अमूल्य धरोहरों की चोरी (2) : हाथ साफ कर लिया… विद्यापति की पांडुलिपियों पर भी!

पांडुलिपियां और ग्रंथ आठ ताले वाले स्ट्रांग रूम में रहते हैं. वजह जो रही हो, चोरी गयी पांडुलिपियां उस रात पुस्तकालय कक्ष में थीं. इसी आधार पर पुलिस और कुलपति आचार्य किशोर कुणाल को संदेह हुआ कि बाहर के चोरों ने नहीं, विश्वविद्यालय के किसी कर्मचारी ने ही पांडुलिपियां गायब कर दी. मामले को चोरी का रूप देने के लिए अलमारी को फर्श पर गिरा कुछ पांडुलिपियों को इधर-उधर फैला दिया.
- ब्राह्मणों की वंशावली ‘पंजीशास्त्र’ की भी चोरी
- जोगियारा में मिला था तिरहुत में लिखा ‘भगवत पुराण’
- ऐसे सामने आया पांडुलिपियों की चोरी का मामला.
- खोजी कुत्ता विश्वविद्यालय कर्मी के घर पहुंच गया.
विजय शंकर पांडेय
26 जून 2026
Darbhanga: दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के केन्द्रीय पुस्तकालय, जहां साढ़े पांच हजार पांडुलिपियां (Pandulipiyan) रहने की बात कही जाती है, से जिन 26 पांडुलिपियों की चोरी हुई उनमें महाकवि विद्यापति (Mahakavi Vidyapati) के हस्तलिखित तकरीबन 15 पांडुलिपियां भी थीं. 1428 में तिरहुता में लिखित विद्यापति का ‘भगवत पुराण’ (तीन खंड) उनमें प्रमुख था. इसके अलावा दरभंगा के प्रथम राजा महामहोपाध्याय महेश ठाकुर रचित ‘उत्कल महात्म्य’, राज परिवार के आचार्य हेमांग ठाकुर रचित ‘ग्रहणमाला’, कवि जयदेव लिखित ‘गीत गोविन्द’ की मूल प्रति, ‘हरिवंश पुराण’ एवं अन्य कई दार्शनिक ग्रंथ थे. 12वीं शताब्दी में तालपत्र पर लिखा ‘तत्व चिंतामणि’ और 10वीं से 16वीं शताब्दी के बीच के ब्राह्मणों की वंशावली ‘पंजीशास्त्र’ की भी चोरी हो गयी. तालपत्र पर सूई की नोंक से लिखी ‘पुरुषोत्तम महात्म्य’ और ‘सचित्र वाल्मीकि रामायण’ भी चोरी गयीं पांडुलिपियों में शामिल थीं.
वृक्ष की खाल पर लिखी थीं पांडुलिपियां
जानकारों के मुताबिक संस्कृत विश्वविद्यालय (Sanskrit University) के केन्द्रीय पुस्तकालय (Central Library) में अनेक दुर्लभ ग्रंथों की वैसी पांडुलिपियां भी हैं जो तिरहुता (Tirhuta), कैथी (Kaithi), बंगला (Bangla) आदि लिपियों में रचित हैं. लगभग 12 हजार पांडुलिपियां संग्रहित कर रखे मिथिला शोध संस्थान (Mithila Research Institute), जिसकी स्थापना 1951 में तत्कालीन राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद (Dr. Rajendra Prasad) ने की थी, से चोरी गयी दुर्लभ पांडुलिपियों में वृक्ष की खाल पर लिखी ‘भागवत गीता’, ‘दुर्गा सप्तशती’ भी थी. महत्व इसका यह भी कि दुर्गा सप्तशती (Durga Saptashati) का आवरण हाथी दांत के पन्ने पर लिखा था. इतिहास बताता है कि महाकवि विद्यापति का तिरहुता लिपि में लिखा ‘भगवत पुराण’ 1917 में महाराजा रामेश्वर सिंह (Maharaja Rameshwar Singh) के ग्रंथ- पांडुलिपि संग्रह-अभियान के दौरान दरभंगा जिले के जोगियारा गांव में मिला था. 1916-17 में चलाये गये उस अभियान के तहत गांव-गांव से अनेक पांडुलिपियां और दुर्लभ ग्रंथ संग्रहित हुए थे. उनमें एक दार्शनिक पक्षधर मिश्र रचित ‘विष्णु पुराण’ भी था.
