Bihar : करना होगा इंतजार… अब अगले साल होगा पंचायत चुनाव!
परिसीमन के लिए एक डीलिमिटेशन कमीशन बनेगा. वह कमीशन गांव-गांव जाकर देखेगा कि कहां नये वार्ड बनने चाहिए, कहां पंचायत की सीमा बदलनी चाहिए. उसके बाद आपत्तियां दर्ज की जायेंगी, सुनवाई होगी और फिर फाइनल नोटिफिकेशन निकलेगा. पंचायती राज विभाग का अनुमान है कि यह पूरी कवायद अप्रैल 2027 तक पूरी हो पायेगी. इसीलिए चुनाव को अगले साल तक के लिए टाल दिया गया है.
– टल जायेगा बिहार में पंचायत चुनाव!
– जुलाई-अगस्त 2027 में होने की संभावना
– दिसम्बर 2026 में खत्म हो जायेगा मौजूदा कार्यकाल
– मायूसी में घिर गये चुनावी मंशा रखने वाले लोग
प्रदीप कुमार नायक
18 जुलाई 2026
Patna: बिहार के गांवों में इन दिनों मायूसी है. जो लोग इसी साल होने वाले पंचायत चुनाव (Panchayat Elections) की तैयारी कर रहे थे, जिन्होंने किसी तरह पैसों का इंतजाम कर पोस्टर छपवाये थे, सोशल मीडिया (Social Media) पर जोर-शोर से प्रचार-प्रसार कर रहे थे, जिनकी आंखों में मुखिया (Mukhiya), सरपंच (Sarpanch), पंचायत समिति (Panchayat Samittee) या वार्ड सदस्य (Ward Member) बनने का सपना था, उनके लिए यह खबर किसी सदमे से कम नहीं है. मीडिया की सुर्खियां बनी खबर यह है कि अक्बतूर-नवंबर 2026 में होने वाला पंचायत चुनाव अब अगले साल होगा. राज्य सरकार के रुख से जो संकेत मिल रहा है उसके मुताबिक पंचायत चुनाव के अब जुलाई-अगस्त 2027 में होने की संभावना है.
कारण बताया जा रहा परिसीमन
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक पंचायती राज मंत्री (Minister of Panchayati Raj) दीपक प्रकाश (Deepak Prakash) का कहना है कि परिसीमन, समय और अन्य तकनीकी कारणों (Technical Reasons) की वजह से चुनाव अभी संभव नहीं है. सुनने में यह बात सीधी लगती है, पर इसके पीछे 25 साल की एक पूरी कहानी है. बिहार (Bihar) में पंचायतों का परिसीमन (Delimitation of Panchayats) अब तक 2001 की जनगणना के आधार पर होता आया है. तब से आज तक बिहार की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है. नये टोले बस गये, गांव शहर बन गये, आबादी तीन करोड़ बढ़ गयी. कई जगह एक वार्ड में 2000 मतदाता हो गये तो कहीं 300 ही रह गये. ऐसे में प्रतिनिधित्व का संतुलन बिगड़ना लाजमी था. इसलिए सरकार ने फैसला किया कि इस बार परिसीमन 2011 की जनगणना के आधार पर होगा.
इसलिए टाल दिया गया
परिसीमन के लिए एक डीलिमिटेशन कमीशन (Delimitation Commission) बनेगा. वह कमीशन गांव-गांव जाकर देखेगा कि कहां नये वार्ड बनने चाहिए, कहां पंचायत की सीमा बदलनी चाहिए. उसके बाद आपत्तियां दर्ज की जायेंगी, सुनवाई होगी और फिर फाइनल नोटिफिकेशन निकलेगा. पंचायती राज विभाग का अनुमान है कि यह पूरी कवायद अप्रैल 2027 तक पूरी हो पायेगी. इसीलिए चुनाव को अगले साल तक के लिए टाल दिया गया है. सवाल यहीं से शुरू होता है. पंचायतों का मौजूदा कार्यकाल दिसंबर 2026 में खत्म हो जायेगा. कानून कहता है कि कार्यकाल खत्म होने के छह माह पहले चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो जानी चाहिए. अगर चुनाव वाकई जुलाई-अगस्त 2027 में होता है तो इसका मतलब है कि सात महीने तक बिहार की 08 हजार 400 से ज्यादा पंचायतें बिना चुने हुए प्रतिनिधि के चलेंगी!
