तड़प आरसीपी की … ‘डूबता जहाज’ : उड़ाते थे खूब मजाक, नहीं डाल रहा जदयू घास !

राजकिशोर सिंह
16 जून 2026
Patna : राजनीति (Politics) में संभावना कभी खत्म नहीं होती. ऊपर से समाप्त भले दिखती हो, पर अंदर ही अंदर अंकुरित होती रहती है. अभी के दौर में यह कहें कि बिहार में ऐसा ही कुछ पूर्व केन्द्रीय मंत्री रामचन्द्र प्रसाद सिंह (Ramchandra Prasad Singh) कीे जदयू (JDU)) में वापसी के मामले में हो रहा है, तो वह तनिक भी अतार्किक नहीं होगा. राजनीति में रूचि रखनेवाले प्रायः हर शख्स को मालूम है कि आरसीपी सिंह के नाम से ज्यादा चर्चित भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी रामचन्द्र प्रसाद सिंह का पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) से लंबा व गहरा लगाव-जुड़ाव रहा है. भारतीय प्रशासनिक सेवा में रहने के समय से ही वह नीतीश कुमार के सर्वाधिक विश्वसनीय रहे. सियासत में सम्मान उनके ही सान्निध्य में मिला.
नंबर दो की हैसियत
नीतीश कुमार के केन्द्र में रेल मंत्री (Railway Minister) रहने के दौरान आरसीपी सिंह उनके विशेष सचिव थे, तो उनके बिहार का मुख्यमंत्री बन जाने के बाद प्रधान सचिव की भूमिका में आ गये. 2010 में भारतीय प्रशासनिक सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृति के बाद राजनीति से जुड़े तो उसी अखंड विश्वसनीयता के आधार पर लगातार दो कार्यकाल (2010 और 2016) यानी बारह साल राज्यसभा (Rajya Sabha) का सदस्य रहे. 27 दिसम्बर 2020 को नीतीश कुमार की जगह जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उसके कुछ ही समय बाद केन्द्र में मंत्री बनने का सौभाग्य उसी कालखंड में प्राप्त हुआ. सत्ता और संगठन में नीतीश कुमार के बाद वाली नंबर दो की हैसियत भी रही.
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‘काबिलियत’ का अहंकार
विश्लेषकों की समझ में राजनीतिक जीवन की इन उपलब्धियों को आरसीपी सिंह के ‘नीतीश कुमार की कृपा’ मानने तक सबकुछ ठीकठाक रहा. रुतबा- रुआब सब बना रहा. केन्द्र में मंत्री बनने के साथ खुद की ‘काबिलियत’ का भ्रम भरा अहंकार छा गया, राजनीति उनकी पतनोन्मुख हो गयी. हैसियत धूल-धूसरित हो गयी. कथित रूप से नीतीश कुमार की सहमति के बिना केन्द्र में मंत्री बन जाने पर जदयू में उठे बवंडर से स्थिति उनकी इतनी असहज हो गयी कि नीतीश कुमार और जदयू से दूर हो गये. यह भी कह सकते हैं कि दूर कर दिये गये. बवंडर इस रूप में उठा कि जदयू के कोटे से केन्द्र में मंत्री तब पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह (Rajiv Ranjan Singh, alias Lalan Singh) को भी बनना था. जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाते आरसीपी सिंह अकेले मंत्री बन गये.
एक मुद्दा वह भी रहा
उस प्रकरण के बाद जदयू के एनडीए (NDA) से अलग हो महागठबंधन (Grand Alliance) का हिस्सा बन जाने का वह भी एक मुद्दा रहा. इस रूप में कि नीतीश कुमार एनडीए में केन्द्रीय मंत्री के दो पदों के लिए दबाव बना रहे थे. आरसीपी सिंह एक पर ही मान गये. उन्हें इस ‘दुस्साहस’ की सजा मिली. 2022 में राज्यसभा की सदस्यता का तिहराव नहीं हुआ. परिणाम इस रूप में भी सामने आया कि कुछ समय बाद केन्द्रीय मंत्री का पद खुद-ब-खुद हाथ से फिसल गया. अगस्त 2022 में भ्रष्टाचार का आरोप मढ़ उन्हें जदयू से भी निकाल दिया गया. वैसे, 06 अगस्त 2022 को जदयू को ‘डूबता जहाज’ बता उन्होंने खुद पार्टी छोड़ दी. पार्टी में तकरार के दौरान उनकी भाजपा (BJP) से नजदीकियां बढ़ीं और 2023 में उससे विधिवत जुड़ाव हो गया.
वह राज उन्होंने ही खोला
भाजपा नेतृत्व ने तब की अपनी राजनीति की जरूरत से कहीं अधिक अहमियत दे उस कालखंड में महागठबंधन की ‘सरदारी’ कर रहे नीतीश कुमार के खिलाफ भर दम उनका इस्तेमाल किया. आरसीपी सिंह ‘सुशासन’ में तिलमिलाहट पैदा करने वाले एक से बढ़कर एक बयान झाड़ने लगे, बड़े-बड़े खुलासे भी करने लगे. नीतीश कुमार की भूंजा पार्टी का राज उन्होंने उसी काल में खोला था. इसे उनका दुर्भाग्य ही माना जायेगा कि ‘राजफाश’ का सिलसिला बना ही हुआ था कि जनवरी 2024 में जदयू की एनडीए में वापसी हो गयी. राज्य की सत्ता और सियासत का समीकरण एकबारगी बदल गया. भाजपा की राजनीतिक प्राथमिकताएं और प्रतिबद्धताएं उलट गयीं.
हाशिये पर डाल दिया गया
फलस्वरूप नीतीश कुमार की भृकुटि तने नहीं, भाजपा में आरसीपी सिंह को भाव मिलना बंद हो गया. भाजपाई लोग उनका नाम लेने तक से परहेज करने लग गये. थोड़ा और स्पष्ट करें, तो भाजपा की राजनीति में उन्हें हाशिये पर डाल दिया गया. इससे क्षुब्ध आरसीपी सिंह ने भाजपा से रिश्ता खत्म कर 2024 में ही ‘आप सब की आवाज’ नाम से अपनी खुद की पार्टी बना ली. लेकिन, दुर्भाग्य रहा कि लाख हाथ-पांव मारने के बाद भी उनकी पार्टी किसी की ‘आवाज’ नहीं बन पायी. आमलोगों की बात छोड़िये, स्वजातीय कुर्मी समाज में भी कोई ‘आकर्षण’ पैदा नहीं कर पायी.

राजकिशोर सिंह बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं.
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