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Sitamarhi : सीतापुरम परियोजना… क्यों तनी हैं किसानों की मुट्ठियां?

मदनमोहन ठाकुर
24 जुलाई 2026
Sitamarhi: बिहार (Bihar) में शायद ही कोई ऐसी विकास परियोजना (development project) रही होगी जिस पर उतनी राजनीतिक बहस हुई होगी, जितनी सीतामढ़ी की सीतापुरम सैटेलाइट टाउनशिप परियोजना (Sitapuram Satellite Township Project) पर हो रही है. सरकार इसे मिथिला (Mithila) का सबसे शहरी विकास मॉडल (Shahari Vikas Model) बता रही है, तो इस परियोजना से प्रभावित होने वाले किसान (Farmer) इसे अपनी जमीन, अपनी पहचान और अस्तित्व पर हमला मान रहे हैं. ऐसे में सवाल केवल यह नहीं है कि सीतापुरम सैटेलाइट टाउनशिप बनेगा या नहीं, बल्कि यह है कि विकास किस कीमत पर होगा? यह सवाल इसलिए कि सीतापुरम परियोजना का विरोध केवल जमीन के अधिग्रहण को लेकर नहीं हो रहा है, किसानों के अधिकार, विकास के मॉडल और क्षेत्रीय राजनीति का भी यह मुद्दा बन गया है.

मां जानकी (Maa Janki) की जन्मभूमि सीतामढ़ी की पहचान आज भी कृषि प्रधान जिले के रूप में है. यहां की मिट्टी काफी उपजाऊ मानी जाती है. यही किसानों की आजीविका का मुख्य आधार है. प्रस्तावित परियोजना के दायरे में आने वाले अधिसंख्य किसानों का मानना है कि उनकी जमीन सिर्फ संपत्ति नहीं, बल्कि रोजी-रोटी का मूलाधार है. उनका तर्क है कि जमीन का नगद मुआवजा बहुत जल्द खत्म हो जायेगा, लेकिन उपजाऊ खेत हाथ से निकल गये तो वापस नहीं आ पायेंगे. उद्योग या शहर कहीं और बसाये जा सकते हैं. परियोजना के विरोध को इस रूप में आसानी से समझा जा सकता है कि सरकार भूमि को विकास का संसाधन मानती है, जबकि किसान उसे जीवन का आधार बताते हैं.

किसानों की शिकायत मुआवजे की राशि को लेकर नहीं है. उनका कहना है कि उन्हें पूरी योजना, उसके लाभ और भविष्य की स्पष्ट जानकारी नहीं दी गयी है. लैंड पूलिंग जैसे मॉडल पर ग्रामीणों में पहले से भरोसा नहीं है. बिहार में भूमि अधिग्रहण (Land Acquisition) से जुड़े अनुभवों ने भी इस अविश्वास को बढ़ाया है. सीतापुरम सैटेलाइट परियोजना से सीतामढ़ी जिले के डुमरा ( Dumra), रीगा (Riga) , परसौनी, (Parsauni,) रून्नीसैदपुर (Runnisaidpur) और बथनाहा (Bathnaha) प्रखंडों के 98 गांव प्रभावित होंगे. उन गांवों के किसानों का कहना है कि मुआवजा उपजाऊ जमीन और सामाजिक ताने-बाने की भरपाई नहीं कर सकता. जहां तक लैंड पूलिंग मॉडल की बात है तो किसानों का आरोप है कि उनसे इस पर पर्याप्त सहमति नहीं ली गयी. उन्होंने कभी ऐसी योजना की बात नहीं की थी. इसी कारण से ‘भूमि बचाओ संघर्ष समिति’ द्वारा चलाया जा रहा आंदोलन आर्थिक से अधिक विश्वास के संकट का आंदोलन बनता जा रहा है.

सरकार का दावा है कि सीतापुरम परियोजना से सीतामढ़ी को धार्मिक पर्यटन, रोजगार, आधुनिक आधारभूत संरचना और निवेश का बड़ा केन्द्र बनाया जायेगा. मां सीता के प्राकट्य स्थल पुनौराधाम (Punauradham) को विकसित कर इसे मिथिला की पहचान के रूप में स्थापित किया जायेगा. सरकार जो कहे, यहां राजनीतिक समीकरण कई तरह के दिख रहे हैं. एनडीए (NDA) इसे विकास और मां जानकी की जन्मस्थली के गौरव से जोड़कर प्रस्तुत कर रहा है. आंदोलनकारी किसान इसे जमीन बचाओ अभियान के रूप में पेश कर रहे हैं. विपक्षी दल किसानों की नाराजगी को अपनी राजनीति का मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहे हैं. इसे आधार बना सत्ता पक्ष उन पर विकास विरोधी राजनीति करने का आरोप मढ़ रहा है. इस बीच ‘जान दे देंगे, जमीन नहीं देंगे’ के संकल्प के साथ ‘भूमि बचाओ संघर्ष समिति’ ने 09 अगस्त 2026 को पुनौरा में किसान महापंचायत आयोजित करने का निर्णय किया है.

क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि संतुलन कायम करने के प्रयास में जुटे हैं. सीतामढ़ी के जदयू सांसद देवेश चन्द्र ठाकुर (Devesh Chandra Thakur) ने किसानों और प्रशासन के बीच वार्ता कराने की पहल की. इससे संकेत मिलता है कि सरकार भी विरोध की गंभीरता को समझ रही है. इसी तरह सीतामढ़ी के भाजपा विधायक सुनील कुमार पिंटू (Sunil Kumar Pintu) ‘भूमि बचाओ संघर्ष समिति’ के प्रतिनिधि मंडल का हिस्सा बन नगर विकास मंत्री नीतीश मिश्र (Nitish Mishra) से मिलने गये थे. प्रतिनिधिमंडल ने नीतीश मिश्र को एक ज्ञापन सौंपा जिसमें उक्त परियोजना से किसानों को होने वाले नुकसान का ब्यौरा था. इन सबके मद्देनजर यह कहा जा सकता है कि सरकार किसानों को विश्वास में लेकर उचित मुआवजा, पुनर्वास और पारदर्शी योजना नहीं देती है, तो यह आंदोलन और बड़ा हो जा सकता है. वहीं यदि संवाद सफल हुआ, तो सीतापुरम बिहार की सबसे महत्वपूर्ण शहरी परियोजना बन जा सकती है.

मदनमोहन ठाकुर वरिष्ठ पत्रकार हैं

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