सारा बोझ प्रशासक पर
उस अवधि में नाली कौन बनवायेगा, पेंशन के बारे में लोग किससे पूछेंगे, मनरेगा (Manrega) का काम कौन देखेगा? जाहिर है, सारा बोझ प्रशासक पर आ जायेगा और जहां प्रशासक होता है वहां जवाबदेही कम और फाइलों का खेल ज्यादा होता है. इसीलिए विपक्ष ने इसे लोकतंत्र (Democracy) की हत्या कहा है. उसका आरोप है कि सरकार जानबूझ कर चुनाव टाल रही है. वहीं सरकार का तर्क है कि अगर जल्दीबाजी में आधा-अधूरा परिसीमन करके चुनाव करा दिया गया तो अगले दस साल तक वही गलती दोहरायी जाती रहेगी. सरकार चाहती है कि इस बार परिसीमन एकदम सही हो ताकि आबादी के हिसाब से हर किसी को बराबर का प्रतिनिधित्व मिले.
बजट बिगड़ गया
इस देरी से सबसे ज्यादा परेशान वे लोग हैं जिन्होंने चुनाव को अपना करियर बना रखा है. दो साल से जन-संपर्क, बैठक, चंदा, सब चल रहा था. अब एक साल और इंतजार करना पड़ेगा. कई उम्मीदवारों का बजट बिगड़ गया है. कई लोग कह रहे हैं कि अब चुनाव लड़ेंगे ही नहीं. वहीं वर्तमान मुखिया और सरपंच के लिए यह एक साल बोनस की तरह है. उन्हें अपने अधूरे काम पूरे करने का और समय मिल जायेगा. बिहार का इतिहास देखें तो पंचायत चुनाव हमेशा देर से ही हुए हैं. 2006 का चुनाव 2008 में हुआ, 2011 वाला 2016 में और 2016 वाला 2021 में. हर बार कोई न कोई वजह सामने आ जाती है. कभी कोर्ट में केस (Court Case), कभी आरक्षण (Reservation), कभी परिसीमन!
करीब से देखना होगा
आम जनता के लिए इसका सीधा मतलब है इंतजार. पर, इस इंतजार में भी एक मौका है. अगले एक साल में परिसीमन की प्रक्रिया को बहुत करीब से देखना होगा. जब डीलिमिटेशन कमीशन आये तो यह सुनिश्चित करना होगा कि राजनीति (Politics) के चक्कर में किसी गांव को गलत पंचायत में न जोड़ दिया जाये. आरक्षण की नयी सूची आने पर देखना होगा कि कहीं किसी वर्ग के साथ नाइंसाफी तो नहीं हो गयी. सबसे जरूरी बात यह कि दिसंबर 2026 के बाद जब पंचायत प्रशासक के हवाले होगी तो यह ध्यान में रखना होगा कि पैसा कहां खर्च हो रहा है. पंचायत चुनाव छोटा चुनाव नहीं होता. यहीं से लोकतंत्र की पहली सीढ़ी बनती है.
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पचायतें ज्यादा मजबूत रहेंगी
वहीं से तय होता है कि गांव में सड़क कैसी होगी, स्कूल में शिक्षक आयेंगे या नहीं, अस्पताल (Hospital) में दवा मिलेगी या नहीं. अगर नींव की ईंट ही टेढ़ी रह गयी तो पूरी इमारत हिल जायेगी. इसलिए चुनाव भले एक साल टल जाये, पर जन जागरूकता (Public Awareness) एक दिन भी पीछे नहीं जानी चाहिए. परिसीमन अगर ईमानदारी से हुआ तो अगले दस साल तक पंचायतें ज्यादा मजबूत रहेंगी. इसमें गड़बड़ी हुई, तो फिर पांच साल तक पछताने के अलावा कोई चारा नहीं बचेगा. चुनाव की तारीख टल सकती है, पर जनता के सवाल नहीं टलने चाहिए. यही इस एक साल के लिए सबसे बड़ा सबक होगा.
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