तड़प आरसीपी की : जदयू के सिवा… नहीं कोई दूसरा विकल्प !

‘जनसुराजी’ पूर्व केन्द्रीय मंत्री आरसीपी सिंह की जदयू से पुनर्जुड़ाव की तड़प पर आधारित आलेख की यह दूसरी कड़ी है. इसमें जदयू नेतृत्व उनकी तड़प पर तरस क्यों नहीं खा रहा है, इसका विश्लेषण है.
- हाहाकारी हार से हो गये हताश
- अस्थावां ने भी कर दिया निराश
- ‘कसैला’ अनुभव है भाजपा से जुड़ाव का
- स्वीकार्यता दूसरे किसी दल में शायद नहीं
राजकिशोर सिंह
21 जून 2026
Patna : विधानसभा (Assembly) के 2025 के चुनाव के दौरान आरसीपी सिंह (RCP Singh) का जलन जनित लक्ष्य नीतीश कुमार (Nitish Kumar) को बिहार की सत्ता से बेदखल करना था. बदलाव के ऐसे ही लक्ष्य के लिए अभियान चला रहे प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) की जन सुराज पार्टी (Jan Suraj Party) में अपनी पार्टी ‘आप सबकी आवाज’ (Aap Sabki Awaz) का मई 2025 में विलय कर वह उसका रणनीतिकार बन गये. तब भी उनकी राजनीति में स्थिरता नहीं आयी. पूर्व जैसा ‘शाही ठांव’ नहीं मिला, पांव नहीं जम पाया. विधानसभा चुनाव में जन सुराज पार्टी की बड़ी जीत से पूर्व जैसा रुतबा लौट आने की उम्मीद थी. लेकिन, दुर्भाग्य वहां भी साये की तरह सटा रहा. चुनाव में जन सुराज पार्टी की हाहाकारी हार से वह पूरी तरह हताश हो गये, टूट गये. निराशा इससे अधिक हुई कि उनकी अधिवक्ता बेटी लता सिंह (Lata Singh) भी चुनाव हार गयीं.
लग गयी थाह औकात की
लता सिंह नालंदा जिले के अस्थावां (Asthawan) विधानसभा क्षेत्र से जन सुराज पार्टी की उम्मीदवार थीं. कुर्मी मतदाताओं की बड़ी आबादी वाला अस्थावां आरसीपी सिंह का गृह विधानसभा क्षेत्र है. इसी क्षेत्र के मुस्तफापुर गांव में उनका पैतृक घर है. गांव-घर से गहरा जुड़ाव भी है. गृह विधानसभा क्षेत्र में स्वजातीय कुर्मी मतदाताओं पर उनकी पकड़ का अंदाज इससे लगाया जा सकता है कि संपूर्ण ताकत झोंक देने के बाद भी लता सिंह 15 हजार 962 मतों में ही सिमट गयीं. इसके मद्देनजर यह कहा जाये कि एक समय में नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत संभालने का ख्वाब देखनेवाले आरसीपी सिंह को अपनी औकात की थाह इस रूप में लग गयी, तो वह किसी भी रूप में गलत नहीं होगा. अस्थावां में जीत 90 हजार 542 मत हासिल करनेवाले जदयू के जितेन्द्र कुमार (Jitendra Kumar) की हुई. उनके मुकाबले भूमिहार समाज के रविरंजन कुमार (Raviranjan Kumar) राजद (RJD) के उम्मीदवार थे. 49 हजार 834 मतों पर अटक गये.
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खटिया खड़ी कर दी स्वजातीयों ने
अस्थावां में भूमिहार मतों की भी अच्छी संख्या है. पूर्व में इस समाज के विधायक निर्वाचित होते रहे हैं. राजद नेतृत्व के यादव या कुर्मी समाज की जगह भूमिहार समाज के उम्मीदवार पर भरोसा जताने का संभवतः यही मुख्य आधार था. 2020 में राजद ने अनिल महाराज के नाम से ज्यादा चर्चित अनिल कुमार को अपना उम्मीदवार बनाया था. वह कुर्मी जाति से आते हैं. उन्हें 39 हजार 925 मत मिले थे. दावेदारी उनकी 2025 के चुनाव में भी थी. सिरे से खारिज कर दी गयी. राजद की उम्मीदवारी पाये कतरीसराय प्रखंड मुखिया संघ के अध्यक्ष रविरंजन कुमार उर्फ छोटू मुखिया उर्फ बुलेट बॉस ने पांच बार से चुनाव जीत रहे जदयू प्रत्याशी जितेन्द्र कुमार का खूंटा उखाड़ देने की बयार तो जर्बदस्त ढंग से बांधी, पर मुख्य रूप से स्वजातीय मतदाताओं ने ही उनकी खटिया खड़ी कर दी.
अस्तित्व का सवाल
विधानसभा चुनाव में बेटी लता सिंह की शर्मनाक हार और प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी के शून्य में समा जाने से आरसीपी सिंह के समक्ष राजनीति में अस्तित्व बनाये रखने का बड़ा सवाल खड़ा हो गया है. लेकिन, यहां इसका भी उल्लेख समीचीन होगा कि जो आरसीपी सिंह कभी पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की ‘महत्वपूर्ण पदस्थापना’ कराने की हैसियत रखते थे, जदयू (JDU) से नाता टूटने के बाद हालात ऐसे हो गये कि उनकी ही आईपीएस बेटी और आईएएस दामाद ‘अच्छी पदस्थापना’ के लिए ‘प्रतीक्षारत’ हैं. ऐसा माना जा रहा है कि लता सिंह की हार से कहीं अधिक उन्हें यही कचोट रहा है.
इसलिए जदयू की ओर
विश्लेषकों का मानना है कि आरसीपी सिंह की यही ‘लाचारगी’ उन्हें नीतीश कुमार से 25 वर्षीय रिश्तों की दुहाई दे फिर से जदयू की ओर कदम बढ़ाने के लिए बाध्य कर रही है. जदयू की ही ओर इसलिए कि जिस सामाजिक और राजनीतिक परिवेश में उन्होंने अपनी पहचान बनायी है, उसकी स्वीकार्यता दूसरे किसी सियासी दल में शायद ही मिल पायेगी. छोटे काल के ‘वनवास’ में इतना ज्ञान तो उन्हें हो ही गया होगा. भाजपा (BJP) से जुड़ाव का अनुभव ‘कसैला’ रहा है, राजद ने तो उन पर ‘आरसीपी टैक्स’ का कलंक ही टांक रखा है. कांग्रेस (Congress) से जुड़ने का कोई राजनीतिक अर्थ नहीं है. ऐसे में एकमात्र विकल्प जदयू ही तो बचता है! वही जदयू जिसे वह ‘डूबता जहाज’ बता रहे थे.

राजकिशोर सिंह बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं.
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