अमूल्य धरोहरों की चोरी : किसने साफ कर लिया हाथ? अब भी रहस्य ही है

कुलपति के नाते आचार्य किशोर कुणाल ने पांडुलिपियों की बरामदगी की बाबत जो गंभीरता दिखायी, वैसी बाद के किसी भी कुलपति ने नहीं दिखायी. आचार्य किशोर कुणाल के बाद एक-एक कर 20 कुलपति आये. उनमें एक डॉ शशिनाथ झा भी थे, जिन्होंने चोरी की पहली सूचना विश्वविद्यालय को दी थी. वर्तमान में प्रो. लक्ष्मी नारायण पांडेय कुलपति हैं. इस मामले में उनकी गंभीरता कितनी है, यह नहीं कहा जा सकता.
- व्यवस्थागत शिथिलता का मामला तो है ही
- 23 वर्षों में भी रहस्य नहीं सुलझा पायी पुलिस
- सरकार ने भी कभी कोई गंभीरता नहीं दिखायी
- सीआईडी जांच की खानापूर्ति भर हुई
विजय शंकर पांडेय
24 जून 2026
Darbhanga: सामान्य समझ में कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय, दरभंगा (Kameshwar Singh Darbhanga Sanskrit University, Darbhanga) मानस की चर्चित चौपाई ‘हरि अनंत हरि कथा अनंता…’ को चरितार्थ करता प्रतीत होता है. मूल अर्थ में नहीं, अव्यवस्था, अराजकता और अनियमितताओं के संदर्भ में. घपले-घोटालों के आरोपों तले दबे इस विश्वविद्यालय की कथाओं की शृंखला बहुत लम्बी है. उनमें एक शर्मनाक कथा ऐतिहासिक ग्रंथों (Historical texts) और अमूल्य पांडुलिपियों (Invaluable Manuscripts) की चोरी से भी जुड़ी है. संस्कृत, संस्कृति और संस्कार तथा शास्त्रीय शिक्षा के संरक्षण-संवर्धन का दंभ भरने वाला संस्कृत विश्वविद्यालय वैसे तो इस कुकृत्य का सीधा गुनहगार नहीं है, पर 23 वर्षों से निष्पादन के लिए थाने में लंबित इस मामले में व्यवस्थागत शिथिलता के आरोप से मुक्त भी नहीं है.
पुलिस की सुस्त कार्रवाई
ऐसा इसलिए कि पांडुलिपियों एवं ग्रंथों (Manuscripts and texts) की पूर्व में हुई चोरी की घटनाओं के मद्देनजर विश्वविद्यालय प्रशासन (University Administration) ने बहुमूल्य पांडुलिपियों की सुरक्षा का कोई ठोस इंतजाम नहीं किया था. जबकि तमाम संबद्ध लोगों को मालूम था कि धरोहरों के तस्करों (Smugglers) ने विश्वविद्यालय, संग्रहालय एवं पुस्तकालय पर शातिर नजरें जमा रखी हैं. बहरहाल, विश्वविद्यालय ने तो लापरवाही दिखायी ही, मामले के उद्भेदन में दिखी दरभंगा पुलिस (Darbhanga Police) की सुस्त कार्रवाई ने उसके औचित्य पर ही गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है. इस रूप में कि 23 वर्षों के लंबे कालखंड में भी पुलिस मुकम्मल रूप में इसका खुलासा नहीं कर पायी है कि राष्ट्रीय महत्व के 26 अमूल्य धरोहरों पर हाथ किसने साफ कर दिया? क्या है पांडुलिपियों और ग्रंथों की चोरी से जुड़ी कथा, यहां सिलसिलेवार रखा जा रहा है.
चोरी पहले भी होती रही
दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के केन्द्रीय पुस्तकालय (Central Library) से 26 बेशकीमती दुर्लभ पांडुलिपियों और ऐतिहासिक ग्रंथों की चोरी की वह कोई पहली घटना नहीं थी. 1981 से ही ऐसा छिटपुट वाकया हो रहा था. 28 नवम्बर 2003 को विश्वविद्यालय के केन्द्रीय पुस्तकालय में हुई इस चोरी से पूर्व 28 मार्च 2003 को दरभंगा के केबराघाट स्थित मिथिला शोध संस्थान से भी दुर्लभ पांडुलिपियों की चोरी हो गयी थी. पुलिस-अनुसंधान (Police Investigation) का फलाफल क्या निकला, आम लोगों को नहीं मालूम हुआ. दरभंगा पुलिस की इसी निष्क्रियता को दृष्टिगत रख संस्कृत विश्वविद्यालय (Sanskrit University) के तत्कालीन कुलपति आचार्य किशोर कुणाल (Acharya Kishore Kunal) ने केन्द्रीय पुस्तकालय से पांडुलिपियों व ग्रंथों की चोरी के मामले की जांच केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) से कराने की सिफारिश की थी. लेकिन, सरकार के स्तर पर उस सिफारिश को गंभीरता से नहीं लिया गया.
फलाफल शून्य निकला
कहते हैं कि आचार्य किशोर कुणाल ने सिफारिश तो कर दी, पर उसके लिए ज्यादा दबाव नहीं बनाया. सिफारिश भी संभवतः विधिवत नहीं हुई थी. वजह राम जानें. पुलिस और अपराध अनुसंधान विभाग (CID) ने मामले की जांच की. पर, राष्ट्रीय धरोहरों में सेंध लगानेवाले शातिरों के गिरेबां तक उनके हाथ नहीं पहुंच पाये. कहा जाता है कि कानून के हाथ लंबे होते हैं. लेकिन, इस मामले में वह झूठा साबित होता दिख रहा है. जांच का फलाफल शून्य निकला है, 23 साल से मामला अनसुलझा है. हालांकि, इस बीच पुलिस-अनुसंधान और कार्रवाई की खानापूर्ति जरूर हुई. चोरी गयी एक-दो पाण्डुलिपियां भी बरामद हुईं. कुछ गिरफ्तारियां भी हुईं. बाकी सब सिफर!
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फिर किसी ने गंभीरता नहीं दिखायी
पुलिस की इस विफलता को इस रूप में भी गंभीर माना जा सकता है कि मामले की प्राथमिकी दरभंगा के विश्वविद्यालय थाना में कुलपति का पद संभाल रहे भारतीय पुलिस सेवा के कड़क मिजाज पूर्व अधिकारी आचार्य किशोर कुणाल के निर्देश पर कुलसचिव ने दर्ज करायी थी. आचार्य किशोर कुणाल ने चोरों का सुराग देनेवाले को 01 लाख रुपये का नगद इनाम और सरकारी नौकरी (Govt. Job) देने की भी घोषणा की थी. वह भी निष्प्रभावी रही. जो हो, कुलपति के नाते आचार्य किशोर कुणाल ने पांडुलिपियों की बरामदगी की बाबत जो गंभीरता दिखायी, वैसी बाद के किसी भी कुलपति ने नहीं दिखायी. आचार्य किशोर कुणाल के बाद एक-एक कर 20 कुलपति आये. उनमें एक डा. शशिनाथ झा भी थे, जिन्होंने चोरी की पहली सूचना विश्वविद्यालय को दी थी. वर्तमान में प्रो. लक्ष्मी नारायण पांडेय कुलपति हैं. इस मामले में उनकी गंभीरता कितनी है, यह नहीं कहा जा सकता.
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(विजय शंकर पांडेय वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

