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उपचुनाव और भाजपा : बांकीपुर में फजीहत ! किसने डुबो दी पार्टी की प्रतिष्ठा ?

अविनाश चन्द्र मिश्र
13 जुलाई 2026
Patna : भाजपा (BJP) के रणनीतिकार तर्क जो गढ़ें-पढ़ें, बांकीपुर (Bankipur) विधानसभा क्षेत्र के उपचुनाव (By-election) में अप्रत्याशित ढंग से उम्मीदवार बदलने से पार्टी की किरकिरी हो रही है. उपचुनाव पर इसका असर सकारात्मक हो या नकारात्मक, फिलहाल नेतृत्व को सांप सूंघ गया है. आधिकारिक रूप से बदलाव का ऐसा कोई तार्किक कारण नहीं बताया जा रहा है जिस पर आम अवाम का भरोसा जम सके. ‘पलायित प्रत्याशी’ ने पारिवारिक कारणों से मैदान छोड़ने की बात कही है. वही दोहराई-तिहराई जा रही है. पर, नामांकन के दूसरे दिन अचानक से पैदा हुआ ‘पारिवारिक कारण’ राजनीति के गले नहीं उतर रहा है. लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि नामांकन के बाद के 20-22 घंटे के अंदर ऐसी क्या परिस्थिति उत्पन्न हो गयी कि चुनाव लड़ने से पीछे हट गये ? इसी सवाल के इर्द गिर्द अलग-अलग नैरेटिव गढ़े जा रहे हैं.

बांकीपुर का उपचुनाव कोई साधारण चुनाव नहीं है. यह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन (Nitin Navin) का निर्वाचन क्षेत्र रहा है. भाजपा और नितिन नवीन के ‘पुश्तैनी गढ़’ की इसकी बड़ी पहचान है. नितिन नवीन के ही राज्यसभा (Rajya Sabha) का सदस्य निर्वाचित हो जाने के कारण उपचुनाव हो रहा है. स्वाभाविक रूप से इससे उनकी प्रतिष्ठा जुड़ी हुई है. साथ में मुख्यमंत्री (Chief Minister) सम्राट चौधरी (Samrat Chaudhary) की भी. इसलिए कि नितिन नवीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने और सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री का पद संभालने के बाद बिहार में यह पहला उपचुनाव है. इसमें उनकी काबिलियत की परख होनी है. उनके समक्ष बड़ी चुनौती यह है कि जन सुराज (Jan Suraj) के सूत्रधार प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) खुद इस उपचुनाव में भविष्य संवारने उतरे हैं. इस लिहाज से नामांकन का पर्चा दाखिल कर चुके उम्मीदवार के चौंकाऊ बदलाव से उभरे सवाल निःसंदेह असहज करने वाले हैं.

भाजपा नेतृत्व ने सामान्य कार्यकर्त्ता को तवज्जो देने की नीति के तहत बड़े-बड़े दावेदारों को दरकिनार कर आमलोगों के लिए अनजान अभिषेक कुमार बंटी (Abhishek Kumar Bunty) को उम्मीदवार बना दिया. 07 जुलाई 2026 को उनकी उम्मीदवारी घोषित हुई. 09 जुलाई 2026 को पूरे तामझाम के साथ उन्होंने नामांकन का पर्चा दाखिल किया. उस दिन नामांकन सभा में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी (Vijay Kumar Chaudhary) एवं एनडीए (NDA) के तमाम नेताओं ने हुंकार भरे. दूसरे दिन यानी 10 जुलाई 2026 को अभिषेक कुमार बंटी ने अचानक मैदान छोड़ दिया. राजनीति हैरान रह गयी. भाजपा नेतृत्व ने आनन-फानन में नीरज कुमार सिन्हा (Neeraj Kumar Sinha) को नया उम्मीदवार बना दिया. नीरज कुमार सिन्हा भी भाजपा के बहुत साधारण कार्यकर्त्ता हैं. यह साफ दिख रहा है कि उम्मीदवार चयन में चूक से भाजपा असहज है. उसकी इस असहजता ने कई ऐसे सवाल खड़े कर दिये हैं जिनका जवाब सिर्फ विपक्ष ही नहीं, भाजपा के कार्यकर्त्ताओं समेत तमाम समान्य जन भी जानना चाहते हैं.

सबसे अहम सवाल यह कि दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी से इतनी बड़ी चूक कैसे हो गयी? भाजपा खुद को कार्यकर्त्ता आधारित, अनुशासित और मजबूत सांगठनिक ढांचे वाली ‘पार्टी विद द डिफरेंस’ बताती है. उसका दावा है कि चुनावों के लिए उम्मीदवारों का चयन बहुस्तरीय लंबी प्रतिक्रिया से गुजरने के बाद होता है. स्थानीय इकाई की रिपोर्ट, जिला संगठन का मंतव्य, प्रदेश नेतृत्व का मूल्यांकन, प्रदेश कोर कमेटी में मंथन और तब केन्द्रीय चुनाव समिति की मंजूरी. इन तमाम चरणों से गुजरने के बाद चयनित उम्मीदवार के नाम की घोषणा. इसके बाद भी नामांकन का पर्चा दाखिल कर चुके उम्मीदवार को बदलना पड़ जाये, तो सवाल किसी एक व्यक्ति पर नहीं, पूरी प्रक्रिया पर उठते हैं. इसे विडम्बना ही कहेंगे कि इस प्रक्रिया में बांकीपुर की एक सीट के लिए सही प्रत्याशी का चयन नहीं हो पाया!

