमुत्ते की तरह उग आये निजी छात्रावासों में से एक बेहद विवादित बालिका छात्रावास (Girls Hostel) में रह नीट की तैयारी कर रही छात्रा की संदेहास्पद परिस्थितियों में मौत का मामला अब भी अनसुलझा है. मामला दुष्कर्म (Rape) के दौरान हत्या का है या आत्महत्या (Suicide) का, रहस्य इसी में उलझा है. बातें तरह-तरह की हुईं, अब भी हो रही हैं. एक मुद्दा उन दो अस्पतालों की संदिग्ध भूमिका का भी है जहां छात्रा को इलाज के लिए ले जाया गया था. आरोप छात्रावास संचालक से ‘उपकृत’ हो चिकित्सीय हेरफेर के उछल रहे हैं. मामला इतना पेंचीदा है कि पटना पुलिस (Patna Police) की बात छोड़िये, बिहार पुलिस का भारी भरकम विशेष जांच दल (SIT) भी किसी ठोस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाया. सच अब केन्द्रीय अनुसंधान ब्यूरो (CBI) सामने लायेगा. वैसे, बिहार के ही ऐसे अनेक जघन्य मामले हैं, जिनके अनुसंधान में सीबीआई के हाथ खाली रह गये. मुजफ्फरपुर (Muzaffarpur) का नवरूणा (Navruna) कांड उसकी विफलता का सबसे बड़ा उदाहरण है.

सवाल कम गंभीर नहीं

नवरूणा किसका ग्रास बन गयी, इसका खुलासा नहीं हो पाया. पेंच-दर-पेंच उलझे या यूं कहें कि पटना पुलिस और परिजनों द्वारा उलझा दिये गये नीट छात्रा-प्रकरण का निष्पक्ष-निविर्वाद उद्भेदन सीबीआई कर पायेगी, विश्वास नहीं जमता. ऐसी आशंका इस वजह से कि नवरूणा कांड में भी उसे ऐसी ही उलझनों से दो-चार होना पड़ा था. बहरहाल, सीबीआई नीट (NEET) छात्रा की मौत का रहस्य खोल पाती है या नहीं, यह वक्त बतायेगा. इस मामले में बिहार पुलिस का किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पाना भी कम गंभीर सवाल नहीं है. हालांकि, पुलिस के अनुसंधान (Police Invistgation) में भटकाव का बड़ा कारण परिजनों के बदलते विरोधाभासी बयान रहे. तब भी मामले में दिखी उसकी सुस्त और लीपापोती वाली कार्यशैली से इस धारणा को मजबूती मिली कि शासन-प्रशासन तथ्यों को छिपाना चाहता था. इस कारण पुलिस ने मामले को दूसरा रूप दे दबा देने का पूरा उपक्रम किया.

असाधारण नैतिकता

इससे सोशल मीडिया में सच या झूठ तैर रहे गुनाहगारों के कतिपय सत्तारूढ़ों से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष संपर्क-संबंध के संदेहों को ठोस आधार मिल गया. देर-सवेर थानाध्यक्ष की कथित पक्षपातपूर्ण भूमिका बेनकाब हो गयी. वरीय पुलिस अधीक्षक (SSP) से लेकर पुलिस महानिदेशक (DGP) तक का रुख भी इसी के इर्द-गिर्द घूमता प्रतीत हुआ. न्याय और जांच के प्रति पुलिस के अधिकारियों की नकारात्मकता (Negativity) को एक तरह से महिलाओं के साथ बर्बर व्यवहार ही माना जायेगा. गंभीर प्रकृति के महिला अपराध (Female Crime) के मामले में प्रशासकीय शिथिलता और शासकीय उदासीनता को असाधारण नैतिकता के दायरे में भी रखा जा सकता है. यहां हैरान करनेवाली बात यह है कि स्त्री-शोषण के मामलों में संवेदनहीनता (Insensitivity) की स्थिति उस राज्य की है, जहां सत्ता शीर्ष महिलाओं को निर्भय और आत्मनिर्भर बनाने का दंभ खूब भरता है, पर उनकी सुरक्षा और सम्मान को लेकर चेतनाशून्य है. इस चेतनाशून्यता की वजह से दुराचारियों-दुष्कर्मियों को न प्रशासन-तंत्र से कोई डर रह गया है और न न्याय-तंत्र से.

सवाल बहुत पुराना है

वर्तमान में दुराचारी और दुष्कर्मी बिल्कुल निडर और निरंकुश हो गये हैं. वे बेहिचक-बेधड़क हाथ साफ कर ले रहे हैं. दुष्परिणामस्वरूप महिलाओं का जीवन असुरक्षित और गरिमाविहीन हो गया है. ऐसा सिर्फ बिहार में ही हो रहा है, ऐसी बात भी नहीं. कमोबेश पूरे देश में महिलाओं को ऐसे हालात से जूझना पड़ रहा है. सवाल बहुत पुराना है, पर है मौजूं. यह कि महिलाओं से दुराचार पर अंकुश आखिर क्यों नहीं लग पा रहा है? ऐसे मामलों पर उफनाया गुस्सा बिना किसी न्याय-निराकरण के शांत क्यों पड़ जाता है? पटना की नीट छात्रा के मामले में ढंग से गुस्सा उफनाया भी नहीं. आक्रोश एक तबके में सिमट कर रह गया. ज्यादा उफनाता भी तो उससे क्या फर्क पड़ जाता?

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गंभीरता दिखानी होगी

याद कीजिये, दिल्ली के निर्भया कांड (Nirbhaya Case) ने पूरे देश की संवेदनाओं को झकझोर दिया था. यौन दुराचार के खिलाफ व्यापक आन्दोलन हुए थे. लंबे समय तक बहस चली थी. कानून में जरूरी बदलाव किये गये. दुष्कर्म-दुराचार का क्रम कहां रुका? कारण अनेक हैं, पर मामलों के अनुसंधान और अभियोजन की अक्षम-अशक्त प्रणाली को बड़ी वजह के रूप में देखा और समझा जा सकता है. राजनीतिक दखलंदाजी (Political Interference) से परे निष्पक्ष जांच, त्वरित सुनवाई और कठोर दंड हालात बदल सकते हैं. बशर्ते दुष्कर्मियों-दुराचारियों के प्रति समाज और सरकार की शून्य सहिष्णुता हो. महत्वपूर्ण बात यह भी कि ऐसे अवांछितों को सामाजिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक आयोजनों में आमंत्रित-सम्मानित किया जायेगा, तो फिर यौन दुराचार पर अंकुश शायद ही कभी लग पायेगा. इस पर सरकार और समाज दोनों को गंभीरता दिखानी होगी.

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