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मोबाइल हाथ में, माइक गले में… क्या यही पत्रकारिता है?

चिंता की सबसे बड़ी बात यह भी कि ऐसी पत्रकारिता की आड़ में भयादोहन का ‘समानांतर उद्योग’ खड़ा हो गया है. गांव से लेकर शहर तक ऐसे अनेक ‘स्वयंभू पत्रकार’ मिल जायेंगे, जिनके पास न किसी संस्थान का प्रशिक्षण है, न संपादकीय जवाबदेही और न पत्रकारिता की मौलिक समझ. मोबाइल कैमरा और यूट्यूब चैनल अधिकतर के लिए खबर का माध्यम कम, धन उगाही के लिए दबाव बनाने का हथियार बन गये हैं. विडम्बना यह है कि उनकी इस अनैतिकता की वजह से ईमानदार और जमीनी पत्रकार भी संदेह के घेरे में आ जाते हैं.

– अधूरी या अपुष्ट जानकारी से सनसनी फैलाने की कोशिश

– गांव से लेकर शहर तक फैले हैं स्वयंभू पत्रकार

– अनियंत्रित अंकुश लगा तो आधात स्वतंत्र पत्रकारिता को पहुंचेगा

– फर्जी पत्रकारिता के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जरूरत

तापमान लाइव ब्यूरो
18 जुलाई 2026

New Delhi: ‘मोबाइल वाले पत्रकार’…यह अब सोशल मीडिया (Social Media) की बहस का हिस्सा भर नहीं रह गया है. दिल्ली उच्च न्यायालय की हालिया गंभीर टिप्पणी ने इसे न्यायपालिका (Judiciary) के साथ-साथ व्यवस्था की चिंता का भी विषय बना दिया है. अदालत ने तल्ख शब्दों में कहा है कि आज यूट्यूब (YouTube) चैनल खोल हाथ में मोबाइल (Mobile) फोन और गले में माइक्रोफोन (Microphone) लटका कोई भी खुद को पत्रकार घोषित कर दे रहा है. एक मामले की सुनवाई के दौरान उसने कहा कि कई स्वयंभू पत्रकार संवाद संग्रहण के समय आक्रामक तरीके अपनाते हैं, अधूरी या अपुष्ट जानकारी प्रसारित कर सनसनी फैलाने की कोशिश करते हैं. इससे सामाजिक तनाव और कानून-व्यवस्था (Law & Order) की समस्या भी पैदा हो सकती है. इसके साथ अदालत ने यह भी कहा कि प्रेस (Press) की स्वतंत्रता अक्षुण्ण रहनी चाहिए, परन्तु उसके नाम पर गैर-जिम्मेदाराना पत्रकारिता, डराने-धमकाने या सामाजिक सौहार्द्र बिगाड़ने वाली गतिविधियों को संरक्षण नहीं मिलना चाहिए.

तासीर के साथ तस्वीर भी बदल गयी

दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) ने मीडिया (Media) के लिए ऐसा नियामक ढांचा बनाने पर विचार करने की जरूरत बतायी, जो स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच संतुलन स्थापित करे. उसकी इस टिप्पणी के परिप्रेक्ष्य में स्वाभाविक सवाल उठता है कि क्या पत्रकारिता (Journalism) आजकल इतनी आसान हो गयी है या फिर यह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ में घुस आयी खतरनाक अव्यवस्था है? इस तथ्य को हमेशा ध्यान में रखना चाहिए कि पत्रकारिता केवल खबर परोसने का पेशा (News Reporting Profession) नहीं रही है. यह सत्य की खोज, सत्ता से सवाल और समाज के प्रति जवाबदेही निभाती रही है. लेकिन, देखा यह जा रहा है कि वर्तमान डिजिटल युग में पत्रकारिता की तासीर के साथ तस्वीर भी बदल गयी है. अब समाज को खबर से अवगत कराने की जगह ‘वायरल’ होना ‘मोबाइल वाले पत्रकार’ का लक्ष्य बन गया है. परिणामस्वरूप सच और तथ्य पीछे छूट गये हैं और अधकचरी जानकारी आधारित सनसनी आगे निकल गयी है.