‘ग्रहणमाला’ भी गायब
उपलब्ध जानकारी के अनुसार महाराजा रामेश्वर सिंह ने ‘भगवत पुराण’ खुद के संग्रहालय (Sangrahalay) में रख लिया और ‘विष्णु पुराण’ बिहार रिसर्च सोसायटी, पटना के हवाले कर दिया.1464 में रचित ‘विष्णु पुराण’ बिहार रिसर्च सोसायटी (Bihar Research Society) में संरक्षित है. कालांतर में महाराजा कामेश्वर सिंह (Maharaja Kameshwar Singh) ने ‘भगवत पुराण’ कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय को समर्पित कर दिया. ‘ग्रहणमाला’ कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय (Kameshwar Singh Darbhanga Sanskrit University) द्वारा 1983 में प्रकाशित ऐतिहासिक खगोलीय ग्रंथ है. मूल पांडुलिपि केन्द्रीय पुस्तकालय में संरक्षित थी, उसकी चोरी हो गयी. लगभग 450 साल पूर्व ‘ग्रहणमाला’ की रचना करनेवाले आचार्य हेमांग ठाकुर महामहोपाध्याय महेश ठाकुर के पौत्र थे. बताया जाता है कि इसमें 1670 ई. से लेकर 2708 ई. तक के 01 हजार 88 वर्षों के सूर्यग्रहणों एवं चन्द्रग्रहणों की सटीक गणना है. कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के बहुचर्चित विश्वविद्यालय पंचांग (University Calendar) के निर्माण में इससे सहयोग लिया जाता रहा है.
फर्श पर गिरी थी पांडुलिपियां
केन्द्रीय पुस्तकालय में चोरी का मामला कैसे सामने आया, अब यह जानते हैं. 29 नवम्बर 2003 को कुलपति आचार्य किशोर कुणाल (Acharya Kishore Kunal) के आमंत्रण पर प्रख्यात समालोचक डा. नामवर सिंह (Dr. Namvar Singh) का विश्वविद्यालय-भ्रमण कार्यक्रम था. इसी सिलसिले में केन्द्रीय पुस्तकालय को व्यवस्थित करने जब व्याकरण विभाग के रीडर डा. शशिनाथ झा आदेशपाल सोनेलाल पासवान के साथ पुस्तकालय कक्ष में पहुंचे तो वहां के हालात देख अवाक रह गये. पांडुलिपियां वाली अलमारी फर्श पर गिरी थी. कुछ पांडुलिपियां यत्र-तत्र बिखरी पड़ी थीं. कक्ष की खिड़कियां खुलीं और उनकी जाली कटी हुई थी. अलमारी के ताले टूटे नहीं थे, उसे चाबी से खोला गया था. गौर करने वाली बात है कि केन्द्रीय पुस्तकालय तीन मंजिला भवन में है. दूसरे तले पर स्ट्रांग रूम है.
यह भी पढ़ें :
अमूल्य धरोहरों की चोरी : किसने साफ कर लिया हाथ? अब भी रहस्य ही है
शक कर्मचारी पर गया
ऐतिहासिक महत्व वाली पांडुलिपियां और ग्रंथ आठ ताले वाले स्ट्रांग रूम में रहते हैं. वजह जो रही हो, चोरी गयी पांडुलिपियां उस रात पुस्तकालय कक्ष में थीं. इसी आधार पर पुलिस और कुलपति आचार्य किशोर कुणाल को संदेह हुआ कि बाहर के चोरों ने नहीं, विश्वविद्यालय के किसी कर्मचारी ने ही पांडुलिपियां गायब कर दी. मामले को चोरी का रूप देने के लिए अलमारी को फर्श पर गिरा कुछ पांडुलिपियों को इधर-उधर फैला दिया. डा. शशिनाथ झा ने तत्क्षण इसकी सूचना कुलसचिव को दी और फिर विश्वविद्यालय थाने में प्राथमिकी दर्ज करायी गयी. कुलपति के उक्त संदेह को मजबूती इससे भी मिली कि मामले की तहकीकात में जुटी पुलिस का खोजी कुत्ता पुस्तकालय (Library) में काम करनेवाले विश्वविद्यालयकर्मी उमाशंकर झा के घर पहुंच गया. उमाशंकर झा को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया.
***

(विजय शंकर पांडेय वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

