तापमान लाइव | Tapmanlive

न्यूज़ पोर्टल | Hindi News Portal

Maluti: जहां विराजती हैं… मां तारा की बड़ी बहन!

राजकिशोर सिंह
26 जुलाई 2026
Dumka : झारखंड (Jharkhand) और पश्चिम बंगाल (West Bengal) की सीमा पर हंटरपाड़ा (Hunterpara) के समीप चीला नदी के उत्तरी किनारे पर बसा है वैश्विक ख्याति प्राप्त वह मलुटी (Maluti) गांव जिसकी ‘मंदिरों के गांव’ के रूप में ऐतिहासिक ही नहीं, सांस्कृतिक व धार्मिक पहचान भी स्थापित है. यह गांव दुमका जिले के शिकारीपाड़ा प्रखंड क्षेत्र में है. इसे झारखंड राज्य की सांस्कृतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है. बांग्ला वास्तुकला की अप्रतिम प्रतिकृति भी वहां की विशिष्टता है. छिन्न-भिन्न अवस्था में ही सही, मलुटी गांव ने अनूठी स्थापत्य व टेराकोटा कलाकृतियों से अलंकृत मंदिरों की बेजोड़ धरोहर सहेज रखी है. तकरीबन चार हजार की आबादी वाले इस गांव में प्रायः सभी समाज के लोग बसे हैं, पर ज्यादा संख्या ब्राह्मणों की है. पश्चिम बंगाल से सटे होने के कारण गांव वालों का आचार-विचार और संस्कार बंगाली संस्कृति (Bengali culture) जैसा ही है.

मलूटी गांव राजार बाड़ि, मध्यम बाड़ि, सिकिर बाड़ि, छई तरफ के नाम से चार हिस्सों में बंटा है. मंदिरों की बड़ी संख्या और काशी के सुमेरु मठ के दंडी स्वामियों श्रीमत शंकचाचार्य के दशनामी संन्यासी संप्रदाय के आचार्यों के नियमित आगमन के कारण इसे ‘गुप्त काशी मलुटी ’ (Gupta Kashi Maluti) के नाम से भी जाना जाता है. इतिहास की बात करें, तो मलुटी पहले मल्लभूम राज में महुलटी नाम का एक छोटा-सा गांव था. 17 वीं सदी में ननकर के राज परिवार ने वहां अपनी राजधानी बसा ली तब महुलटी का अपभ्रंश मलुटी हो गया. वैसे, एक मान्यता यह भी है कि मलुटी नाम तंत्र साधना की प्रमुख देवी मां मौलिक्षा (Maa Mauliksha) से लिया गया है. कुछ इतिहासकारों का कहना है कि विष्णुपुर के मल्ल शासकों के राज को मल्लभूम कहा जाता था. ‘मलुटी’ शब्द उसी मल्लभूम से निकला है.

ननकर यानी करमुक्त राज में मलुटी में लगभग सौ वर्षों तक मंदिरों का निर्माण होता रहा. साथ में तालाब का भी. कहते हैं कि उस कालखंड में वहां एक-एक कर 108 मंदिरों और 108 तालाबों का निर्माण हुआ था. उनमें शिव, शक्ति एवं नारायण के भी मंदिर थे. समुचित संरक्षण-संवर्द्धन नहीं हो पाने की वजह से 36 मंदिर जमींदोज हो गये. वर्तमान में तकरीबन 72 मंदिर अस्तित्व में तो हैं, पर अधिसंख्य की अवस्था जीर्णशीर्ण है. वैसे तो मलुटी को मंदिरों के गांव के नाम से जाना जाता है, पर ईसा पूर्व शुंग काल में इसकी पहचान ‘गुप्त काशी मलुटी’ की थी. चर्चा इसकी वज्रयानी बौद्ध धर्म (Bauddh Dharm) के साधना स्थल के रूप में भी होती है. मलुटी से संबंधित समीर कुमार साहा (Samir Kumar Saha) की एक पुस्तिका प्रकाशित है. उसमें वर्णित है कि बौद्ध तांत्रिक वहां मंदिर बना अपनी आराध्य ‘देवी पांडोरा’ को प्रतिष्ठापित कर रखे थे. वहीं उनकी साधना-आराधना करते थे.

ननकार राज में उसी ‘देवी पांडोरा’ को मां मौलिक्षा का नाम दे राजकुल देवी के रूप में पूजित किया जाने लगा. वैसे, राज परिवार की कुल देवी मां श्यामा हैं. मलुटी में पंचमुंडी के आसन पर जहां वह विराजमान हैं उसे आदिकाली मंदिर कहा जाता है. ननकर राज के प्रथम राजा बाज बसंत राय थे. वह कौन थे, उनके नाम के साथ बाज क्यों जुड़ा, ननकर राज कैसे बना और मलुटी ननकर राज की राजधानी क्यों बनी, राजा बसंत को ‘राय’ की उपाधि किसने दी, इसकी काफी रोचक कहानी है. बात 16वीं सदी की है. गौड़ के सुल्तान अलाउद्दीन हुसैन शाह (1495-1525) एक बार ओडीसा (Odisha) से वीरभूम जिला होते हुए राजधानी गौड़ (Gaur) लौट रहे थे. उसी क्रम में मलुटी के समीप मयुराक्षी नदी (Mayurakshi River) के किनारे उन्होंने शाही पड़ाव डाला था. वहीं उनकी बेगम का प्रिय पक्षी बाज अचानक गुम हो गया. बेगम बेचैन हो उठीं.

वीरभूम जिले के काटिग्राम गांव के युवा चरवाहा बसंत मुखोपाध्याय (Basant Mukhopadhyay) ने बेगम के खोये बाज को खोज लाया. बेगम को सुकून मिला, सुल्तान खुश हुए. इनाम स्वरूप पास की सैकड़ों एकड़ जमीन उन्होंने बसंत मुखोपाध्याय को दे दी. साथ में ‘राय’ की उपाधि भी प्रदान कर दी. बसंत मुखोपाध्याय सुल्तान द्वारा दिये भूखंड पर ननकर राज स्थापित कर राजा बन गया- राजा बाज बसंत राय! वीरभूम के डामरा में उनकी राजधानी थी. वह भारद्वाज गोत्रीय ब्राह्मण थे. स्वभावतन धार्मिक प्रवृत्ति के थे. वह प्रवृत्ति उनकी वंश परंपरा में भी बनी रही. देवकीर्ति ही ननकर के राजाओं की मुख्य उपलब्धि रही. ननकर राज की छह पीढ़ियों के बाद के राजा राजचन्द्र को राजनगर के राजा खाजा कमाल खां (1643-1697) ने पराजित कर उस राज पर आधिपत्य जमा लिया. परिणामस्वरूप राज परिवार डामरा से पलायन कर मलुटी में बस गया. वहां इस राजवंश के राखरचन्द्र से लेकर मेहरचन्द्र ने ही ‘राजा’ की उपाधि का उपयोग किया. उसके बाद राजा की उपाधि त्याग जमींदार हो गये. अब तो जमींदारी भी नहीं है. वैसे, इस वंश के लोग मलुटी में हैं.

(यह आस्था और विश्वास की बात है. मानना और न मानना आप पर निर्भर है.)

राजकिशोर सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं

tapmanlive