सबसे बड़ा सवाल प्रदेश भाजपा नेतृत्व की कार्यशैली पर है. क्या चयनित उम्मीदवार अभिषेक कुमार बंटी के बारे में पूरी जानकारी उसके पास नहीं थी? पटना के आनंदपुरी (Anandpuri) मुहल्ले से सीधे उठाकर उन्हें उम्मीदवारी दे दी गयी? यदि पहले से जानकारी थी तो फिर उसे नजरंदाज क्यों कर दिया गया? जानकारी नहीं थी, तो प्रदेश संगठन ने जानकारी उपलब्ध करने के अपने मूल दायित्व का निर्वहन क्यों नहीं किया? प्रदेश भाजपा अध्यक्ष संजय सरावगी इस सवाल का जवाब शायद ही दे पायेंगे. अभिषेक कुमार बंटी की पात्रता की जमीनी जांच की बात दूर, उनके बारे में सामान्य जानकारी भी हासिल नहीं की गयी. भाजपा के सूत्रों का कहना है कि चूंकि वह भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन के खासमखास हैं इसलिए इसकी जरूरत नहीं समझी गयी. प्रदेश संगठन से चूक वहीं हो गयी.

अभिषेक कुमार बंटी के पिता रवीन्द्र प्रसाद और मां चंचला कुमारी उस चारा घोटाले के ‘सजायाफ्ता’ हैं जिसने राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद का ‘राज पाट’ छीन लिया. अभिषेक कुमार बंटी ने शायद इस तथ्य को छिपा लिया, भाजपा नेतृत्व के संज्ञान में नहीं आने दिया. यह आधिकारिक जानकारी नहीं है, पर चर्चा है कि अभिषेक कुमार बंटी के खिलाफ मारपीट, महिला उत्पीड़न और छेड़खानी से संबंधित प्राथमिकी दर्ज है. संभवतः शराबबंदी कानून के उल्लंघन की भी कुछ शिकायतें हैं. शैक्षणिक योग्यता पर भी सवाल है. कहते हैं कि प्राथमिकी दर्ज रहने का जिक्र उन्होंने नामांकन के पर्चे में नहीं किया है. ये तमाम बातें सोशल मीडिया में तैर रही हैं. इस तर्क के साथ कि अभिषेक कुमार बंटी के मैदान छोड़ देने का आधार यही है. मैदान नहीं छोड़ते, तो जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर नामांकन की आखिरी तारीख के बाद इसे मुद्दा बना भाजपा की फजीहत करा देते.

बात प्रदेश कोर कमेटी की तो वह केवल औपचारिक इकाई नहीं होती. उसका काम सिर्फ नाम सुझाना नहीं, उम्मीदवारी की बाबत राजनीतिक जोखिमों का आकलन और नेतृत्व को सजग करना भी होता है. यदि अभिषेक कुमार बंटी की बांकीपुर से उम्मीदवारी पर विवाद खड़ा होने जैसा कोई अंदेशा था, तो प्रदेश कोर कमेटी में उस पर गंभीर चर्चा क्यों नहीं हुई? यदि हुई, तो फिर सहमति कैसे बन गयी? गंभीर चर्चा नहीं हुई तो प्रदेश कोर कमेटी के अस्तित्व में रहने का मतलब क्या रह जाता है? सबसे महत्वपूर्ण सवाल पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व पर है. भाजपा में अंतिम निर्णय उसी का होता है. इस दृष्टि से अंतिम जिम्मेवारी भी उसी की बनती है. यदि प्रदेश संगठन की रिपोर्ट पर भरोसा करके निर्णय लिया गया और बाद में उसे बदलना पड़ा, तो जिम्मेवारी केवल प्रदेश संगठन की ही नहीं, अंतिम स्वीकृति देने वाले की भी बनती है.

बांकीपुर उपचुनाव के मामले में कहा जा रहा है कि पार्टी ने समय रहते चुनावी नुकसान से बचने के लिए उम्मीदवार (Candidate) बदल दिया. यदि वाकई ऐसा है, तो भी अंतिम क्षण में सुधार प्रारंभिक चूक की जवाबदेही से मुक्त नहीं करता. बहरहाल, बांकीपुर उपचुनाव का परिणाम जो भी आये, भाजपा के लिए यह प्रकरण राजनीति का एक ऐसा अध्याय बन गया है जिससे सीख लेना उसके लिए निहायत जरूरी है.

अविनाश चन्द्र मिश्र समकालीन तापमान के संपादक हैं.

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