धन उगाही के लिए दबाव

चिंता की सबसे बड़ी बात यह भी कि ऐसी पत्रकारिता की आड़ में भयादोहन का ‘समानांतर उद्योग’ खड़ा हो गया है. गांव से लेकर शहर तक ऐसे अनेक ‘स्वयंभू पत्रकार’ मिल जायेंगे, जिनके पास न किसी संस्थान का प्रशिक्षण है, न संपादकीय जवाबदेही और न पत्रकारिता की मौलिक समझ. मोबाइल कैमरा और यूट्यूब चैनल अधिकतर के लिए खबर का माध्यम कम, धन उगाही के लिए दबाव बनाने का हथियार बन गये हैं. विडम्बना यह है कि उनकी इस अनैतिकता की वजह से ईमानदार और जमीनी पत्रकार भी संदेह के घेरे में आ जाते हैं. जब हर दूसरा व्यक्ति खुद को पत्रकार बताने लगे, तो समाज के लिए असली और नकली में फर्क करना मुश्किल हो जाता है. इसका नुकसान केवल मीडिया को नहीं, समाज और लोकतांत्रिक व्यवस्था को भी हो रहा है.

नजरंदाज नहीं किया जा सकता

इसका एक दूसरा पक्ष भी है जो कम खतरनाक नहीं है. इसको नजरंदाज नहीं किया जा सकता कि स्मार्ट फोन और सोशल मीडिया ने सूचना के लोकतंत्रीकरण का रास्ता खोला है. अब घटनास्थल से कोई भी व्यक्ति वीडियो (Vedio) बनाकर लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है. इससे ऐसी कई महत्वपूर्ण खबरें सामने आयी हैं जिन्हें पारंपरिक मीडिया शायद न ला पाता. लेकिन, इसी बदलाव ने ‘मोबाइल वाले पत्रकार’ की एक ऐसी जमात भी पैदा कर दी है, जो न पत्रकारिता की आचार संहिता से बंधी है और न ही किसी संस्थागत जवाबदेही से. तब भी ‘मोबाइल वाले पत्रकार’ पर अंकुश लगाने के नाम पर कहीं ऐसा कानून बना दिया गया, जिससे सरकार तय करने लगे कि पत्रकार कौन है और कौन नहीं, तो आघात स्वतंत्र पत्रकारिता को ही लगेगा. इतिहास गवाह है कि सत्ता हमेशा आलोचनात्मक आवाजों पर नियंत्रण रखना चाहती है.

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जवाबदेही का ढांचा समाधान

इसके मद्देनजर समाधान अंकुश नहीं, बल्कि जवाबदेही का ढांचा हो सकता है. जरूरत इस बात की है कि पत्रकारिता की पहचान किसी कार्ड, माइक या यूट्यूब चैनल से नहीं, बल्कि उसके आचरण और विश्वसनीयता से हो. फर्जी पत्रकारिता (Fake Journalism) के खिलाफ कठोर कार्रवाई हो, लेकिन खोजी, स्वतंत्र और जनपक्षीय पत्रकारिता पर कोई आंच न आये. दिल्ली उच्च न्यायालय की टिप्पणी दरअसल मोबाइल रखने वाले पत्रकारों पर नहीं, पत्रकारिता के गिरते स्तर पर है. यह मीडिया जगत के लिए चेतावनी भी है और आत्ममंथन का अवसर भी. लोकतंत्र में पत्रकारिता की ताकत उसके मोबाइल कैमरे और माइक्रोफोन से नहीं, उसकी विश्वसनीयता से तय होती है. यदि विश्वसनीयता खत्म हुई, तो सबसे महंगा मोबाइल और सबसे बड़ा माइक्रोफोन भी पत्रकारिता को नहीं बचा पायेंगे.

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