मगध विश्वविद्यालय : यूं ही नहीं मिला सेवा -विस्तार

विश्वविद्यालय का माहौल बदलने मंें शैक्षणिक गुणवत्ता में अपेक्षित सुधार, आधारभूत संरचनाओं का विस्तार और शिक्षकों एवं छात्रों के बीच सद्भावपूर्ण संबंधों का सूत्रपात की कारगर भूमिका रही है. महत्वपूर्ण बात यह भी कि डा. शशि प्रताप शाही ने नियंत्रणाधीन महाविद्यालयों एवं अन्य शैक्षणिक संस्थानों को सिर्फ इकाई नहीं माना, विश्वविद्यालय की शैक्षणिक रीढ़ मान तदनुरूप उनकी परेशानियों का भी निराकरण किया. परिणाम इस रूप में सामने आया कि विश्वविद्यालय के साथ-साथ महाविद्यालयों में भी अशांति की कोई गुंजाइश नहीं रह गयी है.

देवव्रत राय
03 मार्च2026
Bodhgaya : गयाजी (Gayaji) से तकरीबन 15 किलोमीटर दूर पौराणिक व ऐतिहासिक महत्व के ज्ञान की भूमि बोधगया में फल्गू नदी (Falgu River) के किनारे स्थापित मगध विश्वविद्यालय (Magadh University) ने 01 मार्च 2026 यानी रविवार को अपना 64वां स्थापना दिवस समारोह मनाया. खासियत यह कि इस बार के आयोजन का हालात बदलने का उल्लास भरा कुछ अलग ही अंदाज दिखा. शिक्षण-प्रशिक्षण के साथ ज्ञान, संस्कृति और नवाचार के अति प्रतिष्ठित केन्द्र की पहचान वाले इस विश्वविद्यालय की स्थापना 01 मार्च 1962 को पूर्व मुख्यमंत्री सत्येन्द्र नारायण सिंहा (Satyendra Narayan Singha) ने की थी. बुद्ध की ज्ञान भूमि में 460 एकड़ के विस्तृत भूभाग में फैला यह संस्थान 64 वर्षों से अनवरत शैक्षणिक व आध्यात्मिक माहौल प्रदान कर रहा है. शिक्षा के साथ अनुसंधान और नवाचार को नया आयाम दे रहा है. अपनी समृद्ध विरासत को अक्षुण्ण रख आधुनिक शिक्षा प्रणाली से छात्रों का बौद्धिक विकास कर रहा है.
काफी कुछ बदल गये हालात
राष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में महत्वपूर्ण स्थान रखनेवाले इस विश्वविद्यालय के इन चमकदार अध्यायों के बीच प्रशासनिक शिथिलता, शैक्षणिक अव्यवस्था-अराजकता, परीक्षाओं के संचालन एवं परीक्षाफल के प्रकाशन में अनियमितता जैसे परिस्थितिजन्य कुछ काले अध्याय भी जुड़े थे, जो उस कालखंड के नेतृत्वकर्त्ता में आये भटकाव पर आधारित थे. पर, विश्वविद्यालय की गतिविधियों पर सूक्ष्म नजर रखने वालों के मुताबिक अतीत की ये बातें वर्तमान में अप्रासंगिक हो गयी हैं. हालात अब काफी कुछ बदल गये हैं. विश्वविद्यालय के शैक्षिक उन्नयन को संकल्पित ऊर्जावान विद्वान कुलपति (Vice Chancellor) डा. शशि प्रताप शाही (Dr. Shashi Pratap Shahi) के कुशल निर्देशन में विश्वविद्यालय में नया विहान हो गया है.
यह गप नहीं, सच है
शिक्षा, परीक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था सब कुछ न सिर्फ पटरी पर आ गये हैं, बल्कि बीते वर्षोंं में इसकी कार्यदक्षता पर जो गहरे दाग लग गये थे, वे सब भी प्रायः धुल गये हैं. विश्वविद्यालय शिक्षण प्रतिमान की ऊंचाइयां छू रहा है. इसके लिए गर्व की बात है कि दूसरे विश्वविद्यालयों के लिए यह नजीर बन गया है. पूर्व के वर्षों में अक्षम नेतृत्व के चलते जो नकारात्मक छवि बन गयी थी, उसके मद्देनजर विश्वविद्यालय की व्यवस्था में आये करिश्माई अकादमिक बदलाव सरसरी तौर पर गप जैसा लग सकते हैं. परंतु, यह गप नहीं, सच है. जमीनी हकीकत यह है कि विश्वविद्यालय समेत इसके नियंत्रण वाले तमाम संस्थानों में अनुशासन कायम हुआ है. इससे शैक्षणिक सत्र का नियमित संचालन होने लगा है. समय पर परीक्षाएं और उसके परिणाम प्रकाशित होने लगे हैं. परीक्षा परिणामों में पारदर्शिता दिखने लगी है. इन सबसे विश्वविद्यालय पर छात्रों का भरोसा फिर से जम गया है.
