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Champaran : दिन में मशीन की घरघराहट… रात में मौत की फैक्ट्री ! नेपाल तक पसरा था कारोबार

तापमान लाइव ब्यूरो
21 जुलाई 2026
Motihari: दिन में मशीनों (Machines) की घरघराहट सुनाई देती थी. आसपास के लोग समझते थे कि लेथ मशीन (Lathe machine) और कबाड़ (Scrap) का मामूली कारोबार चल रहा है. लेकिन, अंधेरा होते ही वही दुकान मौत की फैक्ट्री (Death Factory) में बदल जाती थी. लेथ मशीन पर कारतूस (Cartridge) गढ़े जाते थे, रसायनों से बारूद तैयार किया जाता था और फिर राष्ट्रीय उच्च पथ (National Highway) के रास्ते मौत के सामान उत्तर बिहार (North Bihar) से लेकर नेपाल (Nepal) तक भेज दिये जाते थे. पूर्वी चंपारण जिले के चकिया (Chakiya) के ओझा टोला में पुलिस ने 19 जुलाई 2026 को जिस अवैध बन्दूक व कारतूस फैक्ट्री का उद्भेदन किया है उसने सिर्फ एक गिरोह का ही नहीं, बिहार में फल-फूल रहे संगठित हथियार नेटवर्क का पर्दाफाश कर दिया है. सबसे बड़ा सवाल यह है कि चार वर्षों से राष्ट्रीय उच्च पथ के किनारे चल रही यह फैक्ट्री आखिर पुलिस, खुफिया एजेंसियों और स्थानीय जागरूक लोगों की नजरों से कैसे बची रही?

गिरफ्तार मास्टरमाइंड (Mastermind) श्रीकांत सिंह (Shrikant Singh) कोई नया अपराधी नहीं है. वह इसी जिले के फेनहारा थाना क्षेत्र के मड़पा विशुनपुर गांव का रहने वाला है. उसके खिलाफ पहले से आर्म्स एक्ट के पांच मामले दर्ज हैं. पुलिस का दावा है कि वह 14 वर्षों से अवैध हथियार और कारतूस के कारोबार से जुड़ा है. 2012 में वह मुजफ्फरपुर (Muzaffarpur) में पकड़ाया था. जमानत मिली तो चकिया में धंधा पसार दिया. यानी यह किसी नौसिखिए अपराधी का नहीं, बल्कि एक पेशेवर की करतूत है. पूर्वी चम्पारण के पुलिस अधीक्षक (Superintendent of Police) स्वर्ण प्रभात (Golden Dawn) के मुताबिक छापेमारी में 500 से अधिक तैयार और अर्द्धनिर्मित कारतूस, हजारों खाली खोखे, कट्टे, अर्द्धनिर्मित पिस्तौल, मैगजीन, लेथ मशीन और विस्फोटक रसायनों का जखीरा बरामद हुआ. पूछताछ में सामने आया कि नाइट्रिक एसिड, रेड फॉस्फोरस, सल्फ्यूरिक एसिड, गन पाउडर और पीतल की प्लेट आदि सामग्री ऑनलाइन मंगायी जाती थी. यानी अपराध अब गली-मोहल्ले तक सीमित नहीं रहा, डिजिटल प्लेटफॉर्म का भी इस्तेमाल करने लगा है.

फैक्ट्री का स्थान संयोग नहीं था. राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे ठिकाना इसलिए बनाया गया कि कारतूस आसानी से अलग-अलग जिलों और सीमावर्ती इलाकों तक पहुंचाये जा सकें. शुरुआती जांच में नेपाल तक फैलाव की बात सामने आने के बाद यह मामला और गंभीर हो गया है. खुली भारत-नेपाल सीमा का फायदा उठाकर यह नेटवर्क कितना बड़ा हो चुका था, इसकी मुकम्मल जांच अभी बाकी है. पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि प्रतिबंधित रसायन थोक में खरीदे जा रहे थे, तो क्या किसी एजेंसी ने इसकी निगरानी की? चार वर्षों से किराये के मकान में यह धंधा चल रहा था, तो स्थानीय स्तर पर किसी को भनक क्यों नहीं लगी? यदि श्रीकांत पहले से हथियार तस्करी के मामलों में आरोपी था, तो उसकी गतिविधियों पर सतत निगरानी क्यों नहीं रखी गयी? छापेमारी में तीन और लोग गिरफ्तार हुए- रामबाबू पासवान, रहमत मियां और वसी आलम उर्फ मुन्ना.

यह सच है कि कारतूस फैक्ट्री (Cartridge Factory) पहली बार पकड़ी गयी है, लेकिन मिनी गन फैक्ट्री का यह पहला मामला नहीं है. पिछले छह वर्षों के दौरान जिले में अवैध हथियार निर्माण की कई इकाइयों का खुलासा हो चुका है. हर बार गिरफ्तारी होती है, हथियार बरामद होते हैं, लेकिन कुछ महीनों बाद नया गिरोह सामने आ जाता है. यह बताता है कि कार्रवाई हो रही है, लेकिन नेटवर्क की जड़ें अब भी जमी हुई हैं. यह मामला सिर्फ अवैध हथियार बनाने का नहीं है. यह संगठित अपराध, सीमा पार तस्करी, ऑनलाइन रसायनों की खरीद और स्थानीय स्तर पर बने सुरक्षित ठिकानों के खतरनाक गठजोड़ का संकेत है. यदि इस नेटवर्क की पूरी शृंखला नहीं तोड़ी गयी, तो मोतिहारी की यह फैक्ट्री आने वाले समय में सिर्फ एक उदाहरण भर साबित होगी. बहरहाल, कारतूस की यह फैक्ट्री भले बंद हो गयी हो, लेकिन असली सवाल अब भी बना हुआ है क्या पुलिस मौत के कारोबार के पूरे नेटवर्क को ध्वस्त कर पायेगी?

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