सबके बूते की बात नहीं
इस अकल्पित बदलाव में दृढ़ निश्चयी कुलपति डा. शशि प्रताप शाही की दूरदर्शिता भरी कर्मठता की अहम भूमिका तो है ही, राज्यपाल-सह- कुलाधिपति (Governor-cum-Chancellor) आरिफ मोहम्मद खान (Arif Mohammad Khan) के विश्वास भरे मार्गदर्शन का भी बड़ा योगदान है. मुख्यमंत्री (Chief Minister) नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के अखंड उत्साह वर्द्धन का भी. इस संदर्भ में विश्वविद्यालय के हर स्तर के अधिकारियों एवं कर्मचारियों की कर्तव्यनिष्ठा भी उल्लेख करने लायक रही है. राह भटक चुके इतने बड़े शैक्षणिक संस्थान को फिर से व्यवस्था में ला निर्बाध संचालन और उसकी खोई प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित करना सबके बूते की बात नहीं है. विवादरहित छवि, गहरी अकादमिक समझ और प्रशासनिक दक्षता- निष्पक्षता जैसे गुणों से परिपूर्ण कई राष्ट्रीय एवं अन्त्तर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित डा. शशि प्रताप शाही ने विश्वविद्यालय को फिर से संस्कारित कर शैक्षणिक मामलों में उसकी पौराणिक गरिमा बहाल कर दी है. उनकी यही विशिष्टता कुलपति पद पर सेवा विस्तार का आधार बनी है. डा. शशि प्रताप शाही कुलपति का दूसरा कार्यकाल संभाल रहे हैं.
यही सब बनाता है कुछ भिन्न
बिहार के सम्मानित शिक्षाविद् की बड़ी पहचान रखने वाले डा. शशि प्रताप शाही ने 14 फरवरी 2023 को मगध विश्वविद्यालय के कुलपति का पद संभालते ही व्यापक बदलाव की सोच व संकल्प लिये कदम बढ़ाया और तीन वर्ष का कार्यकाल पूरा होते-होते विश्वविद्यालय की कार्यशैली बदल डाली. एक तरह से कहें, तो विश्वविद्यालय का कायाकल्प कर दिया. विश्वविद्यालय सिर्फ डिग्री बांटने का केन्द्र नहीं होता है. यह ज्ञान के साथ-साथ अनुशाशन और नैतिकता का भी पाठ पढ़ाता है. मगध विश्वविद्यालय इस मान्यता पर खरा उतरता दिख रहा है. यही सब है, जो डा. शशि प्रताप शाही को दूसरे कुलपतियों से कुछ भिन्न बनाता है.
हो गया तनावमुक्त
अतीत में झांकें, तो पठन-पाठन, परीक्षा एवं परीक्षाफल के प्रकाशन में अनियमितता, प्रशासनिक अव्यवस्था और अराजकता के खिलाफ छात्रों की अक्सर लहरातीं मुट्ठियों से विश्वविद्यालय अशांत रहता था. शिक्षकों एवं शिक्षकेत्तर कर्मियों में व्याप्त असंतोष भी अशांति का कारण रहा करता था. एक तरह से इसे ‘अशांत विश्वविद्यालय’ की पहचान मिली हुई थी. कुलपति डा. शशि प्रताप शाही के कार्यकाल में हालात में ऐसा चमत्कारिक बदलाव आया कि सब कुछ प्रायः सामान्य हो गया. विश्वविद्यालय प्रशाासन और छात्रों एवं शिक्षकेत्तरकर्मियों के बीच संवाद की ऐसी भरोसेमंद व्यवस्था हुई कि ऐसे मामलों में विश्वविद्यालय लगभग तनावमुक्त हो गया है. नियंत्रणाधीन महाविद्यालयों में भी इस तरह की कोई खास समस्या नहीं रह गयी है.
अशांति की गुंजाइश नहीं
विश्वविद्यालय का माहौल बदलने मंें शैक्षणिक गुणवत्ता में अपेक्षित सुधार, आधारभूत संरचनाओं का विस्तार और शिक्षकों एवं छात्रों के बीच सद्भावपूर्ण संबंधों का सूत्रपात की कारगर भूमिका रही है. महत्वपूर्ण बात यह भी कि डा. शशि प्रताप शाही ने नियंत्रणाधीन महाविद्यालयों एवं अन्य शैक्षणिक संस्थानों को सिर्फ इकाई नहीं माना, विश्वविद्यालय की शैक्षणिक रीढ़ मान तदनुरूप उनकी परेशानियों का भी निराकरण किया. परिणाम इस रूप में सामने आया कि विश्वविद्यालय के साथ-साथ महाविद्यालयों में भी अशांति की कोई गुंजाइश नहीं रह गयी है. इसके बाद भी कभी-कभार आक्रोश फूटता है, तो सामान्य समझ में उसके पीछे कोई बड़ा मुद्दा नहीं, नेतृत्व निखारने की ललक होती है.
उपलब्धियां अनेक हैं
कुलपति डा. शशि प्रताप शाही के अब तक के कार्यकाल की उपलब्धियां अनेक हैं. कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियों की चर्चा यहां की जा रही है. चार वर्ष पीछे चल रहे शैक्षणिक सत्र नियमित हो गये हैं. इस दौरान155 परीक्षाएं आयोजित की गयीं. एक दशक के बाद मगध विश्वविद्यालय का 22वां दीक्षांत समारोह (Deekshant samaroh) आयोजित हुआ. पांच लाख से अधिक डिग्रियां अपलोड की गयीं. आईआईटी, पटना (IIT, Patna) की सहायता से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) केन्द्र की स्थापना की गयी, जो बिहार के विश्वविद्यालयों में पहला है. तीन वर्षों के दौरान छह पेटेंट तथा दस से अधिक शोध प्रोजेक्ट शिक्षकों द्वारा हासिल की गयी. पेंशन से जुड़े न्यायालय में लंबित 189 मामलों के 16 करोड़ 50 लाख रुपये का निस्तारण किया गया. 164 करोड़ रुपये से अधिक का पेंशन भुगतान हुआ.
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